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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

गीतारहस्यके प्रत्येक प्रकरणके विषयोंकी अनुक्रमणिका पहला प्रकरण – विषयप्रवेश श्रीमद्भगवद्गीताकी योग्यता – गीताके अध्याय-परिसमाप्तिसूचक संकल्प – गीता शब्दका अर्थ – अन्यान्य गीताओँका वर्णन, और उनकी एवं योगवाशिष्ठ आदिकी गौणता – ग्रंथपरीक्षाके भेद – भगवद्गीताके आधुनिक बहिरंगपरीक्षक – महाभारतप्रणेताका बतलाया हुआ गीता-तात्पर्य – प्रस्थानत्रयी और उसपर सांप्रदायिक भाष्य – उनके अनुसार गीताके तात्पर्य – श्रीशंकराचार्य – मधुसूदन – तत्त्वमसि – पैशाचभाष्य – रामानुजाचार्य – मध्वाचार्य – वल्लभाचार्य – निंबार्क – श्रीधरस्वामी – ज्ञानेश्वर – सबकी दृष्टि सांप्रदायिक – सांप्रदायिक दृष्टि छोड़कर ग्रंथका तात्पर्य निकालनेकी रीति – सांप्रदायिक दृष्टिसे उसकी उपेक्षा – गीताका उपक्रम और उपसंहार – परस्परविरुद्ध नीति-धर्मोंका झगड़ा और उसमें होनेवाला कर्तव्यधर्म-मोह – उसके निवारणार्थ गीताका उपदेश। . . . . . .पृ. १-२८ दूसरा प्रकरण – कर्मजिज्ञासा कर्तव्यमूढ़ताके दो अंग्रेजी उदाहरण – इस दृष्टिसे महाभारतका महत्त्व – अहिंसाधर्म और उसके अपवाद – क्षमा और उसके अपवाद – हमारे शास्त्रोंका सत्यानृतविवेक – अंग्रेजी नीतिशास्त्रके विवेकके साथ उसकी तुलना – हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टिकी श्रेष्ठता और महत्ता – प्रतिज्ञापालन और उसकी मर्यादा – अस्तेय और उसका अपवाद – ‘मरनेसे जिंदा रहना श्रेयस्कर है’ इसके अपवाद – आत्मरक्षा – माता, पिता, गुरु प्रभृति पूज्य पुरुषोंके संबंधमें कर्तव्य और उनके अपवाद – काम, क्रोध और लोभके निग्रहका तारतम्य – धैर्य आदि गुणोंके अवसर और देशकाल आदि मर्यादा – आचारका तारतम्य – धर्म-अधर्मकी सूक्ष्मता और गीताकी अपूर्वता। . . . . . . . . . . . .पृ. २९-५१ तीसरा प्रकरण – कर्मयोगशास्त्र कर्मजिज्ञासाका महत्त्व, गीताका प्रथम अध्याय और कर्मयोगशास्त्रकी आवश्यकता – कर्म शब्दके अर्थका निर्णय – मीमांसकोंका कर्मविभाग – योग शब्दके अर्थका निर्णय – गीतामें योग = कर्मयोग, और वही प्रतिपाद्य – कर्म-अकर्मके पर्याय शब्द – शास्त्रीय प्रतिपादनके तीन पंथ आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक – इन पंथभेदोंका कारण – कॉंटका मत – गीताके अनुसार अध्यात्मदृष्टिकी श्रेष्ठता – धर्म शब्दके दो अर्थ, पारलौकिक और व्यावहारिक – चातुर्वर्ण्यादि धर्म

२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

  • जगतका धारण करता है, इसलिये धर्म - चोदनालक्षण धर्म - धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये साधारण नियम - 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' और उसके दोष - 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' और उसकी अपूर्णता - अविरोधसे धर्मनिर्णय - कर्मयोगशास्त्रका कार्य। . . . . . . . . . . . . पृ. ५२-७४ चौथा प्रकरण - आधिभौतिक सुखवाद स्वरूप-प्रस्ताव - धर्म-अधर्म-निर्णायक तत्त्व - चार्वाकका केवल स्वार्थ - हॉब्सका दूरदर्शी स्वार्थ - स्वार्थबुद्धिके समानही परोपकारबुद्धिभी नैसर्गिक - याज्ञवल्क्यका आत्मार्थ - स्वार्थ-परार्थ-उभयवाद अथवा उदात्त या उच्च स्वार्थ - उसपर आक्षेप - परार्थप्रधान पक्ष - अधिकांश लोगोंका अधिक सुख - उसपर आक्षेप - अधिकांश लोगोंका अधिक हित कौन और कैसे निश्चित करेगा - कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिका महत्त्व - परोपकार क्यों करना चाहिये - मनुष्यजातिकी पूर्ण अवस्था - श्रेय और प्रेय - सुखदुःखकी अनित्यता और नीतिधर्मकी नित्यता। पृ. ७५-९४ पाँचवा प्रकरण - सुखदुःखविवेक प्रत्येककी सुखके लिये प्रवृत्ति - सुखदुःखके लक्षण और भेद - सुख स्वतंत्र है या दुःखाभावरूप ? - संन्यासमार्गका मत - उसका खंडन - गीताका सिद्धान्त
  • सुख और दुःख, दो स्वतंत्र भाव - इस लोकमें प्राप्त होनेवाले सुखदुःख विपर्यय - संसारमें सुख अधिक, या दुःख अधिक ? - पश्चिमी सुखाधिक्यवाद - मनुष्यके आत्महत्या न करनेसे संसारका सुखमयत्व सिद्ध नहीं होता - सुखकी इच्छाकी अपार वृद्धि - सुखकी इच्छा सुखोपभोगसे तृप्त नहीं होती - अतएव संसारमें दुःखकी अधिकता - हमारे शास्त्रकारोंका तदनुकूल सिद्धान्त - शोपेनहरका मत - असंतोषका उपयोग - उसके दुष्परिणामोंको हटानेका उपाय - सुखदुःखके अनुभवकी आत्मवशता, और फलाशाका लक्षण - फलाशाको त्यागनेसेही दुःखनिवारण होता है, अतः कर्मत्यागका निषेध - इंद्रियनिग्रहकी मर्यादा - कर्मयोगकी चतुःसूत्री - शारीरिक अर्थात् आधिभौतिक सुखका पशुधर्मत्व - आत्मप्रसादज अर्थात् आध्यात्म- त्मिक सुखकी श्रेष्ठता और नित्यता - इन दोनों सुखोंकी प्राप्तिही कर्मयोगकी दृष्टिसे परम साध्य है - विषयोपभोग सुख अनित्य है और परम साध्य होनेके लिये अयोग्य है - आधिभौतिक सुखवादकी अपूर्णता। . . . . . . . . . पृ. ९५-१२३ छठा प्रकरण - आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार पश्चिमी सदसद्विवेकदेवतापक्ष - उसके समान मनोदेवताके संबंध में हमारे ग्रंथोंके वचन - आधिदैवतपक्षपर आधिभौतिकपक्षके आक्षेप - आदत और अभ्याससे कार्य-अकार्यका निर्णय शीघ्र हो जाता है - सदसद्विवेक कुछ निराली शक्ति नहीं

