श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मार्ग - गृहस्थाश्रमका महत्त्व - भागवतधर्म - भागवत और स्मार्तके मूल अर्थ - गीतामें कर्मयोग अर्थात् भागवतधर्मही प्रतिपाद्य - गीताके कर्मयोग और मीमांसकोंके कर्ममार्गका भेद - स्मार्त संन्यास और भागवत संन्यासका भेद - दोनोंकी एकता - मनुस्मृतिके वैदिक कर्मयोगकी और भागवतधर्मकी प्राचीनता - गीताके अध्याय- समाप्तिसूचक संकल्पका अर्थ - गीताकी अपूर्वता और प्रस्थानत्रयीके तीन भागोंकी सार्थकता (पृ. ३५३) - संन्यास (सांख्य) और कर्मयोग (योग), दोनों मार्गोंके भेद-अभेदका नक्शेमें संक्षिप्त वर्णन - आयु बितानेके भिन्न भिन्न मार्ग - गीताका सिद्धान्त, कि कर्मयोगही सबसे श्रेष्ठ - उस सिद्धान्तका प्रतिपादक ईशावास्योप- निषदका मंत्र - उस मंत्रपर शांकरभाष्यका विचार - मनु और अन्यान्य स्मृतियोंके ज्ञानकर्मसमुच्चयात्मक वचन । ... ... ... पृ. ३०३-३६७ बारहवाँ प्रकरण - सिद्धावस्था और व्यवहार समाजकी पूर्णावस्था - पूर्णावस्थामें सभी स्थितप्रज्ञ - नीतिकी परमावधि
- पश्चिमी स्थितप्रज्ञ - स्थितप्रज्ञकी विधिनियमोंसे परेकी स्थिति - कर्मयोगी स्थितप्रज्ञका आचरणही परम नीति - पूर्णावस्थावाली परमावधिकी नीतिमें और लौकिक समाजकी नीतिमें भेद - दासबोधमें वर्णित उत्तम पुरुषका लक्षण - परंतु इस भेदसे नीति-धर्मकी नित्यता नहीं घटती (पृ. ३७९) - स्थितप्रज्ञ इन भेदोंको किस दृष्टिसे करता है ? - समाजका श्रेय, कल्याण अथवा सर्वभूतहित - तथापि इस बाह्य- दृष्टिकी अपेक्षा साम्यबुद्धिही श्रेष्ठ - अधिकांश लोगोंके अधिक हित और साम्यबुद्धि, इन तत्त्वोंकी तुलना - साम्यबुद्धिमे जगतमें बर्ताव करना - परोपकार और अपना निर्वाह - आत्मौपम्यबुद्धि - उसका व्यापकत्व, महत्त्व और उपपत्ति - 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पृ. ३९२) - बुद्धि सम हो जाय, तोभी पात्र-अपात्रका विचार नहीं छूटता - निर्वैरका अर्थ निष्क्रिय अथवा निष्प्रतिकार नहीं है - जैसेको तैसा - दुष्ट निग्रह - देशाभिमान, कुलाभिमान इत्यादिकी उपपत्ति - देशकाल-मर्यादापरिपालन और आत्मरक्षा - ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य - लोकसंग्रह और कर्मयोग - विषयोपसंहार
- स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ । ... ... ... पृ. ३६८-४०६ तेरहवाँ प्रकरण - भक्तिमार्ग अल्पबुद्धिवाले साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण ब्रह्मस्वरूपकी दुर्बोधता - ज्ञान- प्राप्तिके साधन, श्रद्धा और बुद्धि - दोनोंकी परस्परापेक्षा - श्रद्धासे व्यवहारसिद्धि - श्रद्धासे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपरभी निर्वाह नही होता - मनमें उसके प्रति- फलित होनेके लिये निरतिशय और निर्हेतुक प्रेमसे परमेश्वरका चिंतन करना पड़ता है, - इसीको भक्ति कहते हैं - सगुण अव्यक्तका चिंतन कष्टमय और दुःसाध्य - अतएव उपासनाकेलिये प्रत्यक्ष वस्तु होनी चाहिये - ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग
विषयोंकी अनुक्रमणिका ३३ परिणाममें एकही - तथापि ज्ञानके समान भक्ति निष्ठा नहीं हो सकती - भक्ति करनेके लिये ग्रहण किया हुआ परमेश्वरका प्रेमगम्य और प्रत्यक्ष रूप - प्रतीक शब्दका अर्थ - राजविद्या और राजगुह्य शब्दोंके अर्थ - गीताका प्रेमरस (पृ. ४२०) - परमेश्वरकी अनेक विभूतियोंमेंसे कोईभी प्रतीक हो सकती है - बहुतेरोंके अनेक प्रतीक और उनमें होनेवाला अनर्थ - उसे टालनेका उपाय - प्रतीक और तत्संबंधी भावनामें भेद - प्रतीक कुछभी हो, भावनाके अनुसार फल
