श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीता सुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ । हो, उस ज्ञानी पुरुषकोभी इसी विरक्त-बुद्धिसे फलाशा छोड़कर शास्त्रतः प्राप्त । होनेवाले सब कर्म करतेही रहना चाहिये । इस समूचे पूर्वापर संबंधको बिना । समझे, गीतामें जहाँ कहीं 'अनिकेत' को जोडके वैराग्यबोधक शब्द मिल जावें, । तो उन्हींपर सारा दारामदार रख कर यह कह देना ठीक नहीं है, कि गीतामें । कर्मसंन्यास-प्रधान मार्गही प्रतिपाद्य है । ] (२०) ऊपर बतलाये हुए इस अमृततुल्य धर्मका जो मत्परायण होते हुए श्रद्धासे आचरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं । । [ यह वर्णन पहले हो चुका है ( गीता ६. ४७; ७. १८ ), कि भक्ति- । मान् ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है; उस वर्णनके अनुसार भगवानने इस श्लोकमें । बतलाया है, कि उनका अत्यंत प्रिय कौन है, अर्थात् यहाँ परम भगवद्भक्त । कर्मयोगीका वर्णन किया है । पर भगवान्ही गीता ९. २९ वें श्लोकमें कहते हैं, । कि “ मुझे सब एकसे हैं, कोई विशेष प्रिय अथवा द्वेष्य नहीं ।” देखनेमें यह विरोध । प्रतीत होता है सही; पर यह जान लेनेसे कोई विरोध नहीं रह जाता, कि एक । वर्णन सगुण उपासनाका अथवा भक्ति-मार्गका है; और दूसरा अध्यात्म-दृष्टि । अथवा कर्मविपाक-दृष्टिसे किया गया है । गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणके अंतमें । (पृ. ४३०-४३१ ) इस विषयका विवेचन है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग, शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें भक्तियोग नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।