विषयोंकी अनुक्रमणिका २९ है – अध्यात्मपक्षके आक्षेप – मनुष्यदेहरूपी बड़ा कारखाना – कर्मेन्द्रियों और ज्ञाने- न्द्रियोंके व्यापार – मन और बुद्धिके पृथक् पृथक् काम – व्यवसायात्मका और वासनात्मक बुद्धिका भेद एवं संबंध – व्यवसायात्मका बुद्धि एकही है, परंतु, सात्त्विक आदि भेदोंसे तीन प्रकारकी है – सद्सद्विवेकबुद्धि इसीमें है, पृथक् नहीं है – क्षेत्र- क्षेत्रज्ञविचारका और क्षर-अक्षर-विचारका स्वरूप एवं कर्मयोगसे संबंध – क्षेत्र शब्दका अर्थ – क्षेत्रज्ञका अर्थात् आत्माका अस्तित्व – क्षर-अक्षर -विचारकी प्रस्तावना । . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . पृ. १२४–१४९ सातवाँ प्रकरण – कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार क्षर और अक्षरका विचार करनेवाले शास्त्र – काणादोंका परमाणुवाद – कापिलसांख्य – सांख्य शब्दका अर्थ – कापिलसांख्यविषयक ग्रंथ – सत्कार्यवाद – जगतका मूल द्रव्य अथवा प्रकृति एकही है – सत्त्व, रज और तम, उसके तीन गुण – त्रिगुणकी साम्यावस्था और पारस्परिक रगड़े-झगड़ेसे नाना पदार्थोंकी उत्पत्ति – प्रकृति अव्यक्त, अखंडित, एकरूप और अचेतन – अव्यक्तसे व्यक्त – प्रकृतिसेही मन और बुद्धिकी उत्पत्ति – सांख्यशास्त्रको हेकेलका जडाद्वैत और प्रकृतिसे आत्माकी उत्पत्ति स्वीकृत नहीं – प्रकृति और पुरुष दो स्वतंत्र तत्त्व – उनमेंसे पुरुष अकर्ता, निर्गुण और उदासीन, सारा कर्तृत्व प्रकृतिका – दोनोंके संयोगसे सृष्टिका विस्तार – प्रकृति और पुरुषके भेदको पहचान लेनेसे कैवल्यकी अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति – मोक्ष किसका, प्रकृतिका या पुरुषका ? – सांख्योंके असंख्य पुरुष और वेदान्तियोंका एक पुरुष – त्रिगुणातीत अवस्था – सांख्योंके और गीताके तत्सदृश सिद्धान्तोंके भेद । . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . पृ. १५०–१६९ आठवाँ प्रकरण – विश्वकी रचना और संहार प्रकृतिका विस्तार – ज्ञान-विज्ञानका लक्षण – भिन्न भिन्न सृष्ट्युत्पत्तिक्रम और उनकी अंतिम एकवाक्यता – आधुनिक उत्क्रांतिवादका स्वरूप और सांख्योंके गुणोत्कर्ष तत्त्वसे उसकी ममता – गुणोत्कर्षका अथवा गुणपरिणामवादका निरूपण – प्रकृतिसे प्रथम व्यवसायात्मका बुद्धिकी और फिर अहंकारकी उत्पत्ति – उसके त्रिघात अनंत भेद – अहंकारसे फिर सेंद्रिय-सृष्टिके मनसहित ग्यारह तत्त्वोंकी, और निरिंद्रिय-सृष्टिके तन्मात्ररूपी पांच तत्त्वोंकी उत्पत्ति – इस बातका निरूपण, कि तन्मात्राएँ पाँचही क्यों और सूक्ष्मइन्द्रियाँ ग्यारहही क्यों ? – सूक्ष्म सृष्टिमें स्थूल विशेष – पच्चीस तत्त्वोंका ब्रह्मांडवृक्ष – अनुगीताका ब्रह्मवृक्ष और गीताका अश्वत्थवृक्ष – पच्चीस तत्त्वोंका वर्गीकरण करनेकी सांख्योंकी तथा वेदान्तियोंकी भिन्न-भिन्न रीति – उनका नकशा – वेदान्तग्रंथोंमें वर्णित स्थूल पंचमहाभूतोंकी उत्पत्तिका क्रम–और फिर पंचीकरणसे सारे स्थूल पदार्थ – उपनिषदोंके त्रिवृत्करणमे

३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसकी तुलना - सजीव सृष्टि और लिंगशरीर - वेदान्तमें वर्णित लिंगशरीरका और सांख्यशास्त्रमे वर्णित लिंगशरीरका भेद - बुद्धिके भाव और वेदान्तका कर्म - प्रलय - उत्पत्तिकी प्रलयकाल - कल्पयुगमान - ब्रह्मा - दिन-रात और उसकी सारी आयु - सृष्टिकी उत्पत्तिके अन्य क्रमसे विरोध और एकता । पृ. १७०-१९६ नवाँ प्रकरण - अध्यात्म प्रकृति और पुरुष द्वैतपर आक्षेप - दोनोंसे परे रहनेवालेका विचार करनेकी पद्धति - दोनोंसेभी परेका एकही परमात्मा अथवा पर पुरुष - प्रकृति (जगत्), पुरुष (जीव) और परमेश्वर, यह त्रयी - गीतामें वर्णित परमेश्वरका स्वरूप - व्यक्त अथवा सगुण रूप और उसकी गौणता - अव्यक्त किंतु मायासे व्यक्त होनेवाला - अव्यक्तकेही तीन भेद, सगुण, निर्गुण और सगुण-निर्गुण - उपनिषदोंके तत्सदृश वर्णन - उपनिषदोंमें उपासनाके लिये बतलाई हुई विद्याएँ और प्रतीक - विविध अव्यक्त रूपोंमें निर्गुणही श्रेष्ठ (पृ. २०९) - उक्त सिद्धान्तोंकी शास्त्रीय उपपत्ति - निर्गुण और सगुणके गहन अर्थ - अमृतत्वकी स्वभावसिद्ध कल्पना - सृष्टिज्ञान कैसे और किसका होता है ? - ज्ञानक्रियाका वर्णन और नामरूपोंकी व्याख्या - नामरूपोंका दृश्य और वस्तुतत्त्व - सत्यकी व्याख्या - विनाशी होनेसे नामरूप असत्य हैं- और नित्य होनेसे वस्तुतत्त्व सत्य है - वस्तुतत्त्वही अक्षरब्रह्म है और नामरूप माया - सत्य और मिथ्या शब्दोंके वेदान्तशास्त्रानुसार अर्थ - आधि- भौतिक शास्त्रोंकी नामरूपात्मकता (पृ. २३३) - विज्ञानवाद वेदान्तको ग्राह्य नहीं - मायावादकी प्राचीनता - नामरूपसे आच्छादित नित्य ब्रह्मका और शारीर आत्माका स्वरूप एकही - दोनोंकोभी चिद्रूप क्यों कहते हैं ? - ब्रह्मात्मैक्य याने - 'जो पिंडमें वही ब्रह्मांड में' - ब्रह्मानन्द मैं-पनकी मृत्यु - तुरीयावस्था अथवा निर्विकल्प समाधि - अमृतत्वसीमा और मरणका मरण (पृ. २३४) - द्वैतवादकी उत्पत्ति - गीता और उपनिषद्, दोनों अद्वैत वेदांतकाही प्रतिपादन करते हैं

  • निर्गुणसे सगुण मायाकी उत्पत्ति कैसे होती है ? - विवर्तवाद और - गुण- परिणामवाद - जगत्, जीव और परमेश्वरविषयक अध्यात्मवादके संक्षिप्त सिद्धान्त (पृ. २४४) - ब्रह्मका सत्यानृतत्व - ॐ तत्सत् और अन्य ब्रह्मनिर्देश - जीव परमेश्वरका 'अंश' कैसे ? - दिक्कालसे परमेश्वर अमर्यादित (पृ. २४७-२४८)
  • अध्यात्मशास्त्रका अंतिम सिद्धान्त - देहेंद्रियोंमें भरी हुई साम्यबुद्धि - मोक्षस्वरूप और सिद्धावस्थाका वर्णन (पृ. २५१) - ऋग्वेदके नासदीय सूक्तका सार्थ विवरण - पूर्वापर प्रकरणकी संगति । ... ... पृ. १९७-२६१ दसवाँ प्रकरण - कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य मायासृष्टि और ब्रह्मसृष्टि - देहके कोश और कर्माश्रयीभूत लिंगशरीर - कर्म, नामरूप और मायाका पारस्परिक संबंध - कर्मकी और मायाकी व्याख्या - मायाका

