श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ | उक्त श्लोकका ठीक ठीक भावार्थ यह है, कि “ ज्योंही तू इस ज्ञानको समझ | लेगा ( विमृश्य ), त्योंही तू स्वयंप्रकाश हो जायगा ; और फिर ( पहलेसे नहीं ) | तू अपनी इच्छासे जो कर्म करेगा, वही धर्म्य एवं प्रमाण होगा, तथा तुझे स्थित- | प्रज्ञकी ऐसी अवस्था प्राप्त हो जानेपर तेरी इच्छाको रोकनेकी आवश्यकताही | न रहेगी।” अस्तु, गीतारहस्यके १४ वें प्रकरणमें हम दिखला चुके हैं, कि, गीतामें | ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकोही अधिक महत्त्व दिया गया है। इस सिद्धान्तके अनुसार | अब संपूर्ण गीताशास्त्रका भक्तिप्रधान उपसंहार करते हैं :— ] (६४) (अब) अंतकी यह और एक बात सुन, कि जो गुह्यातिगुह्य है । मेरा अत्यंत प्यारा है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात करता हूँ । (६५) मुझमें अपना मन रख, मेरा भक्त हो, मेरा यजन कर, और मेरी वंदना कर; मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, कि ( इसमे ) तू मुझमेंही आ मिलेगा, ( क्योंकि ) तू मेरा प्यारा ( भक्त ) है । (६६) सब धर्मोंको छोड़ कर तू केवल मेरीही शरणमें आ जा । मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, डर मत । | [ कोरे ज्ञानमार्गके टीकाकारोंको यह भक्ति-प्रधान उपसंहार प्रिय नहीं | लगता । इसलिये वे धर्म शब्दमेंही अधर्मका समावेश करके कहते हैं, कि यह | श्लोक कठोपनिषदके इस उपदेशसे समानार्थक है, कि “ धर्म-अधर्म, कृत-अकृत, | और भूत-भव्य, सबको छोड़ कर उनके परे रहनेवाले परब्रह्मको पहचानो” ( कठ | २. १४ ); तथा इसमें निर्गुण ब्रह्मकी शरणमें जानेका उपदेश है। निर्गुण ब्रह्मका | वर्णन करते समय कठ-उपनिषदका श्लोक महाभारतमेंभी आया है । ( शां. ३३९. | ४०; ३३१. ४४ ) । परंतु इन दोनों स्थानोंपर धर्म और अधर्म, ये दोनों पद | जैसे स्पष्टतया पाये जाते हैं, वैसे गीतामें नहीं हैं। यह सच है, कि गीता निर्गुण | ब्रह्मको मानती है, और उसमें यह निर्णयभी किया गया है, कि परमेश्वरका वही | स्वरूप श्रेष्ठ है ( गीता ७. २४ ) । तथापि गीताका यहभी तो सिद्धान्त है, कि | व्यक्तोपासना सुलभ और श्रेष्ठ है ( १२. ५ ), और यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण | अपने व्यक्त स्वरूपके विषयमेंही कह रहे हैं; इस कारण हमारा यह दृढ मत है, | कि यह उपसंहार भक्तिप्रधानही है । अर्थात् यहाँ निर्गुण ब्रह्म विवक्षित नहीं है,