श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ८७५ संजय उवाच । § § इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥ राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ संजयने कहा :- (७४) इस प्रकार शरीरको रोमांचित करनेवाला वासुदेव और महात्मा अर्जुनका यह अद्भुत संवाद मैंने सुना । (७५) व्यासजीके अनुग्रहसे मैंने यह परम गुह्य, याने योग अर्थात् कर्मयोग, साक्षात् योगेश्वर स्वयं श्रीकृष्णहीके मुखसे सुना है। । [ पहलेही लिख चुके हैं, कि व्यासजीने संजयको दिव्य-दृष्टि दी थी, जिससे । रणभूमिपर होनेवाली सारी घटनाएँ उसे घर बैठेही दिखायी देती थीं, और । उन्हींका वृत्तान्त वह धृतराष्ट्रसे निवेदन कर देता था । श्रीकृष्णने जिस योगका । प्रतिपादन किया, वह कर्मयोग है ( गीता ४. १-३ ), और अर्जुनने पहले उसे । 'योग' (साम्ययोग) कहा है ( गीता ६. ३३); तथा अब इस श्लोकमें संजयभी । श्रीकृष्णार्जुनके संवादको 'योग' ही कहता है। इससे स्पष्ट है, कि श्रीकृष्ण, अर्जुन । और संजय, तीनोंके मतानुसार गीताका प्रतिपाद्य विषय; 'योग' अर्थात् । कर्मयोगही है; और अध्याय-समाप्तिसूचक संकल्पमेंभी वही, अर्थात् योगशास्त्र, । शब्द आया है। परंतु 'योगेश्वर' शब्दमें 'योग' शब्दका अर्थ इससे कहीं अधिक । व्यापक है। योगका साधारण अर्थ कर्म करनेकी युक्ति, कुशलता या शैली है। । इसी अर्थके अनुसार कहा जाता है, कि बहुरूपिया योगसे अर्थात् कुशलतासे अपने । स्वाँग बना जाता है। परंतु जब कर्म करनेकी इन युक्तियोंमें श्रेष्ठ युक्तिको । खोजते हैं, तब कहना पड़ता है, कि परमेश्वर मूलमें अव्यक्त होनेपरभी जिस । युक्तिसे वह अपने आपको व्यक्त स्वरूप देता है, वही युक्ति अथवा योग सबसे । श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें 'ईश्वरी योग' (गीता ९. ५; ११. ८) कहा है; । और वेदान्तमें जिसे माया कहते हैं, वहभी यही है ( गीता ७. २५)। यह । अलौकिक अथवा अघटित योग जिसे साध्य हो जाय, उसे अन्य सब युक्तियाँ तो । हाथका मैल है। परमेश्वर इन योगोंका अथवा मायाका अधिपति है, अतएव । उसे योगेश्वर अर्थात् योगोंका स्वामी कहते हैं। 'योगेश्वर' शब्दमे योगका अर्थ । पातंजलयोग नहीं है। ] (७६) हे राजा (धृतराष्ट्र) ! केशव और अर्जुन, दोनोंके इस अद्भुत एवं पुण्य-