विषयोंकी अनुक्रमणिका ३१ मूल अगम्य, इसलिये यद्यपि माया परतंत्र हो, तथापि अनादि - मायात्मक प्रकृतिका विस्तार अथवा सृष्टिही कर्म - अतएव कर्मभी अनादि - कर्मके अखंडित प्रयत्न - परमेश्वर उसमें हस्तक्षेप नहीं करता, और कर्मानुसारही फल देता है (पृ. २६९)

  • कर्मबंधकी सुदृढ़ता और प्रवृत्तिस्वातंत्र्यवादकी प्रस्तावना - कर्म-विभाग; संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण - 'प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः' - वेदान्तको मीमांसकोंका नैष्कर्म्य-सिद्धिवाद अग्राह्य है - ज्ञान बिना कर्मबंधसे छुटकारा नहीं - ज्ञान शब्दका अर्थ - ज्ञानप्राप्ति कर लेनेके लिये शारीर आत्मा स्वतंत्र है (पृ. २८४) - परंतु उसके पास कर्म करनेके निजी साधन नहीं हैं, इस कारण उतनेहीके लिये परावलंबी
  • मोक्षप्राप्त्यर्थ आचरित स्वल्प कर्मभी व्यर्थ नहीं जाता - अतः कभी-न-कभी दीर्घ उद्योग करते रहनेसे सिद्धि अवश्य मिलती है - कर्मक्षयका स्वरूप - कर्म नहीं छूटते, फलाशाको छोड़ो - कर्मका बंधकत्व मनमें है, न कि कर्ममें - इसलिये ज्ञान कभी हो, मोक्षही उसका फल - तथापि उसमेंभी अंतकालका महत्त्व (पृ. २८९) - कर्मकांड और ज्ञानकांड - श्रौतयज्ञ और स्मार्तयज्ञ - कर्मप्रधान गार्हस्थ्यवृत्ति - उसीके दो भेद, ज्ञानयुक्त और ज्ञानरहित - उसके अनुसार भिन्न भिन्न गतियाँ - देवयान और पितृयाण - कालवाचक या देवतावाचक - तीसरी नरककी गति - जीवन्मुक्तावस्थाका वर्णन। ... ... ... पृ. २६२-३०२ ग्यारहवाँ प्रकरण - संन्यास और कर्मयोग अर्जुनका प्रश्न, कि संन्यास और कर्मयोग, दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा - इस पंथके समानही पश्चिमो पंथ - संन्यास और कर्मयोगके पर्याय शब्द - संन्यास शब्दका अर्थ - कर्मयोग संन्यास मार्गका अंग नहीं है, दोनों स्वतंत्र - इस संबंधमें टीकाकारोंका गोलमाल - गीताका स्पष्ट सिद्धान्त कि इन दोनों मार्गोंमें कर्मयोगही श्रेष्ठ - संन्यासमार्गीय टीकाकारोंका किया हुआ विपर्यास - उसपर उत्तर - अर्जुनको अज्ञानी नहीं मान सकते (पृ. ३१३) - इस बातके गीतामें निर्दिष्ट कारण, कि कर्मयोगही श्रेष्ठ क्यों है - आचार अनादि कालसे द्विविध, अतः श्रेष्ठताका निर्णय करनेमें उपयोगी नहीं - जनककी तीन और गीताकी दो निष्ठाएँ
  • कर्मोंको बंधक कहनेसे, यह सिद्ध नहीं होता, कि उन्हें छोड़ देना चाहिये; फलाशा छोड़ देनेसे निर्वाह हो जाता है - कर्म छूट नहीं सकते - कर्म छोड़ देनेपर खानेके लियेभी न मिलेगा - ज्ञान हो जानेपर अपना कर्तव्य न रहे, अथवा वासनाका क्षय हो जाय, तोभी कर्म नहीं छूटते - अतएव ज्ञानप्राप्तिके पश्चातभी निःस्वार्थबुद्धिसे कर्म अवश्य करना चाहिये - भगवानका और जनकका उदाहरण - फलाशात्याग, वैराग्य और कर्मोत्साह (पृ. ३२१) - लोकसंग्रह और उसका लक्षण - ब्रह्मज्ञानका यही सच्चा पर्यवसान - तथापि वह लोकसंग्रहभी चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार और निष्काम (पृ. ३३८) - स्मृतिग्रंथोंमें वर्णित चार आश्रमोंका आयु बितानेका

३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मार्ग - गृहस्थाश्रमका महत्त्व - भागवतधर्म - भागवत और स्मार्तके मूल अर्थ - गीतामें कर्मयोग अर्थात् भागवतधर्मही प्रतिपाद्य - गीताके कर्मयोग और मीमांसकोंके कर्ममार्गका भेद - स्मार्त संन्यास और भागवत संन्यासका भेद - दोनोंकी एकता - मनुस्मृतिके वैदिक कर्मयोगकी और भागवतधर्मकी प्राचीनता - गीताके अध्याय- समाप्तिसूचक संकल्पका अर्थ - गीताकी अपूर्वता और प्रस्थानत्रयीके तीन भागोंकी सार्थकता (पृ. ३५३) - संन्यास (सांख्य) और कर्मयोग (योग), दोनों मार्गोंके भेद-अभेदका नक्शेमें संक्षिप्त वर्णन - आयु बितानेके भिन्न भिन्न मार्ग - गीताका सिद्धान्त, कि कर्मयोगही सबसे श्रेष्ठ - उस सिद्धान्तका प्रतिपादक ईशावास्योप- निषदका मंत्र - उस मंत्रपर शांकरभाष्यका विचार - मनु और अन्यान्य स्मृतियोंके ज्ञानकर्मसमुच्चयात्मक वचन । ... ... ... पृ. ३०३-३६७ बारहवाँ प्रकरण - सिद्धावस्था और व्यवहार समाजकी पूर्णावस्था - पूर्णावस्थामें सभी स्थितप्रज्ञ - नीतिकी परमावधि

  • पश्चिमी स्थितप्रज्ञ - स्थितप्रज्ञकी विधिनियमोंसे परेकी स्थिति - कर्मयोगी स्थितप्रज्ञका आचरणही परम नीति - पूर्णावस्थावाली परमावधिकी नीतिमें और लौकिक समाजकी नीतिमें भेद - दासबोधमें वर्णित उत्तम पुरुषका लक्षण - परंतु इस भेदसे नीति-धर्मकी नित्यता नहीं घटती (पृ. ३७९) - स्थितप्रज्ञ इन भेदोंको किस दृष्टिसे करता है ? - समाजका श्रेय, कल्याण अथवा सर्वभूतहित - तथापि इस बाह्य- दृष्टिकी अपेक्षा साम्यबुद्धिही श्रेष्ठ - अधिकांश लोगोंके अधिक हित और साम्यबुद्धि, इन तत्त्वोंकी तुलना - साम्यबुद्धिमे जगतमें बर्ताव करना - परोपकार और अपना निर्वाह - आत्मौपम्यबुद्धि - उसका व्यापकत्व, महत्त्व और उपपत्ति - 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पृ. ३९२) - बुद्धि सम हो जाय, तोभी पात्र-अपात्रका विचार नहीं छूटता - निर्वैरका अर्थ निष्क्रिय अथवा निष्प्रतिकार नहीं है - जैसेको तैसा - दुष्ट निग्रह - देशाभिमान, कुलाभिमान इत्यादिकी उपपत्ति - देशकाल-मर्यादापरिपालन और आत्मरक्षा - ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य - लोकसंग्रह और कर्मयोग - विषयोपसंहार
  • स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ । ... ... ... पृ. ३६८-४०६ तेरहवाँ प्रकरण - भक्तिमार्ग अल्पबुद्धिवाले साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण ब्रह्मस्वरूपकी दुर्बोधता - ज्ञान- प्राप्तिके साधन, श्रद्धा और बुद्धि - दोनोंकी परस्परापेक्षा - श्रद्धासे व्यवहारसिद्धि - श्रद्धासे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपरभी निर्वाह नही होता - मनमें उसके प्रति- फलित होनेके लिये निरतिशय और निर्हेतुक प्रेमसे परमेश्वरका चिंतन करना पड़ता है, - इसीको भक्ति कहते हैं - सगुण अव्यक्तका चिंतन कष्टमय और दुःसाध्य - अतएव उपासनाकेलिये प्रत्यक्ष वस्तु होनी चाहिये - ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग

विषयोंकी अनुक्रमणिका ३३ परिणाममें एकही - तथापि ज्ञानके समान भक्ति निष्ठा नहीं हो सकती - भक्ति करनेके लिये ग्रहण किया हुआ परमेश्वरका प्रेमगम्य और प्रत्यक्ष रूप - प्रतीक शब्दका अर्थ - राजविद्या और राजगुह्य शब्दोंके अर्थ - गीताका प्रेमरस (पृ. ४२०) - परमेश्वरकी अनेक विभूतियोंमेंसे कोईभी प्रतीक हो सकती है - बहुतेरोंके अनेक प्रतीक और उनमें होनेवाला अनर्थ - उसे टालनेका उपाय - प्रतीक और तत्संबंधी भावनामें भेद - प्रतीक कुछभी हो, भावनाके अनुसार फल

  • विभिन्न देवताओंकी उपासनाएँ - उसमेंभी फलदाता एकही परमेश्वर है, देवता नहीं - किसीभी देवताको भजो, वह परमेश्वरकाही अविधिपूर्वक भजन होता है - इस दृष्टिसे गीताके भक्तिमार्गकी श्रेष्ठता - श्रद्धा और प्रेमकी शुद्धता-अशुद्धता - उद्योग करनेसे क्रमशः सुधार और अनेक जन्मोंके पश्चात् सिद्धि - जिसे न श्रद्धा है न बुद्धि, वह डूबा - बुद्धिसे और भक्तिसे अंतमें एकही अद्वैत - ब्रह्मज्ञान होता है (पृ. ४३१) - कर्मविपाकप्रक्रियाके और अध्यात्मके सब सिद्धान्त भक्तिमार्गमेंभी स्थिर रहते हैं - उदाहरणार्थ, गीताके जीव और परमेश्वरका स्वरूप - तथापि इस सिद्धान्तमें कभी कभी शब्दभेद हो जाता है - उदा० कर्म अब परमेश्वरही हो गया - ब्रह्मार्पण और कृष्णार्पण - परंतु अर्थका अनर्थ होता हो, तो शब्दभेदभी नहीं किया जाता - गीताधर्ममें प्रतिपादित श्रद्धा और ज्ञानका मेल - भक्तिमार्गमें संन्यासधर्मकी अपेक्षा नहीं है - भक्तिका और कर्मका विरोध नहीं है - भगवद्- भक्त और लोकसंग्रह - स्वकर्मसेही भगवान्‌का यजन-पूजन - ज्ञानमार्ग त्रिवर्गके लिये है, तो भक्तिमार्ग स्त्री, शूद्र आदि सबके लिये खुला - अंतकालमेंभी अनन्य भावसे परमेश्वरके शरणापन्न होनेपर मुक्ति - अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा गीताके धर्मकी श्रेष्ठता। . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .पृ. ४०७-४४२ चौदहवाँ प्रकरण - गीताध्यायसंगति विषय-प्रतिपादनकी दो रीतियाँ - शास्त्रीय और संवादात्मक - संवादात्मक पद्धतिके गुणदोष - गीताका आरंभ - प्रथमाध्याय - द्वितीय अध्यायमें 'सांख्य' और 'योग', इन दो मार्गोंसेही आरंभ - तीसरे, चौथे और पाँचवे अध्यायमें कर्मयोगका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा साम्यबुद्धिकी श्रेष्ठता - कर्म छूट नहीं सकते - सांख्य- निष्ठाकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेयस्कर है - साम्यबुद्धिको पानेके लिये इंद्रियनिग्रहकी आवश्यकता - छठे अध्यायमें वर्णित इंद्रियनिग्रहका साधन - कर्म, भक्ति और ज्ञान, इस प्रकार गीताके तीन स्वतंत्र विभाग करना उचित नहीं है - ज्ञान और भक्ति, कर्मयोगकी साम्यबुद्धिके साधन हैं अतएव त्वम्, तत्, असि, इस प्रकारभी षडध्यायी नहीं होती - सातवे अध्यायसे लेकर बारहवें अध्यायतक ज्ञानविज्ञानका विवेचन कर्मयोगकी सिद्धिके लियेही है, स्वतंत्र नहीं है - सातवेंसे लेकर बारहवें अध्यायतकका तात्पर्य - गीताके इन अध्यायोंमेंभी भक्ति और ज्ञान पृथक् पृथक् गी. र. ३ *

३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वर्णित नहीं हैं, परस्पर एक दूसरेसे गूंथे हुए हैं, और उनका ज्ञानविज्ञान यह एकही नाम है - तेरहसे लेकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांश - अठारहवेंका उपसंहार कर्मयोगप्रधानही है - अतः मीमांसकोंकी उपक्रम - उपसंहार आदि दृष्टिसे गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य निश्चित होता है - चतुर्विध पुरुषार्थ - अर्थ और काम धर्मा- नुकूल होने चाहिये - किंतु मोक्षका और धर्मका विरोध नहीं है - गीताका संन्यासप्रधान अर्थ क्योंकर किया गया है ? - सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग - गीतामें क्या नहीं है ? - तथापि अंतमें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है - संन्यासमार्गवालोंसे प्रार्थना । ... ... ... ...पृ. ४४३-४७१ पंद्रहवाँ प्रकरण - उपसंहार कर्मयोगशास्त्र और आचारसंग्रहका भेद - यह भ्रमपूर्ण समझ, कि वेदान्तसे नीतिशास्त्रकी उपपत्ति नहीं लगती -- गीता वही उपपत्ति बतलाती है - केवल नीति- दृष्टिसे गीताधर्मका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता - नकुलोपाख्यान - ईसाइयों और बौद्धोंके तत्सदृश सिद्धान्त - 'अधिकांश लोगोंका अधिक हित' और 'मनोदैवत', इन दो पश्चिमी पक्षोंसे गीतामें प्रतिपादित साम्यबुद्धिकी तुलना - पश्चिमी आध्यात्मिक पक्षसे गीताकी उपपत्तिका समता - कांट और ग्रीनके सिद्धान्त

  • वेदान्त और नीति (पृ. ४८८) - नीतिशास्त्रमें अनेक पंथ होनेका कारण - पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें मतभेद - गीताके आध्यात्मिक उपपादनकी महत्त्वपूर्ण विशेषता - मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहारकी एकवाक्यता - ईसाइयोंका संन्यासमार्ग - सुखहेतुक पश्चिमी कर्ममार्ग - गीताके कर्ममार्गसे उसकी तुलना - चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था और नीतिधर्मके बीच भेद - दुःखनिवारक पश्चिमी कर्ममार्ग और निष्काम गीताधर्म (पृ. ४९८) - कर्मयोगका कलियुगवाला संक्षिप्त इतिहास - जैन और बौद्ध यति - शंकराचार्यके संन्यासी - मुसलमानी राज्य - भगवद्भक्त, संतमंडली और रामदास - गीताधर्मका जिंदापन - गीताधर्मकी अभयता, नित्यता और समता - ईश्वरसे प्रार्थना । ... ... ...पृ. ४७२-५०९ परिशिष्ट-प्रकरण - गीताकी बहिरंगपरीक्षा महाभारतमें, योग्य कारणोंसे उचित स्थानपर गीता कही गई है; वह प्रक्षिप्त नहीं है। भाग १. गीता और महाभारतका कर्तृत्व - गीताका वर्तमान स्वरूप - महाभारतका वर्तमान स्वरूप - महाभारतमें गीताविषयक सात उल्लेख - दोनोंके एक-से मिलतेजुलते श्लोक और भाषासादृश्य - इसी प्रकार अर्थसादृश्य - इससे सिद्ध होता है, कि गीता और महाभारत दोनोंका प्रणेता एकही है। भाग २. गीता और उपनिषदोंकी तुलना - शब्दसादृश्य और अर्थसादृश्य - गीताका अध्यात्मज्ञान उपनिषदोंकाही है - उपनिषदोंका और गीताका मायावाद -- उपनिषदोंकी अपेक्षा गीताकी विशेषता - सांख्यज्ञान और वेदान्तकी एकवाक्यता - व्यक्तोपासना अथवा

