भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 956 में से

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पृष्ठ 38

विषयोंकी अनुक्रमणिका ३३ परिणाममें एकही - तथापि ज्ञानके समान भक्ति निष्ठा नहीं हो सकती - भक्ति करनेके लिये ग्रहण किया हुआ परमेश्वरका प्रेमगम्य और प्रत्यक्ष रूप - प्रतीक शब्दका अर्थ - राजविद्या और राजगुह्य शब्दोंके अर्थ - गीताका प्रेमरस (पृ. ४२०) - परमेश्वरकी अनेक विभूतियोंमेंसे कोईभी प्रतीक हो सकती है - बहुतेरोंके अनेक प्रतीक और उनमें होनेवाला अनर्थ - उसे टालनेका उपाय - प्रतीक और तत्संबंधी भावनामें भेद - प्रतीक कुछभी हो, भावनाके अनुसार फल

  • विभिन्न देवताओंकी उपासनाएँ - उसमेंभी फलदाता एकही परमेश्वर है, देवता नहीं - किसीभी देवताको भजो, वह परमेश्वरकाही अविधिपूर्वक भजन होता है - इस दृष्टिसे गीताके भक्तिमार्गकी श्रेष्ठता - श्रद्धा और प्रेमकी शुद्धता-अशुद्धता - उद्योग करनेसे क्रमशः सुधार और अनेक जन्मोंके पश्चात् सिद्धि - जिसे न श्रद्धा है न बुद्धि, वह डूबा - बुद्धिसे और भक्तिसे अंतमें एकही अद्वैत - ब्रह्मज्ञान होता है (पृ. ४३१) - कर्मविपाकप्रक्रियाके और अध्यात्मके सब सिद्धान्त भक्तिमार्गमेंभी स्थिर रहते हैं - उदाहरणार्थ, गीताके जीव और परमेश्वरका स्वरूप - तथापि इस सिद्धान्तमें कभी कभी शब्दभेद हो जाता है - उदा० कर्म अब परमेश्वरही हो गया - ब्रह्मार्पण और कृष्णार्पण - परंतु अर्थका अनर्थ होता हो, तो शब्दभेदभी नहीं किया जाता - गीताधर्ममें प्रतिपादित श्रद्धा और ज्ञानका मेल - भक्तिमार्गमें संन्यासधर्मकी अपेक्षा नहीं है - भक्तिका और कर्मका विरोध नहीं है - भगवद्- भक्त और लोकसंग्रह - स्वकर्मसेही भगवान्‌का यजन-पूजन - ज्ञानमार्ग त्रिवर्गके लिये है, तो भक्तिमार्ग स्त्री, शूद्र आदि सबके लिये खुला - अंतकालमेंभी अनन्य भावसे परमेश्वरके शरणापन्न होनेपर मुक्ति - अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा गीताके धर्मकी श्रेष्ठता। . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .पृ. ४०७-४४२ चौदहवाँ प्रकरण - गीताध्यायसंगति विषय-प्रतिपादनकी दो रीतियाँ - शास्त्रीय और संवादात्मक - संवादात्मक पद्धतिके गुणदोष - गीताका आरंभ - प्रथमाध्याय - द्वितीय अध्यायमें 'सांख्य' और 'योग', इन दो मार्गोंसेही आरंभ - तीसरे, चौथे और पाँचवे अध्यायमें कर्मयोगका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा साम्यबुद्धिकी श्रेष्ठता - कर्म छूट नहीं सकते - सांख्य- निष्ठाकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेयस्कर है - साम्यबुद्धिको पानेके लिये इंद्रियनिग्रहकी आवश्यकता - छठे अध्यायमें वर्णित इंद्रियनिग्रहका साधन - कर्म, भक्ति और ज्ञान, इस प्रकार गीताके तीन स्वतंत्र विभाग करना उचित नहीं है - ज्ञान और भक्ति, कर्मयोगकी साम्यबुद्धिके साधन हैं अतएव त्वम्, तत्, असि, इस प्रकारभी षडध्यायी नहीं होती - सातवे अध्यायसे लेकर बारहवें अध्यायतक ज्ञानविज्ञानका विवेचन कर्मयोगकी सिद्धिके लियेही है, स्वतंत्र नहीं है - सातवेंसे लेकर बारहवें अध्यायतकका तात्पर्य - गीताके इन अध्यायोंमेंभी भक्ति और ज्ञान पृथक् पृथक् गी. र. ३ *
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