श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ८३५ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥ काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वाऽसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥ | दीख पड़ता, तब यह जगत् कामहैतुक अर्थात् स्त्री-पुरुषोंकी कामेच्छासेही निर्मित | हुआ है।” एवं कुछ लोग 'अपरञ्च परञ्च' अपरस्परौ ऐसा अद्भुत विग्रह | करके इन्हीं पदोंका यह अर्थ लगाया करते हैं, कि “'अपरस्पर' ही स्त्री-पुरुष | हैं, इन्हींसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है, इसलिये स्त्री-पुरुषोंका कामही इसका हेतु | है, और कोई कारण नहीं है।” परंतु यह अन्वय सरल नहीं है, और 'अपरञ्च | परञ्च' का समास 'अपर-पर' होगा, बीचमें सकार न आने पावेगा । इसके | अतिरिक्त असत्य, अप्रतिष्ठ आदि पहले, आये हुए पदोंके देखनेसे तो यही ज्ञात | होता है कि अ-परस्परसंभूत नञ् समासही होना चाहिये; और फिर कहना | पड़ता है, कि सांख्यशास्त्रमें 'परस्परसंभूत' शब्दसे जो “गुणोंसे गुणोंका अन्योन्य | जन” वर्णित है, वही यहाँ विवक्षित है (गीतार. प्र. १७, पृ. १५८, १५९) | 'अन्योन्य' और 'परस्पर' ये दोनों शब्द समानार्थक हैं और सांख्यशास्त्रके गुणोंके | पारस्परिक झगड़ेका वर्णन करते समय ये दोनों शब्द आते हैं (मभा. | शां. ३०५; सां. का. १२, १३) । गीतापर जो माध्वभाष्य है, उसमें इसी | अर्थको मानकर यह दिखलानेके लिये, कि जगतकी वस्तुएँ एक दूसरीमें | कैसे उपजती हैं, गीताका यही श्लोक दिया गया है - “अन्नाद्भवन्ति भूतानि” | इत्यादि - (अग्निमें छोड़ी हुई आहुति सूर्यको पहुँचती है, अतः) यज्ञसे | वृष्टि, वृष्टिसे अन्न, और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है (गीता ३. १४; | मनु. ३. ७६) । परंतु तैत्तिरीय उपनिषदका वचन इसकी अपेक्षा अधिक | प्राचीन और व्यापक है, इस कारण उसीको हमने ऊपर प्रमाणमें दिया है। | तथापि हमारा मत है, कि गीताके इस 'अ-परस्परसंभूत' पदसे उपनिषदके | सृष्ट्युत्पत्तिक्रमकी अपेक्षा सांख्योक्त सृष्ट्युत्पत्तिक्रमही अधिक विवक्षित | है। जगतकी रचनाके विषयमें ऊपर जो आसुरी मत बतलाया गया है, | उसका इन लोगोंके बर्तावपर जो प्रभाव पड़ता है, उसका अब वर्णन | करते हैं। ऊपरके श्लोकके अंतमें जो 'कामहैतुक' पद है, उसीका यह अधिक | स्पष्टीकरण है। (९) इस प्रकारकी दृष्टिको स्वीकार करके ये अल्पबुद्धिवाले नष्टात्मा और दुष्ट लोग क्रूर कर्म करते हुए जगतका क्षय करनेके लिये उत्पन्न हुआ करते हैं; (१०) (और) कभीभी पूर्ण न होनेवाले कामका अर्थात् विषयोपभोगकी इच्छाका आश्रय करके, ये (आसुरी लोग) दंभ, मान और मदमे व्याप्त होकर मोहके कारण