- विभिन्न देवताओंकी उपासनाएँ - उसमेंभी फलदाता एकही परमेश्वर है, देवता नहीं - किसीभी देवताको भजो, वह परमेश्वरकाही अविधिपूर्वक भजन होता है - इस दृष्टिसे गीताके भक्तिमार्गकी श्रेष्ठता - श्रद्धा और प्रेमकी शुद्धता-अशुद्धता - उद्योग करनेसे क्रमशः सुधार और अनेक जन्मोंके पश्चात् सिद्धि - जिसे न श्रद्धा है न बुद्धि, वह डूबा - बुद्धिसे और भक्तिसे अंतमें एकही अद्वैत - ब्रह्मज्ञान होता है (पृ. ४३१) - कर्मविपाकप्रक्रियाके और अध्यात्मके सब सिद्धान्त भक्तिमार्गमेंभी स्थिर रहते हैं - उदाहरणार्थ, गीताके जीव और परमेश्वरका स्वरूप - तथापि इस सिद्धान्तमें कभी कभी शब्दभेद हो जाता है - उदा० कर्म अब परमेश्वरही हो गया - ब्रह्मार्पण और कृष्णार्पण - परंतु अर्थका अनर्थ होता हो, तो शब्दभेदभी नहीं किया जाता - गीताधर्ममें प्रतिपादित श्रद्धा और ज्ञानका मेल - भक्तिमार्गमें संन्यासधर्मकी अपेक्षा नहीं है - भक्तिका और कर्मका विरोध नहीं है - भगवद्- भक्त और लोकसंग्रह - स्वकर्मसेही भगवान्का यजन-पूजन - ज्ञानमार्ग त्रिवर्गके लिये है, तो भक्तिमार्ग स्त्री, शूद्र आदि सबके लिये खुला - अंतकालमेंभी अनन्य भावसे परमेश्वरके शरणापन्न होनेपर मुक्ति - अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा गीताके धर्मकी श्रेष्ठता। . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .पृ. ४०७-४४२ चौदहवाँ प्रकरण - गीताध्यायसंगति विषय-प्रतिपादनकी दो रीतियाँ - शास्त्रीय और संवादात्मक - संवादात्मक पद्धतिके गुणदोष - गीताका आरंभ - प्रथमाध्याय - द्वितीय अध्यायमें 'सांख्य' और 'योग', इन दो मार्गोंसेही आरंभ - तीसरे, चौथे और पाँचवे अध्यायमें कर्मयोगका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा साम्यबुद्धिकी श्रेष्ठता - कर्म छूट नहीं सकते - सांख्य- निष्ठाकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेयस्कर है - साम्यबुद्धिको पानेके लिये इंद्रियनिग्रहकी आवश्यकता - छठे अध्यायमें वर्णित इंद्रियनिग्रहका साधन - कर्म, भक्ति और ज्ञान, इस प्रकार गीताके तीन स्वतंत्र विभाग करना उचित नहीं है - ज्ञान और भक्ति, कर्मयोगकी साम्यबुद्धिके साधन हैं अतएव त्वम्, तत्, असि, इस प्रकारभी षडध्यायी नहीं होती - सातवे अध्यायसे लेकर बारहवें अध्यायतक ज्ञानविज्ञानका विवेचन कर्मयोगकी सिद्धिके लियेही है, स्वतंत्र नहीं है - सातवेंसे लेकर बारहवें अध्यायतकका तात्पर्य - गीताके इन अध्यायोंमेंभी भक्ति और ज्ञान पृथक् पृथक् गी. र. ३ *
३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वर्णित नहीं हैं, परस्पर एक दूसरेसे गूंथे हुए हैं, और उनका ज्ञानविज्ञान यह एकही नाम है - तेरहसे लेकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांश - अठारहवेंका उपसंहार कर्मयोगप्रधानही है - अतः मीमांसकोंकी उपक्रम - उपसंहार आदि दृष्टिसे गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य निश्चित होता है - चतुर्विध पुरुषार्थ - अर्थ और काम धर्मा- नुकूल होने चाहिये - किंतु मोक्षका और धर्मका विरोध नहीं है - गीताका संन्यासप्रधान अर्थ क्योंकर किया गया है ? - सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग - गीतामें क्या नहीं है ? - तथापि अंतमें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है - संन्यासमार्गवालोंसे प्रार्थना । ... ... ... ...