श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मार्ग - गृहस्थाश्रमका महत्त्व - भागवतधर्म - भागवत और स्मार्तके मूल अर्थ - गीतामें कर्मयोग अर्थात् भागवतधर्मही प्रतिपाद्य - गीताके कर्मयोग और मीमांसकोंके कर्ममार्गका भेद - स्मार्त संन्यास और भागवत संन्यासका भेद - दोनोंकी एकता - मनुस्मृतिके वैदिक कर्मयोगकी और भागवतधर्मकी प्राचीनता - गीताके अध्याय- समाप्तिसूचक संकल्पका अर्थ - गीताकी अपूर्वता और प्रस्थानत्रयीके तीन भागोंकी सार्थकता (पृ. ३५३) - संन्यास (सांख्य) और कर्मयोग (योग), दोनों मार्गोंके भेद-अभेदका नक्शेमें संक्षिप्त वर्णन - आयु बितानेके भिन्न भिन्न मार्ग - गीताका सिद्धान्त, कि कर्मयोगही सबसे श्रेष्ठ - उस सिद्धान्तका प्रतिपादक ईशावास्योप- निषदका मंत्र - उस मंत्रपर शांकरभाष्यका विचार - मनु और अन्यान्य स्मृतियोंके ज्ञानकर्मसमुच्चयात्मक वचन । ... ... ... पृ. ३०३-३६७ बारहवाँ प्रकरण - सिद्धावस्था और व्यवहार समाजकी पूर्णावस्था - पूर्णावस्थामें सभी स्थितप्रज्ञ - नीतिकी परमावधि
- पश्चिमी स्थितप्रज्ञ - स्थितप्रज्ञकी विधिनियमोंसे परेकी स्थिति - कर्मयोगी स्थितप्रज्ञका आचरणही परम नीति - पूर्णावस्थावाली परमावधिकी नीतिमें और लौकिक समाजकी नीतिमें भेद - दासबोधमें वर्णित उत्तम पुरुषका लक्षण - परंतु इस भेदसे नीति-धर्मकी नित्यता नहीं घटती (पृ. ३७९) - स्थितप्रज्ञ इन भेदोंको किस दृष्टिसे करता है ? - समाजका श्रेय, कल्याण अथवा सर्वभूतहित - तथापि इस बाह्य- दृष्टिकी अपेक्षा साम्यबुद्धिही श्रेष्ठ - अधिकांश लोगोंके अधिक हित और साम्यबुद्धि, इन तत्त्वोंकी तुलना - साम्यबुद्धिमे जगतमें बर्ताव करना - परोपकार और अपना निर्वाह - आत्मौपम्यबुद्धि - उसका व्यापकत्व, महत्त्व और उपपत्ति - 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पृ. ३९२) - बुद्धि सम हो जाय, तोभी पात्र-अपात्रका विचार नहीं छूटता - निर्वैरका अर्थ निष्क्रिय अथवा निष्प्रतिकार नहीं है - जैसेको तैसा - दुष्ट निग्रह - देशाभिमान, कुलाभिमान इत्यादिकी उपपत्ति - देशकाल-मर्यादापरिपालन और आत्मरक्षा - ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य - लोकसंग्रह और कर्मयोग - विषयोपसंहार
- स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ । ... ... ... पृ. ३६८-४०६ तेरहवाँ प्रकरण - भक्तिमार्ग अल्पबुद्धिवाले साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण ब्रह्मस्वरूपकी दुर्बोधता - ज्ञान- प्राप्तिके साधन, श्रद्धा और बुद्धि - दोनोंकी परस्परापेक्षा - श्रद्धासे व्यवहारसिद्धि - श्रद्धासे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपरभी निर्वाह नही होता - मनमें उसके प्रति- फलित होनेके लिये निरतिशय और निर्हेतुक प्रेमसे परमेश्वरका चिंतन करना पड़ता है, - इसीको भक्ति कहते हैं - सगुण अव्यक्तका चिंतन कष्टमय और दुःसाध्य - अतएव उपासनाकेलिये प्रत्यक्ष वस्तु होनी चाहिये - ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग