भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 841

७९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक अच्छा है, ज्ञानकी अपेक्षा ध्यानकी योग्यता अधिक है, ध्यानकी अपेक्षा कमफलका त्याग ( श्रेष्ठ है) और (इस कर्मफलके) त्यागसे तुरंतही शांति ( प्राप्त होती है) है। | [ कर्मयोगकी दृष्टिसे ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं। इन श्लोकोंमें भक्ति- | युक्त कर्मयोगके सिद्ध होनेके लिये अभ्यास, ज्ञान-भजन आदि साधन बतलाकर, | इनके और अन्य साधनोंके तारतम्यका विचार करके अंतमें - अर्थात् १२ वें | श्लोकमें - कर्मफलके त्यागकी, अर्थात् निष्काम कर्मयोगकी, श्रेष्ठता वर्णित | है। निष्काम कर्मयोगकी श्रेष्ठताका वर्णन कुछ यहीं नहीं है; किंतु तीसरे | (३.८), पाँचवें (५. २), छठे (६. ४६) अध्यायोंमेंभी यही अर्थ स्पष्ट रीतिसे | वर्णित है; और उसके अनुसार फलत्यागरूप कर्मयोगका आचरण करनेके लियेभी | स्थान-स्थानपर अर्जुनको उपदेश किया है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०)। | परंतु जिनका संप्रदाय गीता-धर्मसे जुदा है, उनके लिये यह बात प्रतिकूल है, | इसलिये उन्होंने ऊपरके श्लोकोंका और विशेषतया १२ वें श्लोकके पदोंका अर्थ | बदलनेका प्रयत्न किया है। निरे ज्ञान-मार्गी अर्थात् सांख्य-टीकाकारोंको यह | पसंद नही है, कि ज्ञानकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग श्रेष्ठ बतलाया जावे, इसलिये | उन्होंने कहा है, कि या तो ज्ञान शब्दसे 'पुस्तकोंका ज्ञान' लेना चाहिये, अथवा | कर्मफलत्यागकी इस प्रशंसाको अर्थवादात्मक याने कोरी प्रशंसा समझनी चाहिये । | इसी प्रकार पातंजलयोगमार्गवालोंको अभ्यासकी अपेक्षा कर्मफलत्यागका बड़प्पन | नहीं सुहाता; और कोरे भक्ति-मार्गवालोंको - अर्थात् जो कहते हैं, कि भक्तिको | छोड़ दूसरे कोईभी कर्म न करो, उनको - ध्यानकी अपेक्षा अर्थात् भक्तिकी | अपेक्षा कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता मान्य नहीं है। वर्तमान समयमें लुप्त-सा हो | गया है, पातंजलयोग, ज्ञान और भक्ति, गीताका भक्तियुक्त कर्म योग-संप्रदाय | इन तीनों संप्रदायोंसे भिन्न, है और इसीसे उस संप्रदायका कोई टीकाकारभी | नहीं पाया जाता है। अतएव आजकल गीतापर जितनी टीकाएँ पाई जाती हैं, | उनमें कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता अर्थवादात्मक समझी गई है। परंतु हमारी रायमें | यह भूल है। गीतामें निष्काम कर्म योगकोही प्रतिपाद्य मान लेनेसे इस श्लोकके | अर्थके विषयमें कोईभी अड़चन नही रहती। यदि मान लिया जाय, कि कर्म | छोड़नेसे निर्वाह नही होता, निष्काम कर्म करनाही चाहिये; तो स्वरूपतः कर्मोंको | त्यागनेवाला ज्ञान-मार्ग कर्मयोगसे हलका जँचने लगता है; और इंद्रियोंकी कोरी | कसरत करनेवाला पातंजलयोग, अथवा सभी कर्मोंको छोड़ देनेवाला भक्ति-मार्गभी | कर्मयोगकी अपेक्षा कम योग्यताका सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार निष्काम | कर्मयोगकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो जानेपर यही प्रश्न रह जाता है, कि कर्मयोगमें | आवश्यक भक्तियुक्त साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये उपाय क्या है ? ये उपाय | तीन हैं - अभ्यास, ज्ञान और ध्यान। इनमेंसे यदि किसीसे अभ्यास न सधे, तो