भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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८३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ झूठमूठ विश्वास अर्थात् मनमानी कल्पनाएँ करके गंदे काम करनेके लिये प्रवृत्त होते रहते हैं। (११) इसी प्रकार आमरणान्त ( सुख भोगनेकी ) अगणित चिंताओंसे ग्रसे हुए, कामोपभोगमे डूबे हुए और निश्चयपूर्वक उसीको सर्वस्व माननेवाले, (१२) सैकड़ो आशा-पाशोंमे जकड़े हुए, कामक्रोधपरायण होते हुए ( ये आसुरी लोग ) सुख लूटने के लिये अन्यायसे बहुत-सा अर्थ-संचय करनेकी तृष्णा करते हैं। (१३) मैंने आज यह पा लिया, (कल) उस मनोरथको सिद्ध करूँगा; यह धन ( मेरे पास ) है, और फिर वहभी मेरा होगा; (१४) इस शत्रुको मैंने मार लिया, एक औरोंकोभी मारूँगा; मैं ईश्वर. मैं (ही) भोग करनेवाला, मैं सिद्ध, बलाढ्य और सुखी हूँ, (१५) मैं संपन्न और कुलीन हूँ, मेरे समान और है कौन ? मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मैं मौज करूँगा - इस प्रकार अज्ञानसे मोहित; (१६) अनेक प्रकारकी कल्पनाओंमें भूले हुए, मोहके फंदेमें फंसे हुए और विषयोपभोगमें आसक्त ( ये आसुरी लोग ) अपवित्र नरकमें गिरते हैं ! (१७) आत्मप्रशंसा करनेवाले, ऐंठमे बर्तनेवाले, और धन और मानके मदसे संयुक्त, ये (आसुरी) लोग दंभसे शास्त्रविधि छोड़कर केवल नामके