भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 909

८६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥ § § ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ (४०) इस पृथ्वीपर आकाशमें अथवा देवताओंमें अर्थात् देवलोकमेंभी ऐसी कोई वस्तु नहीं कि जो प्रकृतिके इन तीन गणोंसे मुक्त हो । | [ अठारहवें श्लोकसे यहाँतक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके ! भेद बतलाकर, अर्जुनकी आंखोंके सामने इस बातका एक चित्र रख दिया है, कि | संपूर्ण जगतमें प्रकृतिके गुणभेदसे विचित्रता कैसे उत्पन्न होती है, तथा फिर | प्रतिपादन किया है, कि इन सब भेदोंमें सात्त्विक भेद श्रेष्ठ और ग्राह्य है। इन | सात्त्विक भेदोंमेंभी जो सबसे श्रेष्ठ स्थिति है, उसीको गीतामें त्रिगुणातीत अवस्था | कहा है। गीतारहस्यके सातवें प्रकरणमें (पृ. १६८-१६९) हम कह चुके हैं, | कि गीताके अनुसार त्रिगुणातीत अथवा निर्गुण अवस्था कोई स्वतंत्र या चौथा | भेद नहीं है, और इसी न्यायके अनुसार मनुस्मृतिमेंभी सात्त्विक गतिकेही फिर | उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ, ये तीन भेद करके कहा गया है, कि उत्तम सात्त्विक | गति मोक्षप्रद है, और मध्यम सात्त्विक गति स्वर्गप्रद है (मनु. १२. ४८-५०, | ८९-८१)। जगतमें जो प्रकृति है, उसकी विचित्रताका यहाँतक वर्णन किया | गया। अब निरूपण किया जाता है, कि इस गुणविभागसेही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाकी | उत्पत्ति कैसे हुई। यह बात पहले कई बार कही जा चुकी है, कि (गी. १८. ७-९, | -२३; ३. ८) प्रत्येक मनुष्यको स्वधर्मानुसार अपना 'नियत' अर्थात् नियुक्त | किया हुआ कर्म फलाशा छोड़कर, परंतु धृति, उत्साह और सारासार विचारके | साथ साथ करते जाना चाहिये, यही संसारमें उसका कर्तव्य है। परंतु जिस बातसे | यह कर्म 'नियत' होता है, उसका बीज अबतक कहींभी नहीं बतलाया गया। पीछे | एक बार चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका कुछ थोड़ा-सा उल्लेखकर (४. १३) कहा | गया है, कि कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय शास्त्रके अनुसार करना चाहिये (गीता | १६. २४); परंतु जगतके व्यवहारोंको नियमानुसार जारी रखनेके हेतु | (गीतार. प्र. ११-१२, पृ. ३३६, ३९९-४००, प्र. १५, पृ. ४९६-४९७) जिस | गुणकर्मविभागके तत्त्वपर चातुर्वर्ण्यरूपी शास्त्र-व्यवस्था निर्मित की गयी है, | उसका पूर्ण स्पष्टीकरण उस स्थानमें नहीं किया गया है। अतएव जिस | संस्थासे समाजमें हर एक मनुष्यका कर्तव्य नियत होता है, अर्थात् स्थिर किया | जाता है, उस चातुर्वर्ण्यकी, गुणत्रयविभागके अनुसार, उपपत्ति बतलाकर उसके | साथही साथ अब प्रत्येक वर्णके नियत किये हुए कर्तव्यभी कहे जाते हैं:-] (४१) हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्म, उसके स्वभाव-