भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 839

७९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रु व म् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥ तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥ हैं (३) परंतु जो अनिर्देश्य अर्थात् सबके मूलमें रहनेवाले अचल, प्रत्यक्ष न दिखलाये जानेवाले, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य और कूटस्थ अर्थात् नित्य अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना (४) सब इंद्रियोंको रोककर सर्वत्र सम-बुद्धि रखते हुए करते हैं, वे सब भूतोंके हितमें निमग्न (लोगभी) मुझेही पाते हैं; (५) (तथापि) उनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त रहनेके कारण उनको अधिक क्लेश होते हैं। क्योंकि (व्यक्त देहधारी मनुष्योंको ) अव्यक्त उपासनाका मार्ग कष्टसे सिद्ध होता है। (६) परंतु जो मुझमें सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् अर्पण करके मत्परायण होते हुए अनन्य- योगसे मेरा ध्यान कर मुझे भजते हैं, (७) हे पार्थ ! मुझमें चित्त लगानेवाले उन लोगोंका, मैं इस मृत्युमय संसार-सागरसे बिना विलंब किये, उद्धार कर देता हूँ। (८) (अतएव) मुझमेंही मन लगा, मुझमें बुद्धिको स्थिर कर । जिससे तू आगे निःसंदेह मुझमेंही निवास करेगा । | [ इसमें भक्तिमार्गकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन है । दूसरे श्लोकमें पहले | यह सिद्धान्त किया है, कि भगवद्भक्त उत्तम योगी है, फिर तीसरे श्लोकमें | पक्षांतर-बोधक 'तु' अव्ययका प्रयोग कर, उसमें और चौथे श्लोकमें कहा है, कि | अव्यक्तकी उपासना करनेवालेभी मुझेही पाते हैं। परंतु इसके सत्य होनेपर- | भी पांचवें श्लोकमें यह बतलाया है, कि अव्यक्त-उपासकोका मार्ग अधिक | क्लेशदायक होता है; छठे और सातवें श्लोकमें वर्णन किया है, कि अव्यक्तकी | अपेक्षा व्यक्तकी उपासना सुलभ होती है; और अंतमें आठवें श्लोकमें उसके