विषयाकी अनुक्रमणिका ३५ भक्तिमार्ग – परंतु कर्मयोगमार्गका प्रतिपादनही सबसे महत्वपूर्ण विशेषत – इंद्रिय- निग्रह करनेके लिये गीतामें बतलाया गया योग, पातंजल-योग और उपनिषद् । – भाग ३. गीता और ब्रह्मसूत्रोंकी पूर्वापरता – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख – ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका अनेक बार उल्लेख – दोनों ग्रंथोंके पूर्वापरका विचार – ब्रह्मसूत्र या तो वर्तमान गीताके समकालीन हैं या औरभी पुराने, बादके नहीं – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंके उल्लेख होनेका एक प्रबल कारण । – भाग ४. भागवत- धर्मका उदय और गीता – गीताका भक्तिमार्ग वेदान्त, सांख्य और योगको लिये हुए है – वेदान्तके मत गीतामें पीछेसे नहीं मिलाये गये हैं – वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप कर्मप्रधान है – तदनंतर ज्ञानका अर्थात् वेदान्त, सांख्य और वैराग्यक प्रादुर्भाव – दोनोंकी एकवाक्यता प्राचीन कालमेंही हो चुकी है – फिर भक्तिका प्रादुर्भाव – अतएव पूर्वोक्त मार्गोंके साथ पहलेसेही भक्तिकी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता – यही भागवतधर्मकी अतएव गीताकीभी दृष्टि – गीताका ज्ञान- कर्मसमुच्चय उपनिषदोंका है, परंतु भक्तिका मेल अधिक है – भागवतधर्मविषयक प्राचीन ग्रंथ, गीता और नारायणीयोपाख्यान – श्रीकृष्णका और सात्वत अथवा भागवतधर्मके उदयका काल एकही – बुद्धके पूर्व लगभग सात-आठ सौ अर्थात् ईसाके पूर्व पंद्रहसौ वर्ष – ऐसा माननेका कारण – न माननेसे होनेवाली अनवस्था – भागवतधर्मका मूलस्वरूप नैष्कर्म्यप्रधान फिर भक्तिप्रधान, और अंतमें विशिष्टा- द्वैतप्रधान – मूल गीता ईसासे प्रथम कोई नौ सौ वर्षकी है। – भाग ५. वर्तमान गीताका काल – वर्तमान महाभारत और वर्तमान गीताका समय एकही – इनमेंसे वर्तमान महाभारत भाससे, अश्वघोष, आश्वलायन, सिकंदर और मेषादि गणनाके पूर्वका, किंतु बुद्धके पश्चातका – अतएव शकसे प्रथम लगभग पाँच सौ वर्षका – वर्तमान गीता कालिदास, बाणभट्ट, भासकवि, पुराणों और बौधायनके, एवं बौद्ध-धर्मके महायान पंथकेभी प्रथमकी, अर्थात् शकसे प्रथम पाँच सौ वर्षकी – भाग ६. गीता और बौद्ध ग्रंथ–गीताके स्थितप्रज्ञके और बौद्ध अर्हतके वर्णनमें समता–बौद्ध-धर्मका स्वरूप और उससे पहलेके ब्राह्मणधर्मसे उसकी उत्पत्ति – उपनिषदोंके आत्मवादको छोड़कर केवल निवृत्तिप्रधान आचारकोही बुद्धने अंगीकार किया – बौद्धमतानुसार इस आचारके दृश्य कारण, अथवा चार आर्य सत्य – बौद्ध गार्हस्थ्यधर्म और वैदिक स्मार्तधर्ममें समता – ये सब विचार मूल वैदिक धर्मकेही हैं – तथापि महाभारत और गीताविषयक पृथक् विचार करनेका प्रयोजन – मूल अनात्मवादी और निवृत्ति- प्रधान धर्मसेही आगे चल कर भविष्यप्रधान बौद्ध-धर्मका उत्पन्न होना असंभव– महायान पंथकी उत्पत्ति – यह माननेके लिये प्रमाण, कि उसका प्रवृत्तिप्रधान भक्ति- धर्म गीतासेही ले लिया गया है – उससे निर्णीत होनेवाला गीताका समय । – भाग ७. गीता और ईसाइयोंकी बाइबल – ईसाई धर्मसे गीतामें किसीभी तत्त्वका लिया जाना असंभव – ईसाई धर्म यहूदी धर्मसे धीरे धीरे स्वतंत्र रीतिपर नहीं निकला है –

३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वह क्यों उत्पन्न हुआ है, इस विषयमें पुराने ईसाई पंडितोंकी राय – एसीन पंथ और यूनानी तत्त्वज्ञान – ईसाई धर्मके साथ बौद्ध धर्मकी अद्भुत समता – इनमें बौद्ध- धर्मकी निर्विवाद प्राचीनता – इस बातका प्रमाण, कि यहुदियोंके देशमें बौद्ध यतियोंका प्रवेश प्राचीन समयमेंही हो गया था – अतएव ईसाई धर्मके तत्त्वोंका बौद्ध-धर्मसेही अर्थात् पर्यायसे वैदिक धर्मसेही अथवा गीतासेही लिया जाना पूर्ण संभव है – इससे सिद्ध होनेवाली गीताकी निस्सन्दिग्ध प्राचीनता । पृ. ५१०-५९५

गीतारहस्यके संक्षिप्त चिन्होंका ब्योरा, और संक्षिप्त चिन्होंसे जिन ग्रंथोंका उल्लेख किया है, उनका परिचय अथर्व. अथर्व वेद । कांड, सूक्त और ऋचाके क्रमसे आगेके अंक हैं । अष्टा. अष्टावक्रगीता । अध्याय और श्लोक । अष्टेकर और मंडलीका गीतासंग्रहका संस्करण । ईश. ईशावास्योपनिषद् । आनंदाश्रमका संस्करण । ऋ. ऋग्वेद । मंडल, सूक्त और ऋचा । ऐ. अथवा ऐ. उ. ऐतरेयोपनिषद् । अध्याय, खंड और श्लोक । आनन्दाश्रमका संस्करण । ऐ. ब्रा., ऐतरेय ब्राह्मण । पंचिका और खंड । डॉ. हौडाका संस्करण । क. अथवा कठ. कठोपनिषद् । वल्ली और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । केन. केनोपनिषद् (= तलवकारोपनिषद्) । खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । कै. कैवल्योपनिषद् । खंड और मंत्र । २८ उपनिषद्, निर्णयसागरका संस्करण । कौषी. कौषीतक्युपनिषद् अथवा कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् । अध्याय और खंड । कहीं कहीं इस उपनिषदके पहले अध्यायकोही ब्राह्मणानुक्रमसे तृतीय अध्याय कहते हैं। आनंदाश्रमका संस्करण । गा. तुकाराम महाराजकी गाथा (मराठी) दामोदर सांवळाराम संस्करण, ई. सन १९०० । गी. भगवद्गीता । अध्याय और श्लोक । गी. शां. भा. गीता शांकरभाष्य । गी. रा. भा. गीता रामानुजभाष्य । आनंदाश्रमवाली गीता, और शांकर- भाष्यकी प्रतिके अंतमें शब्दोंकी सूचि है, जो अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई । हमने निम्नलिखित टीकाओंका उपयोग किया - श्रीवेंकटेश्वर प्रेसका रामा- नुजभाष्य; कुंभकोणके कृष्णाचार्यद्वारा प्रकाशित मध्वभाष्य; जगद्धितेच्छु छापाखानेमें (पूना) छपी हुई आनंदगिरीकी टीका और परमार्थप्रपा टीका; नेटिव ओपिनियन छापाखाने (बम्बई) में छपी हुई मधुसूदनी टीका; निर्णय- सागरमें छपी हुई श्रीधरी और वामनी (मराठी) टीका; आनंदाश्रममें छपा हुआ पैशाचभाष्य; गुजराती प्रिंटिंग प्रेसकी वल्लभसंप्रदायी तत्त्व- दीपिका; बम्बईमें छपे हुए महाभारतकी नीलकण्ठी; और मद्रासम छपी हुई ब्रह्मानंदी । परंतु इनमेंसे पैशाचभाष्य और ब्रह्मानंदीको छोड़कर शेष टीकाएँ और निम्बार्क संप्रदायकी एवं दूसरी कुछ और टीकाएँ - कुल पंद्रह संस्कृत टीकाएँ - गुजराती प्रिंटिंग प्रेसने अभी अभी छाप कर प्रकाशित की हैं, अतः अब इस एकही ग्रंथसे सारा काम हो जाता है ।

