भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 895

८५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ उपनिषदोंमें देखें, तो कर्मत्याग-प्रधान संन्यास-धर्मके वचन पाये जाते हैं, कि “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” (कै. १. २. नारायण १२. ३ ), सब कर्मोंका स्वरूपतः 'त्याग' करनेसेही कई एकोने मोक्ष प्राप्त किया है, अथवा “वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्ध सत्त्वाः” (मुंडक ३. २. ६) कर्मत्यागरूपी 'संन्यास' योगसे शुद्ध होनेवाले 'यति', या “किं प्रजया करिष्यामः” (बृ. ४. ४. २२) हमें पुत्रपौत्र आदि प्रजासे क्या काम है? अतएव अर्जुनने समझा, कि भगवान् स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित चार आश्रमोंमेसे कर्मत्यागरूपी संन्यास आश्रमके लिये 'त्याग' और 'संन्यास' शब्दोंका उपयोग नहीं करते, किंतु वे और किसी अर्थमें उन शब्दोंका उपयोग करते हैं, इसीसे अर्जुनने चाहा, कि उस अर्थका स्पष्टीकरण हो जाय । इसी हेतुसे उसने उक्त प्रश्न किया है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३४८-३५१ में इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। श्रीभगवानने कहा :- (२) (जितने) काम्य कर्म हैं, उनके न्यास अर्थात् छोड़नेको ज्ञानी लोग संन्यास समझते हैं; (तथा) समस्त कर्मोंके फलोंके त्यागको पंडित लोग त्याग कहते हैं। [इस श्लोकमें स्पष्टतया बतला दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें संन्यास और त्याग किसे कहते हैं? परंतु संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंने यह मत ग्राह्य नहीं, इस कारण उन्होंने इस श्लोककी बहुत कुछ खींचातानी की है। श्लोकके आरंभमेंही 'काम्य' शब्द आया है। अतएव इन टीकाकारोंका मत है, कि यहाँ मीमांसकोंके नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध प्रभृति कर्मभेद विवक्षित हैं; और उनकी समझमें भगवान्का अभिप्राय यह है, कि उनमेंसे केवल “काम्य कर्मोंहीको छोड़ना चाहिये।" परंतु संन्यास-मार्गीय लोगोंको नित्य और नैमित्तिक कर्मभी नहीं चाहिये, इसलिये उन्हें यों प्रतिपादन करना पड़ा है, कि यहाँ नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका काम्य कर्मोंमेंही समावेश किया गया है। इतना करने- परभी इस श्लोकके उत्तरार्धमे जो कहा गया है, कि फलाशा छोड़नी चाहिये; न कि कर्म (आगे छठा श्लोक देखिये) उसका मेल मिलताही नहीं; अतएव अंतमे इन टीकाकारोंने अपनेही मनमें यों कहकर अपना समाधान कर लिया है, कि भगवान्ने यहाँ कर्मयोग-मार्गकी कोरी स्तुति की है, उनका सच्चा अभिप्राय तो यही है, कि कर्मोंको छोड़ही देना चाहिये ! इससे स्पष्ट होता है, कि संन्यास