भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 844, कुल 956 में से

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पृष्ठ 844

बारहवाँ अध्याय ७९९ [ 'अनिकेत' शब्द उन यतियोंके वर्णनोंमेंभी अनेक बार आया करता है, कि जो गृहस्थाश्रम छोड, संन्यास धारण करके भिक्षा माँगते हुए जंगलोंमें घूमते रहते हैं (मनु. ६. २५) और इसका धात्वर्थ 'बिना घरवाला' है। अतः इस अध्यायके 'निर्मम', 'सर्वारंभपरित्यागी' और 'अनिकेत' शब्दोंसे, तथा गीतामें अन्यत्र 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' (गीता ४. २१), अथवा 'विविक्तसेवी', (गीता १८. ५२) इत्यादि जो शब्द हैं, उनके आधारसे संन्यास-मार्गवाले टीकाकार कहते हैं, कि संन्यासाश्रम मार्गका यह परम ध्येय - "घर-द्वार छोड़ कर बिना किसी इच्छाके जंगलोंमें आयुके दिन बिताना)" - ही गीतामें प्रतिपाद्य है; और इसके लिये वे स्मृति-ग्रंथोंके संन्यास-आश्रम प्रकरणके श्लोकोंका प्रमाण दिया करते हैं। गीता-वाक्योंके ये निरे संन्यास-प्रतिपादक अर्थ संन्यास-संप्रदायकी दृष्टिसे महत्त्वके हो सकते हैं, किंतु वे सच्चे नहीं हैं। क्योंकि गीताके अनुसार 'निरग्नि' अथवा 'निष्क्रिय' होना 'सच्चा' संन्यास नहीं है; और पीछे कई बार गीताका यह स्थिर सिद्धान्त कहा जा चुका है (गीता ५. २; ६. १, २), कि केवल फलाशाको छोड़ना चाहिये, न कि कर्मको। अतः 'अनिकेत' पदका 'घर-द्वार छोड़ना' अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये कि जिसका गीताके कर्मयोगके साथ मेल मिल सके। गीताके ४. २० वें श्लोकमें कर्मफलकी आशा न रखनेवाले पुरुषकोही 'निराश्रय' विशेषण लगाया गया है; और गीता ६. १ में उसी अर्थमें 'अनाश्रितः कर्मफलं' शब्द आये हैं। 'आश्रय' और 'निकेत' इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही है। अतएव अनिकेतका गृहत्यागी अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये, कि आदिमें जिसके मनका स्थान फँसा नहीं है। इसी प्रकार ऊपर १६ वें श्लोकमें जो 'सर्वारंभपरित्यागी' शब्द है, उसका अर्थभी "सारे कर्म या उद्योगोंको छोडनेवाला" नहीं करना चाहिये, किंतु गीता ४.१९ में जो यह कहा है, कि "जिसके समारंभ फलाशा- विरहित हैं, उसके कर्म ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं" वैसाही अर्थ याने "काम्य आरंभ अर्थात् कर्म छोड़नेवाला" करना चाहिये, - यह बात गीता १८.२; ८१. ४९ से सिद्ध होती है। सारांश, जिसका चित्त घर-गृहस्थीमें, बाल- बच्चोंमें अथवा संसारके अन्यान्य कामोंमें उलझा रहता है, उसको आगे उसमे दुःख होता है। अतएव गीताका इतनाही कहना है, कि इन सब बातोंमें चित्तको फँसने न दें; और मनकी इसी विरक्त स्थितिको प्रकट करनेके लिये गीताके 'अनिकेत' और 'सर्वारंभपरित्यागी' आदि शब्द स्थितप्रज्ञके वर्णनमें आया करते हैं। यही शब्द यतियोंके अर्थात् कर्म त्यागनेवाले संन्यासियोंके वर्णनोंमेंभी स्मृतिग्रंथोंमें आये हैं। पर सिर्फ इसी बुनियादपर यह नहीं कहा जा सकता, कि कर्मत्यागरूप संन्यासही गीतामें प्रतिपाद्य है। क्योंकि, इसके साथही गीताका यह दूसराभी निश्चित सिद्धान्त है, कि जिसकी बुद्धिमें वैराग्य पूर्णतः भिद गया

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