भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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अठारहवाँ अध्याय ८७३ § § इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ § § अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥ | किंतु कहना चाहिये कि यहाँपर धर्म शब्दसे परमेश्वर-प्राप्तिके लिये शास्त्रोंमें | जो अनेक मार्ग बतलाये गये हैं, - जैसे अहिंसा-धर्म, सत्य-धर्म, मातृपितृ- | सेवाधर्म, गुरुसेवा-धर्म, यज्ञयाग-धर्म, दान-धर्म, संन्यास-धर्म, आदि - वेही | अभिप्रेत हैं; और महाभारतके शांतिपर्वमें (शां. ३५४) एवं अनुगीतमें | (अश्व. ४९) जहाँ इस विषयकी चर्चा हुई है, वहाँ धर्म शब्दसे मोक्षके इन्हीं | उपायोंका उल्लेख किया गया है। परंतु इस स्थानपर गीताके प्रतिपाद्य धर्मको | लक्ष करके भगवानका यह निश्चयात्मक उपदेश है, कि उक्त नाना धर्मोंकी | गड़बड़में न पड़ कर 'मुझे अकेलेकोही भज, मैं तेरा उद्धार कर दूंगा, डर मत' | (गीतार. पृ. ४४३) । सार यह है, कि अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान् अंतमें | सभीको आश्वासन देते हैं, कि मेरी दृढ़ भक्ति करके, मत्परायण-बुद्धिसे स्वधर्मा- | नुसार प्राप्त होनेवाले कर्म करते जानेपर, इहलोक और परलोक, दोनों जगह | तुम्हारा कल्याण होगा, डरो मत। यही कर्मयोग कहलाता है; और सब गीता- | धर्मका सारभी यही है। अब बतलाते हैं, कि इस गीता-धर्मकी, अर्थात् ज्ञानमूलक | और भक्ति-प्रधान कर्मयोगकी, परंपरा आगे कैसे जारी रखी जावे :- ] (६७) जो तप नहीं करता, भक्ति नहीं करता और सुननेकी इच्छाभी नहीं रखता, तथा जो मेरी निंदा करता, है, उसे यह (गुह्य) कभी मत बतलाओ। (६८) जो यह परम गुह्य मेरे भक्तोंको बतलावेगा, उसकी मुझमें परम भक्ति होगी और वह निस्संदेह मुझमेंही आ मिलेगा। (६९) और उसकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला संपूर्ण मनुष्योंमें दूसरा कोईभी न मिलेगा; तथा इस भूमिमें मुझे उसकी अपेक्षा अधिक प्रिय और कोई न होगा। | [ परंपराकी रक्षाके इस उपदेशके साथही अब फल बतलाते हैं :- ] (७०) हम दोनोंके इस धर्म-संवादका जो कोई अध्ययन करेगा, मैं समझूँगा,