श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वर्णित नहीं हैं, परस्पर एक दूसरेसे गूंथे हुए हैं, और उनका ज्ञानविज्ञान यह एकही नाम है - तेरहसे लेकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांश - अठारहवेंका उपसंहार कर्मयोगप्रधानही है - अतः मीमांसकोंकी उपक्रम - उपसंहार आदि दृष्टिसे गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य निश्चित होता है - चतुर्विध पुरुषार्थ - अर्थ और काम धर्मा- नुकूल होने चाहिये - किंतु मोक्षका और धर्मका विरोध नहीं है - गीताका संन्यासप्रधान अर्थ क्योंकर किया गया है ? - सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग - गीतामें क्या नहीं है ? - तथापि अंतमें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है - संन्यासमार्गवालोंसे प्रार्थना । ... ... ... ...पृ. ४४३-४७१ पंद्रहवाँ प्रकरण - उपसंहार कर्मयोगशास्त्र और आचारसंग्रहका भेद - यह भ्रमपूर्ण समझ, कि वेदान्तसे नीतिशास्त्रकी उपपत्ति नहीं लगती -- गीता वही उपपत्ति बतलाती है - केवल नीति- दृष्टिसे गीताधर्मका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता - नकुलोपाख्यान - ईसाइयों और बौद्धोंके तत्सदृश सिद्धान्त - 'अधिकांश लोगोंका अधिक हित' और 'मनोदैवत', इन दो पश्चिमी पक्षोंसे गीतामें प्रतिपादित साम्यबुद्धिकी तुलना - पश्चिमी आध्यात्मिक पक्षसे गीताकी उपपत्तिका समता - कांट और ग्रीनके सिद्धान्त
- वेदान्त और नीति (पृ. ४८८) - नीतिशास्त्रमें अनेक पंथ होनेका कारण - पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें मतभेद - गीताके आध्यात्मिक उपपादनकी महत्त्वपूर्ण विशेषता - मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहारकी एकवाक्यता - ईसाइयोंका संन्यासमार्ग - सुखहेतुक पश्चिमी कर्ममार्ग - गीताके कर्ममार्गसे उसकी तुलना - चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था और नीतिधर्मके बीच भेद - दुःखनिवारक पश्चिमी कर्ममार्ग और निष्काम गीताधर्म (पृ. ४९८) - कर्मयोगका कलियुगवाला संक्षिप्त इतिहास - जैन और बौद्ध यति - शंकराचार्यके संन्यासी - मुसलमानी राज्य - भगवद्भक्त, संतमंडली और रामदास - गीताधर्मका जिंदापन - गीताधर्मकी अभयता, नित्यता और समता - ईश्वरसे प्रार्थना । ... ... ...पृ. ४७२-५०९ परिशिष्ट-प्रकरण - गीताकी बहिरंगपरीक्षा महाभारतमें, योग्य कारणोंसे उचित स्थानपर गीता कही गई है; वह प्रक्षिप्त नहीं है। भाग १. गीता और महाभारतका कर्तृत्व - गीताका वर्तमान स्वरूप - महाभारतका वर्तमान स्वरूप - महाभारतमें गीताविषयक सात उल्लेख - दोनोंके एक-से मिलतेजुलते श्लोक और भाषासादृश्य - इसी प्रकार अर्थसादृश्य - इससे सिद्ध होता है, कि गीता और महाभारत दोनोंका प्रणेता एकही है। भाग २. गीता और उपनिषदोंकी तुलना - शब्दसादृश्य और अर्थसादृश्य - गीताका अध्यात्मज्ञान उपनिषदोंकाही है - उपनिषदोंका और गीताका मायावाद -- उपनिषदोंकी अपेक्षा गीताकी विशेषता - सांख्यज्ञान और वेदान्तकी एकवाक्यता - व्यक्तोपासना अथवा