श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ८४९ अष्टादशोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्यायतक, चार अध्यायोंमें क्षर-अक्षर विज्ञानके अंतर्गत इस विषयका विस्तारसहित विचार किया गया है, कि प्रकृतिके गुणोंके कारण एकही अव्यक्तसे जगतके विविध स्वभावोंके मनुष्य कैसे उपजते हैं, अथवा और अनेक प्रकारका विस्तार कैसे होता है, एवं ज्ञान-विज्ञानका निरूपण समाप्त किया गया है। तथापि स्थान-स्थानपर अर्जुनको यही उपदेश है, कि तू कर्म कर; और यह सिद्धान्त किया गया है, कि शुद्ध अंतःकरणसे परमेश्वरकी भक्ति करके “ परमेश्वरार्पणपूर्वक स्वधर्मके अनुसार केवल कर्तव्य समझकर मरणपर्यंत सब कर्म करते रह यही ” कर्म- योग-प्रधान आयु बितानेका मार्ग सबसे उत्तम है, जिसमें इस प्रकार ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन कर चुकनेपर, अठारहवें अध्यायमें उसी धर्मका उपसंहार करके अर्जुनको स्वेच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त किया है। गीताके इस मार्गमें, कि जो गीतामें सर्वोत्तम कहा गया है, अर्जुनसे यह नहीं कहा गया, कि “ तू चतुर्थ आश्रमको स्वीकार करके संन्यासी हो जा । ” हाँ, यह अवश्य कहा है, कि इस मार्गके आचरण करनेवाला मनुष्य ‘नित्यसंन्यासी’ है ( गीता ५. ३ ) । अतएव अब अर्जुनका प्रश्न है, कि चतुर्थ आश्रमरूपी संन्यास लेकर किसी समय सब कर्मोंको सचमुचही त्याग देनेका तत्त्व इस कर्मयोग-मार्गमें है या नहीं, और नहीं है तो ‘संन्यास’, एवं ‘त्याग’ दोनों शब्दोंका अर्थ क्या है ? गीता प्र. ११, पृ. ३४८- ३५१ देखो । ] अर्जुनने कहा :— ( १ ) हे महाबाहु, हृषीकेश ! मैं संन्यासका तत्त्व, और हे केशिदैत्य-निषूदन ! त्यागका तत्त्व पृथक् पृथक् जानना चाहता हूँ । [ संन्यास और त्याग शब्दोंके केवल उन अर्थों अथवा भेदोंको जाननेके लिये | यह प्रश्न नहीं किया गया है, कि जो कोशकारोंने किये हैं। यह न समझन | चाहिये, कि अर्जुन यहभी न जानता था, कि दोनोंकाभी धात्वर्थ ‘छोड़ना’ है। | परंतु बात यह है, कि भगवान् कर्म छोड़ देनेकी आज्ञा कहींभी नहीं देते; बल्कि | चौथे, पाँचवें अथवा छठे अध्यायमें ( गीता ४. ४१ ; ५. १३ ; ६. १ ) या अन्यत्र | जहाँ कही संन्यासका वर्णन है, वहाँ उन्होंने यही कहा है, कि केवल फलाशाका | ‘त्याग’ करके ( गीता १२. ११ ) परमेश्वरमें सब कर्मोंका ‘संन्यास’ करो | अर्थात् सब कर्म परमेश्वरको समर्पण करो ( गीता ३. ३० ; १२. ६ ) ; और गी. र. ५४