भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ § § कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥ अर्जुन उवाच । नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ कि उसने ज्ञानयज्ञसे मेरी पूजा की है। (७१) इसी प्रकार दोष न ढूंढ कर श्रद्धाके साथ जो कोई इसे सुनेगा, वहभी (पापोंसे) मुक्त होकर उन शुभ लोकोंमें जा पहुँचेगा, कि जो पुण्यवान् लोगोंको मिलते हैं। | [ यहाँ उपदेश समाप्त हो चुका। अब यह जाँचनेके लिये, कि यह धर्म | अर्जुनकी समझमें ठीक आ गया है या नहीं भगवान् उससे पूछते हैं :- ] (७२) हे पार्थ ! तूने इसे एकाग्र मनमे सुन तो लिया है न ? (और) हे धनंजय ! तेरा अज्ञानरूपी मोह अब सर्वथा नष्ट हुआ कि नहीं ? अर्जुनने कहा :- (७३) हे अच्युत ! तुम्हारे प्रसादसे मेरा मोह नष्ट हो गया; और मुझे (कर्तव्य- धर्मकी) स्मृति हो गई। मैं (अब) निःसंदेह हो गया हूँ। आपके उपदेशानुसार (युद्ध) करूँगा। | [ जिनकी सांप्रदायिक समझ यह है, कि गीताधर्ममेंभी संसारको छोड | देनेका उपदेश किया गया है, उन्होंने इस अंतिम अर्थात् ७३ वें श्लोककी बहुत | कुछ निराधार खींचातानी की है। यदि विचार किया जाय, कि अर्जुनको किस | बातकी विस्मृति हो गयी थी, तो पता लगेगा, कि दूसरे अध्यायमें (२. ७) | उसने कहा है, कि "अपना धर्म अथवा कर्तव्य समझनेमें मेरा मन असमर्थ हो | गया है" (धर्मसंमूढ चेताः); अतः उक्त श्लोकका सरल अर्थ यही है | कि उसी कर्तव्य-धर्मकी अब उसे स्मृति हो आयी है। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त | करनेके लिये गीताका उपदेश किया गया है, और स्थान-स्थानपर कहा गया है, | कि "इसलिये तू युद्ध कर" (गीता २. १८; २. ३७; २. ३०; ८. ७; | ११. ३४), अतएव "आपकी आज्ञानुसार करूँगा" का अर्थ "युद्ध करता | हूँ" ही होता है। अस्तु; श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद समाप्त हुआ; अब | महाभारतकी कथाके संदर्भानुसार धृतराष्ट्रको यह कथा सुनाकर संजय | उपसंहार करता है :- ]