३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गी. र. अथवा गीतार. गीतारहस्य । हमारे ग्रंथका पहला निबंध । छां. छान्दोग्योपनिषद् । अध्याय, खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । जै. सू. जैमिनीके मीमांसासूत्र । अध्याय, पाद और सूत्र । कलकत्तेका संस्करण । ज्ञा. ज्ञानेश्वरी, साधी इंदिरा प्रेस संस्करण । तै. अथवा तै. उ. तैत्तिरीय उपनिषद् । वल्ली, अनुवाक और मन्त्र । आनंदाश्रमका संस्करण । तै. ब्रा. तैत्तिरीय ब्राह्मण । काण्ड, प्रपाठक, अनुवाक और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । तै. सं. तैत्तिरीय संहिता । काण्ड, प्रपाठक, अनुवादक और मंत्र । दा. अथवा दास. श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकृत दासबोध । धुलिया सत्कार्योत्तेजक सभाकी प्रतिका, चित्रशाला प्रेसमें छपा हुआ हिंदी अनुवाद । ना. पं. नारदपंचरात्र । कलकत्तेका संस्करण । ना. सू. नारदसूत्र । बम्बईका मंस्करण । नृसिंह. उ. नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् । पातंजलसू. पातंजलयोगसूत्र । तुकाराम तात्याका संस्करण । पंच. पंचदशी । निर्णयसागरका सटीक संस्करण । प्रश्न. प्रश्नोपनिषद् । प्रश्न और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । बृ. अथवा बृह. बृहदारण्यकोपनिषद् । अध्याय, ब्राह्मण और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । साधारण पाठ काण्व; केवल एक स्थानपर माध्यंदिन शाखाके पाठका उल्लेख है । ब्र. सू. आगे वे. सू. देखो । भाग. श्रीमद्भागवतपुराण । निर्णयसागरका संस्करण । भा. ज्यो. भारतीय ज्योतिःशास्त्र । स्वर्गीय शंकर बालकृष्ण दीक्षितकृत । मत्स्य. मत्स्यपुराण । आनंदाश्रमका संस्करण । मनु मनुस्मृति । अध्याय और श्लोक । डॉ. जालीका संस्करण । मंडलिकके अथवा अन्य किसीभी संस्करणमें यही श्लोक प्रायः एकही स्थानपर मिलेंगे । मनु पर जो टीका है, वह मंडलीकके संस्करणकी है । म. भा. श्रीमन्महाभारत । इसके आगेके अक्षर विभिन्न पर्वोके दर्शक हैं; अंकके अध्यायके और श्लोकोंके हैं । कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र रायके द्वारा मुद्रित संस्कृत प्रतिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है। बम्बईके संस्करणमें यही श्लोक कुछ आगे-पीछे मिलेंगे । मि. प्र. मिलिंदप्रश्न । पाली ग्रंथ । अंग्रेजी अनुवाद । मुं. अथवा मुंड. मुंडकोपनिषद् । मुंडक, खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण ।

संक्षिप्त चिन्होंका परिचय ३९ मैत्र्यु. मैत्र्युपनिषद् अथवा मैत्रायण्युपनिषद् । प्रपाठक और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । याज्ञ. याज्ञवल्क्यस्मृति । अध्याय और श्लोक । बम्बईका छापा हुआ । इसकी अपराके टीकाकाभी (आनंदाश्रमका संस्करण ) दो-एक स्थानोंपर उल्लेख है । यो. अथवा योग. योगवाशिष्ठ । प्रकरण, सर्ग और श्लोक । छठै प्रकरणके दो भाग हैं, (पू.) पूर्वार्ध, और (उ.) उत्तरार्ध । निर्णयसागरका सटीक संस्करण । रामपू. रामपूर्वतापिन्युपनिषद् । आनंदाश्रमका संस्करण । वाज. सं. वाजसनेयि संहिता । अध्याय और मंत्र । वेबरका संस्करण । वाल्मीकिरा. अथवा वा. रा. वाल्मीकिरामायण । कांड, अध्याय. और श्क । बम्बईका संस्करण । विष्णु. विष्णुपुराण, अंश, अध्याय और श्लोक । बम्बईका संस्करण । वेसू. वेदान्तसूत्र अथवा ब्रह्मसूत्र । अध्योय, पाद और सूत्र । वे. सू. शां. भा. वेदान्तसूत्र- शांकरभाष्य । आनंदाश्रमवाले संस्करणकाही सर्वत्र उपयोग किया है । शां. सू. शांडिल्यसूत्र । बम्बईका संस्करण । शिव. शिवगीता । अध्याय और श्लोक । अष्टेकर और मंडलीके गीतासंग्रहका संस्करण । श्वे. श्वेताश्वतरोपनिषद् । अध्याय और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । सां. का. सांख्यकारिका । तुकाराम तात्याका संस्करण । सूर्यगी. सूर्यगीता । अध्याय और श्लोक । मद्रासका संस्करण । हरि. हरिवंश । पर्व, अध्याय और श्लोक । बम्बईका संस्करण । S. B. E. - Sacred Books of the East Series. टिप्पणी :- इनके अतिरिक्त और कितनेही संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी एवं पाली ग्रंथोंका स्थान-स्थानपर उल्लेख है। परंतु उनके नाम यथास्थानपर प्रायः पूरे लिख दिये गये हैं, अथवा वे समझमें आ सकते हैं, इसलिये उनके नाम इस सूचिमें शामिल नहीं किये गये ।

लोकमान्य तिलकजीकी जन्मकुंडली, राशिकुंडली तथा जन्मकालीन स्पष्टग्रह शके १७७८ आषाढ कृष्ण ६, सूर्योदयात् गत घटि २, पल ५ जन्मकुंडली राशिकुंडली जन्मकालीन स्पष्टग्रह

रविचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतुलग्न
११११११
१९२४१७१०१७२७२७१९
१९३४२९५२१८३९३९२१
५१४६३७१७१६१६१६३१

Hindu Philosophy of Ethics. Part I.

  • अथ = ॥ श्रीमद्भगवद्गीता-रहस्य प्रारंभ कार्तिक शुद्ध १, श. १८३२ मंगले, मंडाले मंडालेके कारागृहमें लिखित गीतारहस्यकी मूल हस्तलिखित प्रथम बहीका प्रथम पृष्ठ

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ तत्सत् .

