भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 879

८३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र [ यद्यपि इस श्लोकका अर्थ स्पष्ट है, तथापि इसके पदोंका अर्थ करनेमें बहुत-कुछ मतभेद है। हम समझते हैं, कि यह वर्णन उन चार्वाक आदि नास्तिकोंके मतोंका है, कि जो वेदान्त या कापिल इन दोनों सांख्यशास्त्रके सृष्टिरचनाविषयक सिद्धान्तोंको नहीं मानते; और यही कारण है, कि इस श्लोकके पदोंका अर्थ सांख्य और अध्यात्मशास्त्रके सिद्धान्तोंके विरुद्ध है। जगतको नाशवान् समझ- कर वेदान्ती उसके अविनाशी सत्यको – 'सत्यस्य सत्यं' (बृ. २. ३. ६) – खोज निकालता है और उसी सत्य तत्त्वको जगतका मूल आधार या प्रतिष्ठा मानता है – "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" (तै. २. ५)। परंतु आसुरी लोग मानते हैं, कि यह जग असत्य है, अर्थात् इसमें सत्य नहीं है, और इसीलिये वे इस जगतको, अप्रतिष्ठभी कहते हैं, अर्थात् इसकी न प्रतिष्ठा है और न आधार। परंतु यहाँ यह शंका हो सकती है, कि इस प्रकार अध्यात्मशास्त्रमें प्रतिपादित अव्यक्त परब्रह्म यदि आसुरी लोगोंको संमत न हो, तोभी उन्हें भक्तिमार्गका व्यक्त ईश्वर मान्य होगा। इसीसे अनीश्वर (अन् + ईश्वर) इस तीसरे पदका प्रयोग करके कह दिया है, कि आसुरी लोग जगतमें ईश्वरकोभी नहीं मानते। जगतका कोई मूल आधार इस प्रकार न माननेसे उपनिषदोंमे वर्णित यह सृष्ट्युत्पत्तिक्रम छोड़ देना पड़ता है, कि "आत्मन. आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्यः अन्नं। अन्नात्पुरुषः।" (तै. २. १); अथवा सांख्यशास्त्रोक्त इस सृष्ट्युत्पत्तिक्रमकोभी छोड़ देना पड़ता है, कि प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतंत्र, मूल तत्त्व हैं, एवं सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंके अन्योन्य आश्रयमे अर्थात् परस्पर मिश्रणमे सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न हुए हैं। क्योंकि यदि इस श्रृंखला या परंपराको मान लें, तो दृश्य- सृष्टिके पदार्थोंके पीछे जानेसे इस जगतका कुछ-न-कुछ मूल तत्त्व मानना पड़ेगा। इसीमे आसुरी लोग जगतके पदार्थोंको अपरस्परसंभूत मानते हैं, अर्थात् वे यह नहीं मानते, कि ये पदार्थ एक दूसरेसे किसी न किसी क्रममे उत्पन्न हुए हैं। जगतकी रचनाके संबंधमे एक बार ऐसी समझ हो जानेपर मनुष्य प्राणीही प्रधान निश्चित हो जाता है और फिर यह विचार आप-ही- आप हो जाता है, कि मनुष्यकी कामवासनाको तृप्त करनेके लियेही जगतके सारे पदार्थ बने हैं, उनका और कुछभी उपयोग नहीं है; और यही अर्थ इस श्लोकके अंतके 'किमन्यत्कामहेतुकम्' – कामको छोड़ उसका और क्या हेतु होगा? – इन शब्दोंमे, एवं आगेके श्लोकमेंभी वर्णित है। कुछ टीका- कार 'अपरस्परसंभूत' पदका अन्वय 'किमन्यत्' पदसे लगाकर यह अर्थ करते हैं, कि "क्या ऐसाभी कुछ दीख पड़ता है, जो परस्पर अर्थात् स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न न हुआ हो? नहीं; और जब ऐसा पदार्थही नहीं