भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 956 में से

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पृष्ठ 842

बारहवाँ अध्याय ७९७ वह ज्ञान अथवा ध्यानमेंसे किसीभी उपायको स्वीकार कर ले । गीताका कथन है, कि इन उपायोंका आचरण करना यथोक्त क्रमसे सुलभ है। १२ वें श्लोकमें कहा है, कि यदि इनमेंसे एकभी उपाय न सधे, तो मनुष्यको चाहिये, कि वह कर्मयोगके आचरण करनेकाही एकदम आरंभ कर दे । अब यहाँ एक शंका यह होती है, कि जिससे अभ्यास नहीं सधता, और जिससे ज्ञान-ध्यानभी नहीं होता, वह कर्मयोग करेगाही कैसे ? अतः कई एकोंने निश्चय किया है, कि कर्म- योगको सबकी अपेक्षा सुलभ कहनाही निरर्थक है। परंतु विचार करनेसे दीख पड़ेगा, कि इस आक्षेपमें कुछभी जान नहीं है। १२ वें श्लोकमें यह नहीं कहा है, कि सब कर्मोंके फलोंका 'एकदम' त्याग कर दे, वरन् यह कहा है, कि पहले भगवानके बतलाये हुए कर्मयोगका आश्रय करके, अर्थात् ततः, तदनंतर धीरे धीरे इस बातको अंतमें सिद्ध कर ले। और ऐसा अर्थ करनेसे कुछभी विसंगति नहीं रह जाती। पिछले अध्यायोंमें कह चुके हैं, कि कर्मफलके स्वल्प आचरणसेही नहीं (गीता २.४०), किंतु जिज्ञासा (गीता ६.४४ और टिप्पणी) हो जानेसेभी मनुष्य, कोल्हूमें धरे जैसे आप-ही-आप अंतमें सिद्धिकी ओर खींचा चला जाता है। अतएव उस मार्गकी सिद्धि पानेका पहला साधन या सीढ़ी यही है, कि कर्म- योगका आश्रय करना चाहिये - अर्थात् इस मार्गसे जानेकी मनमें इच्छा होनी चाहिये। कौन कह सकता है, कि यह साधन अभ्यास, ज्ञान और ध्यानकी अपेक्षा सुलभ नहीं है १२ वें श्लोकका भावार्थभी यही है। न केवल भगवद्गीताहीमें, किंतु सूर्य-गीतामेंभी कहा है :- ज्ञानादुपास्तिरुत्कृष्टा कर्मोत्कृष्टमुपासनात् । इति यो वेद वेदान्तैः स एव पुरुषोत्तमः ॥ “जो इस वेदान्त तत्त्वको जानता है, कि ज्ञानकी अपेक्षा उपासना अर्थात् ध्यान या भक्ति उत्कृष्ट है, एवं उपासनाकी अपेक्षा कर्म अर्थात् निष्काम कर्म श्रेष्ठ है, वही पुरुषोत्तम है" (सूर्यगी. ४. ३७)। सारांश, भगवद्गीताका निश्चित मत यह है, कि कर्मफल-त्यागरूपी योग अर्थात् ज्ञान-भक्तियुक्त निष्काम कर्मयोगही सब मार्गोंमें श्रेष्ठ है; और इसके अनुकूलही नहीं, प्रत्युत पोषक युक्तिवाद १२ वें श्लोकमें है। यदि दूसरे किसी संप्रदायको वह न रुचे, तो वे उसे छोड़ दें, परंतु अर्थकी व्यर्थ खींचातानी न करें। इस प्रकार कर्मफल-त्यागको श्रेष्ठ सिद्ध करके, उस मार्गसे जानेवालेको (स्वरूपतः कर्म छोड़नेवालेको नहीं) जो सम और शांत स्थिति अंतमें प्राप्त होती है, उसका वर्णन करके अब भगवान् बतलाते हैं, कि ऐसाही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है:- ]

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