  • श्रीमद्भगवद्गीता-रहस्य - अथवा
  • कर्मयोग-शास्त्र. - प्रकरण १ लें. विषय प्रवेश . नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ महाभारत - आदिपर्व श्रीमद्भगवद्गीता हा आमच्या धर्मग्रंथांपैकीं एक अत्यंत तेजस्वी व निर्मल हिरा आहे. पिंडब्रह्मांडज्ञानपूर्वक अध्यात्म- शास्त्राचीं पवित्र तत्त्वें थोडक्यांत पण असंदिग्ध रीतीनें सांगून, त्यांच्याच आधारें, मनुष्यमात्रास या प्रपंचांत, आध्यात्मिक दृष्टीने, नेहमीं म्हणजे परम पुरुषार्थाची ओळख पटवून देणारा व त्या अनुरोधानें आपापलीं संसारांतील कर्तव्यकर्मे आचरण्याचा मार्ग दाखविणारा, ऐहिक व पारलौकिक कल्याणाचा असा अपूर्व समन्वय करणारा ग्रंथ संस्कृत वाङ्मयांत किंवा जगांतील इतर वाङ्मयांत देखील सांपडणें दुर्मीळ होय. केवळ काव्यदृष्टीनें जरी या...

श्रीगणेशाय नमः । ॐ तत्सत् । श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ▭ ▭ पहला प्रकरण विषयप्रवेश नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ *

  • महाभारत, आदिम श्लोक । श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथोंका एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है । पिंड-ब्रह्मांड-ज्ञानसहित आत्मविद्याके गूढ़ और पवित्र तत्त्वोंको थोड़ेमें और स्पष्ट रीतिसे समझा देनेवाला, उन्हीं तत्त्वोंके आधारपर मनुष्यमात्रके पुरुषार्थ- की - अर्थात् आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी - पहचान करा देनेवाला, भक्ति, और ज्ञानका मेल कराके इन दोनोंका शास्त्रोक्त व्यवहारके साथ संयोग करा देनेवाला और इसके द्वारा संसारसे त्रस्त मनुष्यको शांति देकर उसे निष्काम कर्तव्यके आचरणमें लगानेवाला गीताके समान बालबोध ग्रंथ, संस्कृतकी कौन कहे, समस्त संसारके साहित्यमेंभी नहीं मिल सकता । केवल काव्यकीही दृष्टिसे यदि इसकी परीक्षा की जाय तोभी यह ग्रंथ उत्तम काव्योंमें गिना जा सकता है; क्योंकि इसमें आत्मज्ञानके अनेक गूढ़ सिद्धान्त ऐसी प्रासादिक भाषामें लिखे गये हैं, कि वे बूढ़ों और बच्चोंको एकसमान सुगम हैं; और इसमें ज्ञानयुक्त भक्तिरसभी भरा पड़ा है । जिस ग्रंथमें समस्त वैदिक धर्मका सार स्वयं श्रीकृष्ण भगवानकी वाणीसे संगृहित
  • नारायणको, मनुष्योंमें जो श्रेष्ठ नर है उसको, सरस्वती देवीको और व्यासजीको नमस्कार करके फिर 'जय' अर्थात् महाभारतको पढ़ना चाहिये - यह

२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, उसकी योग्यताका वर्णन कैसे किया जाय ? महाभारतकी लड़ाई समाप्त होनेपर एक दिन श्रीकृष्ण और अर्जुन प्रेमपूर्वक बातचीत कर रहे थे । उस समय अर्जुनके मन इच्छा हुई कि श्रीकृष्णसे एक बार फिर गीता सुने । तुरंत अर्जुनने विनती की, " महाराज ! आपने जो उपदेश मुझे युद्धके आरंभमें दिया था उसे मैं भूल गया हूँ । कृपा करके फिर एक बार उसे बतलाइये ।" तब श्रीकृष्ण भगवानने उत्तर दिया कि — उसे " उस समय मैंने अत्यंत योगयुक्त अंतःकरणसे उपदेश किया था । अब संभव नही कि मैं वैसेही उपदेश फिर कर सकूँ ।" यह बात अनुगीताके प्रारंभ (महाभारत अश्वमेध अध्याय १६, श्लोक १० से १३) में दी हुई है । सच पूछें तो भगवान् श्रीकृष्णचंद्रके लिये कुछभी असंभव नहीं है; परंतु उनके उक्त कथनसे यह बात अच्छी तरह मालूम हो सकती है, कि गीताका महत्त्व कितना अधिक है । यह ग्रंथ, वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न संप्रदायोंमें, वेदके समान, आज क़रीब ढाई हजार वर्षोंसे सर्वमान्य तथा प्रमाणस्वरूप हो गया है; इसका कारणभी उक्त ग्रंथका महत्त्वही है । इसी लिये गीता-ध्यानमें इस स्मृतिकालीन ग्रंथका अलंकार- युक्त, परंतु यथार्थ वर्णन इस प्रकार किया गया है :- सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ अर्थात् जितने उपनिषद् हैं वे मानों गौएँ हैं, श्रीकृष्ण स्वयं दूध दुहनेवाले (ग्वाला) हैं, बुद्धिमान् अर्जुन (उन गौओंको पन्हानेवाला) भोक्ता बछड़ा (वत्स) हैं, और जो दूध दुहा गया वही मधुर गीतामृत है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, कि हिंदु- स्थानकी सब भाषाओंमें इसके अनेक अनुवाद, टीकाएँ और विवेचन हो चुके हैं; परंतु जबसे पश्चिमी विद्वानोंको संस्कृत भाषाका ज्ञान होने लगा है, तबसे ग्रीक, लेटिन, जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि यूरोपकी भाषाओंमेंभी इसके अनेक अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । तात्पर्य यह है, कि इस समय यह अद्वितीय ग्रंथ समस्त संसारमें प्रसिद्ध है । श्लोकका अर्थ है । महाभारत (उ. ४८. ७-९ और २०-२२; तथा वन. १२. ४४- ४६) में लिखा है, कि नर और नारायण ये दोनों ऋषि दो स्वरूपोंमें विभक्त - साक्षात् परमात्मा - ही हैं, और इन्हीं दोनोंने आगे चलकर अर्जुन तथा श्रीकृष्णका अवतार लिया । सब भागवतधर्मीय ग्रंथोंके आरंभमे इन्हींको प्रथम इसलिये नमस्कार करते हैं, कि निष्काम कर्म-युक्त नारायणीय तथा भागवत-धर्मको इन्होंने- ही पहलेपहल जारी किया था । इस श्लोकमे कहीं कहीं 'व्यास' के बदले 'चैव' पाठभी है; परंतु हमें यह युक्तिसंगत नहीं मालूम होता; क्योंकि, जैसे भागवत-धर्मके प्रचारक नर-नारायणको प्रणाम करना सर्वथा उचित है, वैसेही इस धर्मके दो मुख्य ग्रंथों (महाभारत और गीता) के कर्ता व्यासजीकोभी नमस्कार करना उचित है । महाभारतका प्राचीन नाम 'जय' है (महा. आ. ६२. २०) ।

