श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 840, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ७९५ § § अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥ | अनुसार व्यवहार करनेका अर्जुनको उपदेश किया है । सारांश, ग्यारहवें अध्या- | यके अंतमें (गीता ११. ५५) जो उपदेश कर चुके हैं, यहाँ अर्जुनके प्रश्न करनेपर | उसीको दृढ कर दिया है । भक्ति-मार्गमें सुलभता क्या है ? - इसका विस्तारपूर्वक | विचार गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें कर चुके हैं, इस कारण यहाँ हम उसकी | पुनरुक्ति नहीं करते । इतनाही कह देते हैं, कि अव्यक्तकी उपासना कष्टमय | होनेपरभी मोक्षदायकही है; और भक्ति-मार्गवालोंको स्मरण रखना चाहिये, | कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको न छोड़कर उन्हेंही ईश्वरार्पणपूर्वक अवश्य करना | पड़ता है। और इसी हेतुसे छठे श्लोकमें ही सब कर्मोंका संन्यास करके 'मुझमें | ये शब्द रखे गये हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है, कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको | स्वरूपतः न छोड़ें, किंतु परमेश्वरमें उन्हें, अर्थात् उनके फलोंको, अर्पण कर दें। | इससे प्रकट होता है, कि भगवानने इस अध्यायके अंतमें जिस भक्तिमान् | पुरुषको अपना प्यारा बतलाया है, उसेभी इसी अर्थात् निष्काम कर्मयोग-मार्ग- | काही समझना चाहिये, स्वरूपतः कर्म-संन्यासीको नहीं। इस प्रकार भक्ति-मार्गकी | श्रेष्ठता और सुलभता बतला कर अब परमेश्वरकी ऐसी भक्ति करनेके उपाय | अथवा साधन बतलाते हुए उनके तारतम्यकाभी अंतमें स्पष्टीकरण करते हैं :- ] (९) अब (इस प्रकार) मुझमें भली भाँति चित्तको स्थिर करते तुझसे न बन पड़े, तो हे धनंजय ! अभ्यासकी सहायतासे अर्थात् बार-बार प्रयत्न करके मेरी प्राप्ति कर लेनेकी आशा रख । (१०) यदि अभ्यास करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मदर्थ अर्थात् मेरी प्राप्तिके अर्थ (शास्त्रोंमें बतलाये हुए ज्ञान-ध्यान-भजन-पूजा- पाठ आदि) कर्म करता जा; मदर्थ (ये) कर्म करनेसेभी तू सिद्धि पावेगा । (११) परंतु यदि इसके करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मद्योग अर्थात् मदर्पणपूर्वक योग, याने कर्मयोगका आश्रय करके यतात्मा होकर अर्थात् धीरे धीरे चित्तको रोकता हुआ, (अंतमें) सब कर्मोंके फलोंका त्याग कर दे । (१२) क्योंकि अभ्यासकी अपेक्षा ज्ञान