श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवाँ अध्याय। [ अठारहवाँ अध्याय पूरे गीता-शास्त्रका उपसंहार है। अतः अबतक जो विवेचन हुआ है, उसका हम यहाँ संक्षेपमें सिंहावलोकन करते हैं ( अधिक विस्तार गीतारहस्यके १४ वें प्रकरणमें देखिये ) पहले अध्यायमे स्पष्ट होता है, कि स्वधर्मके अनुसार प्राप्त युद्धको छोड़, भीख मांगनेपर उतारू होनेवाले अर्जुनको अपने कर्तव्यमें प्रवृत्त करनेकेलिये गीताका उपदेश किया गया है। अर्जुनकी शंका थी, कि गुरुहत्या आदि सदोष कर्म करनेसे आत्मकल्याण कभी न होगा। अतएव आत्मज्ञानी पुरुषोंके स्वीकृत, आयु बितानेके दो प्रकारके मार्गोंका — सांख्य ( संन्यास ) मार्गका और कर्मयोग ( योग ) मार्गका — वर्णन दूसरे अध्यायके आरंभमेंही किया गया है; और अंतमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि यद्यपि ये दोनों मार्ग मोक्ष देते हैं, तथापि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेयस्कर है ( गीता ५. २ )। फिर तीसरे अध्यायसे लेकर पाँचवें अध्यायतक इन युक्तियोंका वर्णन है, कि कर्मयोगमें बुद्धि श्रेष्ठ समझी जाती है; बुद्धिके स्थिर और सम होनेसे कर्मकी बाधा नहीं होती; कर्म किसीकेभी नहीं छूटते; तथा उन्हें छोड़ देनाभी उचित नहीं; केवल फलाशाको त्याग देनाही काफी है; अपनेलिये न सही, लोकसंग्रहके हेतु कर्म करना आवश्यक है; बुद्धि अच्छी हो, तो ज्ञान और कर्मके बीच विरोध नहीं होता; तथा पूर्वपरंपरा देखी जाय तो ज्ञात होगा, कि जनक आदिने इसी मार्गका आचरण किया है। अनन्तर इस बातका विवेचन किया है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके लिये बुद्धिकी जिस समताकी आवश्यकता होती है, उसे कैसे प्राप्त करना चाहिये, और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए अंतमें उसीके द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त होता है। बुद्धिकी इस समताको प्राप्त करनेके लिये इंद्रियोंका निग्रह करके पूर्णतया यह जान लेना आवश्यक है, कि सब प्राणियोंमें एक परमेश्वरही भरा हुआ है, इसके अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है। अतः इंद्रिय-निग्रहका विवेचन छठे अध्यायमें किया गया है और फिर सातवें अध्यायमे सत्रहवें अध्यायतक बतलाया है, कि कर्मयोगका आचरण करते हुएही परमेश्वरका ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, और वह ज्ञान क्या है। सातवें और आठवें अध्यायमें क्षर-अक्षर अथवा व्यक्त-अव्यक्तके ज्ञान-विज्ञानका विवरण किया गया है। नवें अध्यायसे बारहवें अध्यायतक इस अभिप्रायका वर्णन किया गया है, कि यद्यपि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूप श्रेष्ठ है, तोभी इस बुद्धिको न डिगने दें, कि परमेश्वर एकही है, और व्यक्त स्वरूपकीही उपासना प्रत्यक्ष ज्ञान देनेवाली अतएव सबके लिये सुलभ है। अनन्तर तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह विचार किया गया है, कि क्षर-अक्षरके विचारमे जिसे अव्यक्त कहते हैं, वही मनुष्यके शरीरका आत्मा है। इसके पश्चात् चौदहवें