विषयप्रवेश ३ इस ग्रंथमे सब उपनिषदोंका सार आ गया है; इसीसे इसका पूरा नाम ‘श्रीमद्भगवद्गीता-उपनिषत्’ है। गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमे जो अध्याय- समाप्ति-दर्शक संकल्प है, उसमें “इति श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे” इत्यादि शब्द है। यह संकल्प यद्यपि मूलग्रंथ (महा- भारत) में नहीं है, तथापि यह गीताकी सभी प्रतियोंमे पाया जाता है। इससे अनुमान होता है, कि गीताकी किसीभी प्रकारकी टीका हो जानेके पहलेही, जब महाभारतसे गीता नित्यपाठके लिये अलग निकाल ली गयी तभीसे उक्त संकल्पका प्रचार हुआ होगा। इस दृष्टिसे, गीताके तात्पर्यका निर्णय करनेके कार्यमें उसका महत्त्व कितना है, यह आगे चलकर बताया जायगा। यहाँ इस संकल्पके केवल दो पद (भगवद्गीतासु उपनिषत्सु) विचारणीय है। ‘उपनिषत्’ शब्द हिंदीमें पुल्लिंग माना जाता है; परंतु वह संस्कृतमें स्त्रीलिंग है। इसलिये “श्रीभगवान्‌ने गाया गया अर्थात् कहा गया उपनिषद्” यह अर्थ प्रकट करनेके लिये संस्कृतमे “श्रीमद्- भगवद्गीता उपनिषत्” ये दो विशेषण-विशेष्यरूप स्त्रीलिंग शब्द प्रयुक्त हुए हैं, और यद्यपि ग्रंथ एकही है, तथापि सम्मानके लिये ‘श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु’ ऐसा सप्तमीके बहुवचनका प्रयोग किया गया है। शंकराचार्यके भाष्यमेंभी इस ग्रंथको लक्ष्य करके ‘इति गीतासु’ यह बहुवचनांत प्रयोग पाया जाता है। परंतु नामको संक्षिप्त करनेके समय आदरसूचक प्रत्यय, पद तथा अंतिम सामान्य जाति- वाचक ‘उपनिषत्’ शब्दभी उड़ा दिया गया; जिससे ‘श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद्’ इन प्रथमाके एकवचनान्त शब्दोंके बदले पहले ‘भगवद्गीता’ और फिर केवल ‘गीता’- ही संक्षिप्त नाम प्रचलित हो गया। ऐसे बहुत-से संक्षिप्त नाम प्रचलित हैं। जैसे— कठ, छांदोग्य, केन इत्यादि। यदि ‘उपनिषद्’ शब्द मूल नाममे न होता तो ‘भागवतम्’, ‘भारतम्’, ‘गोपीगीतम्’ इत्यादि शब्दोंके समान इस ग्रंथका नामभी ‘भगवद्गीतम्’ या केवल ‘गीतम्’ बन जाता; जैसा कि नपुंसकलिंगके शब्दोंका स्वरूप होता है। परंतु जब कि ऐसा हुआ नहीं है और ‘भगवद्गीता’ या ‘गीता’ यही स्त्रीलिंग शब्द अबतक बना रहा है, तब उसके सामने ‘उपनिषत्’ शब्दको नित्य अध्याहृत समझना- ही चाहिये। अनुगीताकी अर्जुनमिश्रकृत टीकामे ‘अनुगीता’ शब्दका अर्थभी इसी रीतिसे किया गया है। परंतु सात सौ श्लोकोंकी भगवद्गीताकोही गीता नहीं कहते। अनेक ज्ञान- विषयक ग्रंथभी गीता कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत मोक्ष- पर्वके कुछ फुटकर प्रकरणोंको पिंगलगीता, शंपाकगीता, मंकिगीता, बोध्यगीता, विचख्युगीता, हारितगीता, वृत्रगीता, पराशरगीता और हंसगीता कहते हैं। अश्वमेध पर्वकी अनुगीताके एक भागका विशेषनाम ‘ब्राह्मणगीता’ है। इनके सिवा अवधूत- गीता, अष्टावक्रगीता, ईश्वरगीता, उत्तरगीता, कपिलगीता, गणेशगीता, देवीगीता, पाण्डवगीता, ब्रह्मगीता, भिक्षुगीता, यमगीता, रामगीता, व्यासगीता, शिवगीता,

४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूतगीता, सूर्यगीता इत्यादि अनेक गीताएँ प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे कुछ तो, स्वतंत्र रीतिसे निर्माण की गयी हैं और शेष भिन्न भिन्न पुराणोंमें हैं। जैसे, गणेशपुराणके अंतिम क्रीडाखंडके १३८ से १४८ अध्यायोंमें गणेशगीता कही गयी हैं। इसे यदि थोड़े हेर- फेरके साथ भगवद्गीताकी नक़ल कहें तो कोई हानि नहीं। कूर्मपुराणके उत्तरभागके पहले ग्यारह अध्यायोंमें ईश्वरगीता है। इसके बाद व्यासगीताका आरंभ हुआ है। स्कंदपुराणांतर्गत सूतसंहिताके चौथे अर्थात् यज्ञवैभवखंड के उपरिभागके आरंभ (१ से १२ अध्यायतक) में ब्रह्मगीता है और इसके बादके अध्यायोंमें सूतगीता, हैं। यह तो हुई आठ स्कंदपुराणकी ब्रह्मगीता; दूसरी एक और ब्रह्मगीता है, जो योगवासिष्ठके निर्वाण प्रकरणके उत्तरार्ध (सर्ग १७३ से १८१ तक) में आ गयी है। यमगीताएँ तीन प्रकारकी हैं। पहली विष्णुपुराणके तीसरे अंशके सातवें अध्यायमें; दूसरी, अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८१ वें अध्यायमें; और तीसरी, नृसिंहपुराणके आठवें अध्यायमें है। यही हाल रामगीताका है। महाराष्ट्रमें जो रामगीता प्रचलित है वह अध्यात्मरामायणके उत्तरकांडके पाँचवें सर्गमें है; और यह अध्यात्मरामायण ब्रह्मांडपुराणका एक भाग माना जाता हैं; परंतु इसके सिवा एक दूसरी रामगीता 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक ग्रंथमें है, जो मद्रासकी ओर प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ वेदान्तविषयपर लिखा गया है। इसमें ज्ञान, उपासना और कर्म-संबंधी तीन कांड हैं। इसके उपासनाकांडके द्वितीय पादके पहले अठारह अध्यायोंमें रामगीता है और कर्मकांडके तृतीय पादके पहले पाँच अध्यायोंमें सूर्यगीता है। कहते हैं कि शिवगीता पद्मपुराणके पातालखंडमें है। पर इस पुराणकी जो प्रति पूणेके आनंदाश्रममें छपी है उसमें शिवगीता नहीं है। पंडित ज्वालाप्रसादने अपने 'अष्टादशपुराणदर्शन' ग्रंथमें लिखा है कि शिवगीता गौड़ीय पद्मोत्तरपुराणमें है। नारदपुराणमें अन्य पुराणोंके साथ साथ, पद्मपुराणकीभी जो विषयानुक्रमणिका दी गयी है, उसमें शिवगीताका उल्लेख पाया जाता है। श्रीमद्- भागवतपुराणके ग्यारहवें स्कंधके तेरहवें अध्यायमें हंसगीता और तेईसवें अध्यायमें भिक्षुगीता कही गयी है। तीसरे स्कंधके कपिलोपाख्यान (अ. २३-३३) को कई लोग 'कपिलगीता' कहते हैं; परंतु 'कपिलगीता' नामक एक छपी हुई स्वतंत्र पुस्तक हमारे देखनेमें आई है, जिनमें हठयोगका प्रधानतः वर्णन किया गया है; और लिखा है, कि यह कपिलगीता पद्मपुराणसे ली गयी है; परंतु यह गीता पद्मपुराणमें हैही नहीं। इसमें एक स्थान (४. ७) पर जैन, जंगम और सूफ़ीका उल्लेख किया गया है, जिससे कहना पडता है, कि यह गीता मुसलमानी शासनकालके बादकी होगी। भागवतपुराणहीके समान देवीभागवतमेंभी, सातवें स्कंधके ३१ से ४० अध्यायतक एक गीता है, और देवीसे कही जानेके कारण उसे देवीगीता कहते हैं। केवल भगवद्गीताहीका सार अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८० वें अध्यायमें, तथा गरुडपुराणके पूर्वखंडके २४२ वें अध्यायमें दिया हुआ है। इसी तरह कहा