भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 835, कुल 956 में से

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पृष्ठ 835

७९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ करनेवाले, हाथमें चक्र लिये हुए तुमको देखना चाहता हूँ; (अतएव) हे सहस्रबाहु, विश्वमूर्त्ति ! उसी चतुर्भुज रूपसे प्रकट हो जाओ। श्रीभगवानने कहा :- (४७) हे अर्जुन ! (तुझपर) प्रसन्न होकर यह तेजोमय, अनन, आद्य, और परम विश्वरूप अपनी योग-सामर्थ्यसे मैंने तुझे दिखलाया है; इसे तेरे सिवा और किसीने पहले नहीं देखा है। (४८) हे कुरुवीरश्रेष्ठ ! मनुष्यलोकमें मेरा इस प्रकारका स्वरूप कोईभी वेदसे, यज्ञोंसे, स्वाध्यायसे, दानसे, कर्मोंसे, अथवा उग्र तपसे नहीं देख सकता, कि जिसे तू ने देखा है। (४९) मेरे ऐसे घोर रूपको देखकर अपने चित्तमें व्यथा न होने दे, और मूढभी मत हो जा। डर छोड़कर संतुष्ट मनसे मेरे उसी स्वरूपको फिर देख ले। संजयने कहा :- (५०) इस प्रकार भाषण करके वासुदेवने अर्जुनको फिर अपना (पहलेका) स्वरूप दिखलाया; और फिर सौम्य रूप धारण करके उस महात्माने डरे हुए अर्जुनको धीरज बँधाया। [ गीताके द्वितीय अध्यायके ५ वें से ८ वें, २० वें, २२ वें, २९ वें और ३० वें श्लोक, आठवे अध्यायके ९ वें, १० वें, ११ वें और २८ वें श्लोक, नवें अध्यायके २० और २१ वें श्लोक, पन्द्रहवें अध्यायके २ रे से ५ वें और १५ वें श्लोकका छंद विश्वरूपवर्णनके उक्त ३६ श्लोकोंके छंदके समानही है; अर्थात् इसके प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं। परंतु उनमें गणोंका कोई एक नियम नहीं है, इससे कालिदास प्रभृतिके काव्योंके इंद्रवज्रा, उपेंद्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी आदि छंदोंकी चाल पर ये श्लोक नहीं कहे जा सकते। अर्थात् यह वृत्तरचना आर्ष याने वेदसंहिताके त्रिष्टुप् वृत्तके नमूनेपर की गई है; इस

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