पृ. ४४३-४७१ पंद्रहवाँ प्रकरण - उपसंहार कर्मयोगशास्त्र और आचारसंग्रहका भेद - यह भ्रमपूर्ण समझ, कि वेदान्तसे नीतिशास्त्रकी उपपत्ति नहीं लगती -- गीता वही उपपत्ति बतलाती है - केवल नीति- दृष्टिसे गीताधर्मका विवेचन - कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता - नकुलोपाख्यान - ईसाइयों और बौद्धोंके तत्सदृश सिद्धान्त - 'अधिकांश लोगोंका अधिक हित' और 'मनोदैवत', इन दो पश्चिमी पक्षोंसे गीतामें प्रतिपादित साम्यबुद्धिकी तुलना - पश्चिमी आध्यात्मिक पक्षसे गीताकी उपपत्तिका समता - कांट और ग्रीनके सिद्धान्त
- वेदान्त और नीति (पृ. ४८८) - नीतिशास्त्रमें अनेक पंथ होनेका कारण - पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें मतभेद - गीताके आध्यात्मिक उपपादनकी महत्त्वपूर्ण विशेषता - मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहारकी एकवाक्यता - ईसाइयोंका संन्यासमार्ग - सुखहेतुक पश्चिमी कर्ममार्ग - गीताके कर्ममार्गसे उसकी तुलना - चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था और नीतिधर्मके बीच भेद - दुःखनिवारक पश्चिमी कर्ममार्ग और निष्काम गीताधर्म (पृ. ४९८) - कर्मयोगका कलियुगवाला संक्षिप्त इतिहास - जैन और बौद्ध यति - शंकराचार्यके संन्यासी - मुसलमानी राज्य - भगवद्भक्त, संतमंडली और रामदास - गीताधर्मका जिंदापन - गीताधर्मकी अभयता, नित्यता और समता - ईश्वरसे प्रार्थना । ... ... ...पृ. ४७२-५०९ परिशिष्ट-प्रकरण - गीताकी बहिरंगपरीक्षा महाभारतमें, योग्य कारणोंसे उचित स्थानपर गीता कही गई है; वह प्रक्षिप्त नहीं है। भाग १. गीता और महाभारतका कर्तृत्व - गीताका वर्तमान स्वरूप - महाभारतका वर्तमान स्वरूप - महाभारतमें गीताविषयक सात उल्लेख - दोनोंके एक-से मिलतेजुलते श्लोक और भाषासादृश्य - इसी प्रकार अर्थसादृश्य - इससे सिद्ध होता है, कि गीता और महाभारत दोनोंका प्रणेता एकही है। भाग २. गीता और उपनिषदोंकी तुलना - शब्दसादृश्य और अर्थसादृश्य - गीताका अध्यात्मज्ञान उपनिषदोंकाही है - उपनिषदोंका और गीताका मायावाद -- उपनिषदोंकी अपेक्षा गीताकी विशेषता - सांख्यज्ञान और वेदान्तकी एकवाक्यता - व्यक्तोपासना अथवा
विषयाकी अनुक्रमणिका ३५ भक्तिमार्ग – परंतु कर्मयोगमार्गका प्रतिपादनही सबसे महत्वपूर्ण विशेषत – इंद्रिय- निग्रह करनेके लिये गीतामें बतलाया गया योग, पातंजल-योग और उपनिषद् । – भाग ३. गीता और ब्रह्मसूत्रोंकी पूर्वापरता – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख – ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका अनेक बार उल्लेख – दोनों ग्रंथोंके पूर्वापरका विचार – ब्रह्मसूत्र या तो वर्तमान गीताके समकालीन हैं या औरभी पुराने, बादके नहीं – गीतामें ब्रह्मसूत्रोंके उल्लेख होनेका एक प्रबल कारण । – भाग ४. भागवत- धर्मका उदय और गीता – गीताका भक्तिमार्ग वेदान्त, सांख्य और योगको लिये हुए है – वेदान्तके मत गीतामें पीछेसे नहीं मिलाये गये हैं – वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप कर्मप्रधान है – तदनंतर ज्ञानका अर्थात् वेदान्त, सांख्य और वैराग्यक प्रादुर्भाव – दोनोंकी एकवाक्यता प्राचीन कालमेंही हो चुकी है – फिर भक्तिका प्रादुर्भाव – अतएव पूर्वोक्त मार्गोंके साथ पहलेसेही भक्तिकी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता – यही भागवतधर्मकी अतएव गीताकीभी दृष्टि – गीताका ज्ञान- कर्मसमुच्चय उपनिषदोंका है, परंतु भक्तिका मेल अधिक है – भागवतधर्मविषयक प्राचीन ग्रंथ, गीता और नारायणीयोपाख्यान – श्रीकृष्णका और सात्वत अथवा भागवतधर्मके उदयका काल एकही – बुद्धके पूर्व लगभग सात-आठ सौ अर्थात् ईसाके पूर्व पंद्रहसौ वर्ष – ऐसा माननेका कारण – न माननेसे होनेवाली अनवस्था – भागवतधर्मका मूलस्वरूप नैष्कर्म्यप्रधान फिर भक्तिप्रधान, और अंतमें विशिष्टा- द्वैतप्रधान – मूल गीता ईसासे प्रथम कोई नौ सौ वर्षकी है। – भाग ५. वर्तमान गीताका काल – वर्तमान महाभारत और वर्तमान गीताका समय एकही – इनमेंसे वर्तमान महाभारत भाससे, अश्वघोष, आश्वलायन, सिकंदर और मेषादि गणनाके पूर्वका, किंतु बुद्धके पश्चातका – अतएव शकसे प्रथम लगभग पाँच सौ वर्षका – वर्तमान गीता कालिदास, बाणभट्ट, भासकवि, पुराणों और बौधायनके, एवं बौद्ध-धर्मके महायान पंथकेभी प्रथमकी, अर्थात् शकसे प्रथम पाँच सौ वर्षकी – भाग ६. गीता और बौद्ध ग्रंथ–गीताके स्थितप्रज्ञके और बौद्ध अर्हतके वर्णनमें समता–बौद्ध-धर्मका स्वरूप और उससे पहलेके ब्राह्मणधर्मसे उसकी उत्पत्ति – उपनिषदोंके आत्मवादको छोड़कर केवल निवृत्तिप्रधान आचारकोही बुद्धने अंगीकार किया – बौद्धमतानुसार इस आचारके दृश्य कारण, अथवा चार आर्य सत्य – बौद्ध गार्हस्थ्यधर्म और वैदिक स्मार्तधर्ममें समता – ये सब विचार मूल वैदिक धर्मकेही हैं – तथापि महाभारत और गीताविषयक पृथक् विचार करनेका प्रयोजन – मूल अनात्मवादी और निवृत्ति- प्रधान धर्मसेही आगे चल कर भविष्यप्रधान बौद्ध-धर्मका उत्पन्न होना असंभव– महायान पंथकी उत्पत्ति – यह माननेके लिये प्रमाण, कि उसका प्रवृत्तिप्रधान भक्ति- धर्म गीतासेही ले लिया गया है – उससे निर्णीत होनेवाला गीताका समय । – भाग ७. गीता और ईसाइयोंकी बाइबल – ईसाई धर्मसे गीतामें किसीभी तत्त्वका लिया जाना असंभव – ईसाई धर्म यहूदी धर्मसे धीरे धीरे स्वतंत्र रीतिपर नहीं निकला है –
३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वह क्यों उत्पन्न हुआ है, इस विषयमें पुराने ईसाई पंडितोंकी राय – एसीन पंथ और यूनानी तत्त्वज्ञान – ईसाई धर्मके साथ बौद्ध धर्मकी अद्भुत समता – इनमें बौद्ध- धर्मकी निर्विवाद प्राचीनता – इस बातका प्रमाण, कि यहुदियोंके देशमें बौद्ध यतियोंका प्रवेश प्राचीन समयमेंही हो गया था – अतएव ईसाई धर्मके तत्त्वोंका बौद्ध-धर्मसेही अर्थात् पर्यायसे वैदिक धर्मसेही अथवा गीतासेही लिया जाना पूर्ण संभव है – इससे सिद्ध होनेवाली गीताकी निस्सन्दिग्ध प्राचीनता । पृ. ५१०-५९५
गीतारहस्यके संक्षिप्त चिन्होंका ब्योरा, और संक्षिप्त चिन्होंसे जिन ग्रंथोंका उल्लेख किया है, उनका परिचय अथर्व. अथर्व वेद । कांड, सूक्त और ऋचाके क्रमसे आगेके अंक हैं । अष्टा. अष्टावक्रगीता । अध्याय और श्लोक । अष्टेकर और मंडलीका गीतासंग्रहका संस्करण । ईश. ईशावास्योपनिषद् । आनंदाश्रमका संस्करण । ऋ. ऋग्वेद । मंडल, सूक्त और ऋचा । ऐ. अथवा ऐ. उ. ऐतरेयोपनिषद् । अध्याय, खंड और श्लोक । आनन्दाश्रमका संस्करण । ऐ. ब्रा., ऐतरेय ब्राह्मण । पंचिका और खंड । डॉ. हौडाका संस्करण । क. अथवा कठ. कठोपनिषद् । वल्ली और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । केन. केनोपनिषद् (= तलवकारोपनिषद्) । खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । कै. कैवल्योपनिषद् । खंड और मंत्र । २८ उपनिषद्, निर्णयसागरका संस्करण । कौषी. कौषीतक्युपनिषद् अथवा कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् । अध्याय और खंड । कहीं कहीं इस उपनिषदके पहले अध्यायकोही ब्राह्मणानुक्रमसे तृतीय अध्याय कहते हैं। आनंदाश्रमका संस्करण । गा. तुकाराम महाराजकी गाथा (मराठी) दामोदर सांवळाराम संस्करण, ई. सन १९०० । गी. भगवद्गीता । अध्याय और श्लोक । गी. शां. भा. गीता शांकरभाष्य । गी. रा. भा. गीता रामानुजभाष्य । आनंदाश्रमवाली गीता, और शांकर- भाष्यकी प्रतिके अंतमें शब्दोंकी सूचि है, जो अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई । हमने निम्नलिखित टीकाओंका उपयोग किया - श्रीवेंकटेश्वर प्रेसका रामा- नुजभाष्य; कुंभकोणके कृष्णाचार्यद्वारा प्रकाशित मध्वभाष्य; जगद्धितेच्छु छापाखानेमें (पूना) छपी हुई आनंदगिरीकी टीका और परमार्थप्रपा टीका; नेटिव ओपिनियन छापाखाने (बम्बई) में छपी हुई मधुसूदनी टीका; निर्णय- सागरमें छपी हुई श्रीधरी और वामनी (मराठी) टीका; आनंदाश्रममें छपा हुआ पैशाचभाष्य; गुजराती प्रिंटिंग प्रेसकी वल्लभसंप्रदायी तत्त्व- दीपिका; बम्बईमें छपे हुए महाभारतकी नीलकण्ठी; और मद्रासम छपी हुई ब्रह्मानंदी । परंतु इनमेंसे पैशाचभाष्य और ब्रह्मानंदीको छोड़कर शेष टीकाएँ और निम्बार्क संप्रदायकी एवं दूसरी कुछ और टीकाएँ - कुल पंद्रह संस्कृत टीकाएँ - गुजराती प्रिंटिंग प्रेसने अभी अभी छाप कर प्रकाशित की हैं, अतः अब इस एकही ग्रंथसे सारा काम हो जाता है ।
३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गी. र. अथवा गीतार. गीतारहस्य । हमारे ग्रंथका पहला निबंध । छां. छान्दोग्योपनिषद् । अध्याय, खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । जै. सू. जैमिनीके मीमांसासूत्र । अध्याय, पाद और सूत्र । कलकत्तेका संस्करण । ज्ञा. ज्ञानेश्वरी, साधी इंदिरा प्रेस संस्करण । तै. अथवा तै. उ. तैत्तिरीय उपनिषद् । वल्ली, अनुवाक और मन्त्र । आनंदाश्रमका संस्करण । तै. ब्रा. तैत्तिरीय ब्राह्मण । काण्ड, प्रपाठक, अनुवाक और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । तै. सं. तैत्तिरीय संहिता । काण्ड, प्रपाठक, अनुवादक और मंत्र । दा. अथवा दास. श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकृत दासबोध । धुलिया सत्कार्योत्तेजक सभाकी प्रतिका, चित्रशाला प्रेसमें छपा हुआ हिंदी अनुवाद । ना. पं. नारदपंचरात्र । कलकत्तेका संस्करण । ना. सू. नारदसूत्र । बम्बईका मंस्करण । नृसिंह. उ. नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् । पातंजलसू. पातंजलयोगसूत्र । तुकाराम तात्याका संस्करण । पंच. पंचदशी । निर्णयसागरका सटीक संस्करण । प्रश्न. प्रश्नोपनिषद् । प्रश्न और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । बृ. अथवा बृह. बृहदारण्यकोपनिषद् । अध्याय, ब्राह्मण और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । साधारण पाठ काण्व; केवल एक स्थानपर माध्यंदिन शाखाके पाठका उल्लेख है । ब्र. सू. आगे वे. सू. देखो । भाग. श्रीमद्भागवतपुराण । निर्णयसागरका