भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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८७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ।।१८।। कारक संवादका स्मरण होकर मुझे बार बार हर्ष हो रहा है; (७७) और हे राजा ! श्रीहरिके उस अत्यंत अद्भुत विश्वरूपकीभी बार बार स्मृति होकर मुझे बडा विस्मय होता है, और बार-बार हर्ष होता है। (७८) मेरा मत है, कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है, वहीं श्री, विजय, शाश्वत ऐश्वर्य और नीति है। | [ उक्त सिद्धान्तका सार यह है, कि जहाँ युक्ति और शक्ति, दोनों | एकत्रित होती हैं, वहाँ निश्चयही ऋद्धि-सिद्धि निवास करती हैं, कोरी शक्तिसे | अथवा केवल युक्तिसे सदैव काम नहीं चलता। जब जरासंधका वध करनेके लिये | मंत्रणा हो रही थी, तब युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा है, कि "अन्धं बलं जडं | प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः" (मभा. सभा. २०. १६) - बल अन्धा और जड़ है, | बुद्धिमानोंको चाहिये, कि उसे मार्ग दिखलावें; तथा श्रीकृष्णनेभी यह कह कर, कि | "मयि नीतिर्बलं भीमे" (सभा. २०. ३) - मुझमें नीति है और भीमसेनके | शरीरमें बल है; भीमसेनको साथ लेकर उसके द्वारा जरासंधका वध युक्तिसे | कराया है। केवल नीति बतलानेवालेको आधा चतुर समझना चाहिये। अर्थात् | इस श्लोकमें योगेश्वरका अर्थ योग या युक्तिके ईश्वर है और धनुर्धरका योद्धा, | और यहाँ ये दोनों विशेषण हेतुपूर्वक दिये गये हैं।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए- अर्थात् कहे हुए- उपनिषद्में, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग-अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवां अध्याय समाप्त हुआ। | [ ध्यान रहे, कि "मोक्ष-संन्यासयोग 'शब्दमें' 'संन्यास' " शब्दका अर्थ | 'काम्य कर्मोंका संन्यास' है, जैसा कि इस अध्यायके आरंभमें कहा गया है, | यहाँ चतुर्थ आश्रमरूपी संन्यास विवक्षित नहीं है। इस अध्यायमें प्रतिपादन | किया गया है, कि स्वकर्मको न छोड़ कर उसे परमेश्वरमें मनसे संन्यास अर्थात्