श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 838, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ७९३ द्वादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच। एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच। § § मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ बारहवाँ अध्याय [ कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ कर आठवेंमें अक्षर, अनिर्देश्य और अव्यक्त ब्रह्मका स्वरूप बतलाया है; और फिर नवें अध्यायमें भक्तिरूप प्रत्यक्ष राजमार्गके निरूपणका प्रारंभ करके दसवें और ग्यारहवेंमें तदंतर्गत 'विभूतिवर्णन' एवं 'विश्वरूपदर्शन' इन दो उपाख्यानोंका वर्णन किया है, और ग्यारहवें अध्यायके अंतमें साररूपसे अर्जुनको उपदेश किया है, कि भक्तिसे एवं निःसंग-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहो। अब इसपर अर्जुनका प्रश्न है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें और आठवें अध्यायोंमें क्षर-अक्षर- विचारपूर्वक परमेश्वरके अव्यक्त रूपकोही श्रेष्ठ सिद्ध करके अव्यक्तकी अथवा अक्षरकी उपासना (७. १९, २४; ८, २१) बतलाई है, और उपदेश किया है, कि युक्तचित्तसे युद्ध कर (८. ७); एवं नवें अध्यायमें व्यक्त-उपासनारूप प्रत्यक्ष धर्म बतलाकर कहा है, कि परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सभी कर्म करने चाहिये (९. २७, ३४; ११. ५५); तो अब इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है; इस प्रश्नमें व्यक्तोपासनाका अर्थ भक्ति है। परंतु यहाँ भक्तिसे भिन्न भिन्न अनेक उपास्योंका अर्थ विवक्षित नहीं है, उपास्य अथवा प्रतीक कोईभी हो; उसमें एकही सर्वव्यापी परमेश्वरकी भावना रखकर जो भक्ति की जाती है, वही सच्ची व्यक्त उपासना है, और इस अध्यायमें वही उद्दिष्ट है।] अर्जुनने कहा :- (१) इस प्रकार सदा युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर जो भक्त तुम्हारी उपासना करते हैं; और जो अव्यक्त अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना करते हैं, उनमें उत्तम (कर्म-) योगवेत्ता कौन हैं? श्रीभगवानने कहा :- (२) मुझमें मन लगाकर सदा युक्तचित्त हो करके, परम श्रद्धासे जो मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सबसे उत्तम युक्त अर्थात् योगी