भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरके हैं, जो मत्परायण और संगविरहित है, और जो सब प्राणियोंके विषयमें निर्वैर है, वह मेरा भक्त मुझमें मिल जाता है। । [ उक्त श्लोकका आशय यह है, कि जगत्के सब व्यवहार भगवद्भक्तको । परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करने चाहिये ( ऊपर ३३ वाँ श्लोक देखो )। अर्थात् । उसे सारे व्यवहार इस निरभिमान-बुद्धिसे करने चाहिये, कि जगत्के सभी कर्म । परमेश्वरके हैं और सच्चा कर्ता और करानेवाला वही है; किंतु हमें निमित्त । बनाकर वह ये कर्म हमसे करवा रहा है; ऐसा करनेसे वे कर्म शांति अथवा । मोक्ष-प्राप्तिमें बाधक नहीं होते। शांकरभाष्यमेंभी यही कहा है, कि उक्त श्लोकमें । पूरे गीताशास्त्रका तात्पर्य आ गया है। इससे प्रकट है, कि गीताका भक्ति-मार्ग । यह नहीं कहता, कि आरामसे 'राम राम' जपा करो; प्रत्युत उसका कथन । है, कि उत्कट भक्तिके साथ-ही-साथ उत्साहसे सब निष्काम कर्म करते रहो। । संन्यासमार्गवाले कहते हैं, कि 'निर्वैर'का अर्थ निष्क्रिय है, परंतु वह अर्थ यहाँ । विवक्षित नहीं है, इसी बातको प्रकट करनेके लिये उसके साथ 'मत्कर्मकृत्' । अर्थात् "सब कर्मोंको परमेश्वरके ( अपने नहीं ) समझकर परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे । उन्हें करनेवाला" विशेषण लगाया गया है। इस विषयका विस्तृत विचार गीता- । रहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३९४-४०१) किया है।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अथवा कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।