श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयाकी अनुक्रमणिका ३५ भक्तिमार्ग – परंतु कर्मयोगमार्गका प्रतिपादनही सबसे महत्वपूर्ण विशेषत – इंद्रिय- निग्रह करनेके लिये गीतामें बतलाया गया योग, पातंजल-योग और उपनिषद् । – भाग ३. गीता और ब्रह्मसूत्रोंकी पूर्वापरता – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख – ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका अनेक बार उल्लेख – दोनों ग्रंथोंके पूर्वापरका विचार – ब्रह्मसूत्र या तो वर्तमान गीताके समकालीन हैं या औरभी पुराने, बादके नहीं – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंके उल्लेख होनेका एक प्रबल कारण । – भाग ४. भागवत- धर्मका उदय और गीता – गीताका भक्तिमार्ग वेदान्त, सांख्य और योगको लिये हुए है – वेदान्तके मत गीतामें पीछेसे नहीं मिलाये गये हैं – वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप कर्मप्रधान है – तदनंतर ज्ञानका अर्थात् वेदान्त, सांख्य और वैराग्यक प्रादुर्भाव – दोनोंकी एकवाक्यता प्राचीन कालमेंही हो चुकी है – फिर भक्तिका प्रादुर्भाव – अतएव पूर्वोक्त मार्गोंके साथ पहलेसेही भक्तिकी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता – यही भागवतधर्मकी अतएव गीताकीभी दृष्टि – गीताका ज्ञान- कर्मसमुच्चय उपनिषदोंका है, परंतु भक्तिका मेल अधिक है – भागवतधर्मविषयक प्राचीन ग्रंथ, गीता और नारायणीयोपाख्यान – श्रीकृष्णका और सात्वत अथवा भागवतधर्मके उदयका काल एकही – बुद्धके पूर्व लगभग सात-आठ सौ अर्थात् ईसाके पूर्व पंद्रहसौ वर्ष – ऐसा माननेका कारण – न माननेसे होनेवाली अनवस्था – भागवतधर्मका मूलस्वरूप नैष्कर्म्यप्रधान फिर भक्तिप्रधान, और अंतमें विशिष्टा- द्वैतप्रधान – मूल गीता ईसासे प्रथम कोई नौ सौ वर्षकी है। – भाग ५. वर्तमान गीताका काल – वर्तमान महाभारत और वर्तमान गीताका समय एकही – इनमेंसे वर्तमान महाभारत भाससे, अश्वघोष, आश्वलायन, सिकंदर और मेषादि गणनाके पूर्वका, किंतु बुद्धके पश्चातका – अतएव शकसे प्रथम लगभग पाँच सौ वर्षका – वर्तमान गीता कालिदास, बाणभट्ट, भासकवि, पुराणों और बौधायनके, एवं बौद्ध-धर्मके महायान पंथकेभी प्रथमकी, अर्थात् शकसे प्रथम पाँच सौ वर्षकी – भाग ६. गीता और बौद्ध ग्रंथ–गीताके स्थितप्रज्ञके और बौद्ध अर्हतके वर्णनमें समता–बौद्ध-धर्मका स्वरूप और उससे पहलेके ब्राह्मणधर्मसे उसकी उत्पत्ति – उपनिषदोंके आत्मवादको छोड़कर केवल निवृत्तिप्रधान आचारकोही बुद्धने अंगीकार किया – बौद्धमतानुसार इस आचारके दृश्य कारण, अथवा चार आर्य सत्य – बौद्ध गार्हस्थ्यधर्म और वैदिक स्मार्तधर्ममें समता – ये सब विचार मूल वैदिक धर्मकेही हैं – तथापि महाभारत और गीताविषयक पृथक् विचार करनेका प्रयोजन – मूल अनात्मवादी और निवृत्ति- प्रधान धर्मसेही आगे चल कर भविष्यप्रधान बौद्ध-धर्मका उत्पन्न होना असंभव– महायान पंथकी उत्पत्ति – यह माननेके लिये प्रमाण, कि उसका प्रवृत्तिप्रधान भक्ति- धर्म गीतासेही ले लिया गया है – उससे निर्णीत होनेवाला गीताका समय । – भाग ७. गीता और ईसाइयोंकी बाइबल – ईसाई धर्मसे गीतामें किसीभी तत्त्वका लिया जाना असंभव – ईसाई धर्म यहूदी धर्मसे धीरे धीरे स्वतंत्र रीतिपर नहीं निकला है –