श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ७९१ अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ श्रीभगवानुवाच । § § सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः ॥ ५२ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ §§ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ । कारण यह सिद्धान्त औरभी सुदृढ हो जाता है, कि गीता बहुत प्राचीन होगी । । गीतारहस्य परिशिष्ट प्रकरण पृ. ५१७ देखो । ] अर्जुनने कहा :- (५१) हे जनार्दन ! तुम्हारे इस सौम्य और मनुष्यदेहधारी रूपको देखकर अब मन ठिकाने आ गया और मैं पहलेकी भांति सावधान हो गया हूँ । श्रीभगवानने कहा :- (५२) मेरे जिस रूपको तूने देखा है, उसका दर्शन मिलना बहुत कठिन है । देवताभी इस रूपको देखनेकी सदैव इच्छा किये रहते हैं । (५३) जैसा तूने मुझे देखा है, वैसा मुझे वेदोंसे, तपसे, दानसे, अथवा यज्ञसेभी (कोई) देख नहीं सकता । (५४) हे अर्जुन ! केवल अनन्यभक्तिसेही इस प्रकार मेरा ज्ञान होना, मुझे देखना, और हे परंतप ! मुझमें तत्त्वसे प्रवेश करना संभव है । । [ भक्ति करनेसे परमेश्वरका पहले ज्ञान होता है, और फिर अंतमें । परमेश्वरके साथ उसका तादात्म्य हो जाता है; यही सिद्धान्त पहले ४. २९ । श्लोकमें और आगे १८. ५५ श्लोकमें फिर आया है और उसका स्पष्टीकरण । हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें ( पृ. ४२८-४२९ ) किया है । अब अर्जुनको । पूरी गीताके अर्थका सार संक्षेपमें बतलाते हैं :- ] (५५) हे पांडव ! जो इस बुद्धिसे कर्म करता है, कि सब कर्म मेरे अर्थात्