भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 878

सोलहवाँ अध्याय ८३३ § § दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥ § § द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥ (५) (इनमेंसे) दैवी संपत्ति (परिणाममें) मोक्षदायक और आसुरी बंधनदायक मानी जाती है। हे पांडव ! तू दैवी संपत्तिमें जन्मा हुआ है। शोक मत कर । | [ संक्षेपमें यह बतला दिया, कि इन दो प्रकारके पुरुषोंको कौन-सी गति | मिलती है। अब आसुरी पुरुषोंका विस्तारसे वर्णन करते हैं :- ] (६) इस लोकमें दो प्रकारके प्राणी उत्पन्न हुआ करते हैं; (एक) दैव और दूसरे आसुर । (इनमेंसे) दैव (श्रेणीका) वर्णन विस्तारसे कर दिया। (अब) हे पार्थ, मैं आसुर (श्रेणीका) वर्णन करता हूँ, सुन। | [ कर्मयोगी कैसा बर्ताव करे और ब्राह्मी अवस्था कैसी होती है, या | स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त अथवा त्रिगुणातीत किसे कहना चाहिये, और ज्ञान क्या | है, इत्यादिकोंका पिछले अध्यायोंमें जो वर्णन है, और इस अध्यायके पहले | तीन श्लोकोंमें दैवी संपत्तिका जो वर्णन है, वही दैव-प्रकृतिके पुरुषका वर्णन | है, इसीसे कहा है, कि दैव श्रेणीका वर्णन पहले विस्तारसे कर चुके हैं। आसुर | संपत्तिका थोड़ा-सा उल्लेख नवे अध्यायमें (९. ११, १२) में आ चुका है; परंतु | वहाँका वर्णन अधूरा रह गया है, इस कारण उस अध्यायमें इसीको पूरा | करते हैं :- ] (७) आसुर लोग नही जानते, कि प्रवृत्ति क्या है और निवृत्ति क्या है - अर्थात् वे यह नहीं जानते, कि क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये; और उनमें न शुद्धता रहती है, न आचार और न सत्यही । (८) ये (आसुर लोग) कहते हैं, कि सारा जगत् असत्य है, अ-प्रतिष्ठ अर्थात् निराधार है, अनीश्वर याने बिना परमेश्वरका है, अ-परस्परसंभूत अर्थात् एक दूसरेके बिनाही हुआ है, (अतएव) कामको छोड़, अर्थात् मनुष्यकी विषयवासनाके अतिरिक्त, उसका और क्या हेतु हो सकता है ? गी. र. ५३