संस्करण । भा. ज्यो. भारतीय ज्योतिःशास्त्र । स्वर्गीय शंकर बालकृष्ण दीक्षितकृत । मत्स्य. मत्स्यपुराण । आनंदाश्रमका संस्करण । मनु मनुस्मृति । अध्याय और श्लोक । डॉ. जालीका संस्करण । मंडलिकके अथवा अन्य किसीभी संस्करणमें यही श्लोक प्रायः एकही स्थानपर मिलेंगे । मनु पर जो टीका है, वह मंडलीकके संस्करणकी है । म. भा. श्रीमन्महाभारत । इसके आगेके अक्षर विभिन्न पर्वोके दर्शक हैं; अंकके अध्यायके और श्लोकोंके हैं । कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र रायके द्वारा मुद्रित संस्कृत प्रतिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है। बम्बईके संस्करणमें यही श्लोक कुछ आगे-पीछे मिलेंगे । मि. प्र. मिलिंदप्रश्न । पाली ग्रंथ । अंग्रेजी अनुवाद । मुं. अथवा मुंड. मुंडकोपनिषद् । मुंडक, खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण ।
संक्षिप्त चिन्होंका परिचय ३९ मैत्र्यु. मैत्र्युपनिषद् अथवा मैत्रायण्युपनिषद् । प्रपाठक और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । याज्ञ. याज्ञवल्क्यस्मृति । अध्याय और श्लोक । बम्बईका छापा हुआ । इसकी अपराके टीकाकाभी (आनंदाश्रमका संस्करण ) दो-एक स्थानोंपर उल्लेख है । यो. अथवा योग. योगवाशिष्ठ । प्रकरण, सर्ग और श्लोक । छठै प्रकरणके दो भाग हैं, (पू.) पूर्वार्ध, और (उ.) उत्तरार्ध । निर्णयसागरका सटीक संस्करण । रामपू. रामपूर्वतापिन्युपनिषद् । आनंदाश्रमका संस्करण । वाज. सं. वाजसनेयि संहिता । अध्याय और मंत्र । वेबरका संस्करण । वाल्मीकिरा. अथवा वा. रा. वाल्मीकिरामायण । कांड, अध्याय. और श्क । बम्बईका संस्करण । विष्णु. विष्णुपुराण, अंश, अध्याय और श्लोक । बम्बईका संस्करण । वेसू. वेदान्तसूत्र अथवा ब्रह्मसूत्र । अध्योय, पाद और सूत्र । वे. सू. शां. भा. वेदान्तसूत्र- शांकरभाष्य । आनंदाश्रमवाले संस्करणकाही सर्वत्र उपयोग किया है । शां. सू. शांडिल्यसूत्र । बम्बईका संस्करण । शिव. शिवगीता । अध्याय और श्लोक । अष्टेकर और मंडलीके गीतासंग्रहका संस्करण । श्वे. श्वेताश्वतरोपनिषद् । अध्याय और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । सां. का. सांख्यकारिका । तुकाराम तात्याका संस्करण । सूर्यगी. सूर्यगीता । अध्याय और श्लोक । मद्रासका संस्करण । हरि. हरिवंश । पर्व, अध्याय और श्लोक । बम्बईका संस्करण । S. B. E. - Sacred Books of the East Series. टिप्पणी :- इनके अतिरिक्त और कितनेही संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी एवं पाली ग्रंथोंका स्थान-स्थानपर उल्लेख है। परंतु उनके नाम यथास्थानपर प्रायः पूरे लिख दिये गये हैं, अथवा वे समझमें आ सकते हैं, इसलिये उनके नाम इस सूचिमें शामिल नहीं किये गये ।
लोकमान्य तिलकजीकी जन्मकुंडली, राशिकुंडली तथा जन्मकालीन स्पष्टग्रह शके १७७८ आषाढ कृष्ण ६, सूर्योदयात् गत घटि २, पल ५ जन्मकुंडली राशिकुंडली जन्मकालीन स्पष्टग्रह
| रवि | चंद्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु | लग्न |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | ११ | ६ | २ | ११ | ३ | २ | ११ | ५ | ३ |
| ८ | १९ | ४ | २४ | १७ | १० | १७ | २७ | २७ | १९ |
| १९ | ३ | ३४ | २९ | ५२ | ८ | १८ | ३९ | ३९ | २१ |
| ५१ | ४६ | ३७ | १७ | १६ | २ | ७ | १६ | १६ | ३१ |
Hindu Philosophy of Ethics. Part I.
- अथ = ॥ श्रीमद्भगवद्गीता-रहस्य प्रारंभ कार्तिक शुद्ध १, श. १८३२ मंगले, मंडाले मंडालेके कारागृहमें लिखित गीतारहस्यकी मूल हस्तलिखित प्रथम बहीका प्रथम पृष्ठ
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ तत्सत् .
- श्रीमद्भगवद्गीता-रहस्य - अथवा
- कर्मयोग-शास्त्र. - प्रकरण १ लें. विषय प्रवेश . नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ महाभारत - आदिपर्व श्रीमद्भगवद्गीता हा आमच्या धर्मग्रंथांपैकीं एक अत्यंत तेजस्वी व निर्मल हिरा आहे. पिंडब्रह्मांडज्ञानपूर्वक अध्यात्म- शास्त्राचीं पवित्र तत्त्वें थोडक्यांत पण असंदिग्ध रीतीनें सांगून, त्यांच्याच आधारें, मनुष्यमात्रास या प्रपंचांत, आध्यात्मिक दृष्टीने, नेहमीं म्हणजे परम पुरुषार्थाची ओळख पटवून देणारा व त्या अनुरोधानें आपापलीं संसारांतील कर्तव्यकर्मे आचरण्याचा मार्ग दाखविणारा, ऐहिक व पारलौकिक कल्याणाचा असा अपूर्व समन्वय करणारा ग्रंथ संस्कृत वाङ्मयांत किंवा जगांतील इतर वाङ्मयांत देखील सांपडणें दुर्मीळ होय. केवळ काव्यदृष्टीनें जरी या...
श्रीगणेशाय नमः । ॐ तत्सत् । श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ▭ ▭ पहला प्रकरण विषयप्रवेश नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ *
- महाभारत, आदिम श्लोक । श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथोंका एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है । पिंड-ब्रह्मांड-ज्ञानसहित आत्मविद्याके गूढ़ और पवित्र तत्त्वोंको थोड़ेमें और स्पष्ट रीतिसे समझा देनेवाला, उन्हीं तत्त्वोंके आधारपर मनुष्यमात्रके पुरुषार्थ- की - अर्थात् आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी - पहचान करा देनेवाला, भक्ति, और ज्ञानका मेल कराके इन दोनोंका शास्त्रोक्त व्यवहारके साथ संयोग करा देनेवाला और इसके द्वारा संसारसे त्रस्त मनुष्यको शांति देकर उसे निष्काम कर्तव्यके आचरणमें लगानेवाला गीताके समान बालबोध ग्रंथ, संस्कृतकी कौन कहे, समस्त संसारके साहित्यमेंभी नहीं मिल सकता । केवल काव्यकीही दृष्टिसे यदि इसकी परीक्षा की जाय तोभी यह ग्रंथ उत्तम काव्योंमें गिना जा सकता है; क्योंकि इसमें आत्मज्ञानके अनेक गूढ़ सिद्धान्त ऐसी प्रासादिक भाषामें लिखे गये हैं, कि वे बूढ़ों और बच्चोंको एकसमान सुगम हैं; और इसमें ज्ञानयुक्त भक्तिरसभी भरा पड़ा है । जिस ग्रंथमें समस्त वैदिक धर्मका सार स्वयं श्रीकृष्ण भगवानकी वाणीसे संगृहित
- नारायणको, मनुष्योंमें जो श्रेष्ठ नर है उसको, सरस्वती देवीको और व्यासजीको नमस्कार करके फिर 'जय' अर्थात् महाभारतको पढ़ना चाहिये - यह
२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, उसकी योग्यताका वर्णन कैसे किया जाय ? महाभारतकी लड़ाई समाप्त होनेपर एक दिन श्रीकृष्ण और अर्जुन प्रेमपूर्वक बातचीत कर रहे थे । उस समय अर्जुनके मन इच्छा हुई कि श्रीकृष्णसे एक बार फिर गीता सुने । तुरंत अर्जुनने विनती की, " महाराज ! आपने जो उपदेश मुझे युद्धके आरंभमें दिया था उसे मैं भूल गया हूँ । कृपा करके फिर एक बार उसे बतलाइये ।" तब श्रीकृष्ण भगवानने उत्तर दिया कि — उसे " उस समय मैंने अत्यंत योगयुक्त अंतःकरणसे उपदेश किया था । अब संभव नही कि मैं वैसेही उपदेश फिर कर सकूँ ।" यह बात अनुगीताके प्रारंभ (महाभारत अश्वमेध अध्याय १६, श्लोक १० से १३) में दी हुई है । सच पूछें तो भगवान् श्रीकृष्णचंद्रके लिये कुछभी असंभव नहीं है; परंतु उनके उक्त कथनसे यह बात अच्छी तरह मालूम हो सकती है, कि गीताका महत्त्व कितना अधिक है । यह ग्रंथ, वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न संप्रदायोंमें, वेदके समान, आज क़रीब ढाई हजार वर्षोंसे सर्वमान्य तथा प्रमाणस्वरूप हो गया है; इसका कारणभी उक्त ग्रंथका महत्त्वही है । इसी लिये गीता-ध्यानमें इस स्मृतिकालीन ग्रंथका अलंकार- युक्त, परंतु यथार्थ वर्णन इस प्रकार किया गया है :- सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ अर्थात् जितने उपनिषद् हैं वे मानों गौएँ हैं, श्रीकृष्ण स्वयं दूध दुहनेवाले (ग्वाला) हैं, बुद्धिमान् अर्जुन (उन गौओंको पन्हानेवाला) भोक्ता बछड़ा (वत्स) हैं, और जो दूध दुहा गया वही मधुर गीतामृत है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, कि हिंदु- स्थानकी सब भाषाओंमें इसके अनेक अनुवाद, टीकाएँ और विवेचन हो चुके हैं; परंतु जबसे पश्चिमी विद्वानोंको संस्कृत भाषाका ज्ञान होने लगा है, तबसे ग्रीक, लेटिन, जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि यूरोपकी भाषाओंमेंभी इसके अनेक अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । तात्पर्य यह है, कि इस समय यह अद्वितीय ग्रंथ समस्त संसारमें प्रसिद्ध है । श्लोकका अर्थ है । महाभारत (उ. ४८. ७-९ और २०-२२; तथा वन. १२. ४४- ४६) में लिखा है, कि नर और नारायण ये दोनों ऋषि दो स्वरूपोंमें विभक्त - साक्षात् परमात्मा - ही हैं, और इन्हीं दोनोंने आगे चलकर अर्जुन तथा श्रीकृष्णका अवतार लिया । सब भागवतधर्मीय ग्रंथोंके आरंभमे इन्हींको प्रथम इसलिये नमस्कार करते हैं, कि निष्काम कर्म-युक्त नारायणीय तथा भागवत-धर्मको इन्होंने- ही पहलेपहल जारी किया था । इस श्लोकमे कहीं कहीं 'व्यास' के बदले 'चैव' पाठभी है; परंतु हमें यह युक्तिसंगत नहीं मालूम होता; क्योंकि, जैसे भागवत-धर्मके प्रचारक नर-नारायणको प्रणाम करना सर्वथा उचित है, वैसेही इस धर्मके दो मुख्य ग्रंथों (महाभारत और गीता) के कर्ता व्यासजीकोभी नमस्कार करना उचित है । महाभारतका प्राचीन नाम 'जय' है (महा. आ. ६२. २०) ।
विषयप्रवेश ३ इस ग्रंथमे सब उपनिषदोंका सार आ गया है; इसीसे इसका पूरा नाम ‘श्रीमद्भगवद्गीता-उपनिषत्’ है। गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमे जो अध्याय- समाप्ति-दर्शक संकल्प है, उसमें “इति श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे” इत्यादि शब्द है। यह संकल्प यद्यपि मूलग्रंथ (महा- भारत) में नहीं है, तथापि यह गीताकी सभी प्रतियोंमे पाया जाता है। इससे अनुमान होता है, कि गीताकी किसीभी प्रकारकी टीका हो जानेके पहलेही, जब महाभारतसे गीता नित्यपाठके लिये अलग निकाल ली गयी तभीसे उक्त संकल्पका प्रचार हुआ होगा। इस दृष्टिसे, गीताके तात्पर्यका निर्णय करनेके कार्यमें उसका महत्त्व कितना है, यह आगे चलकर बताया जायगा। यहाँ इस संकल्पके केवल दो पद (भगवद्गीतासु उपनिषत्सु) विचारणीय है। ‘उपनिषत्’ शब्द हिंदीमें पुल्लिंग माना जाता है; परंतु वह संस्कृतमें स्त्रीलिंग है। इसलिये “श्रीभगवान्ने गाया गया अर्थात् कहा गया उपनिषद्” यह अर्थ प्रकट करनेके लिये संस्कृतमे “श्रीमद्- भगवद्गीता उपनिषत्” ये दो विशेषण-विशेष्यरूप स्त्रीलिंग शब्द प्रयुक्त हुए हैं, और यद्यपि ग्रंथ एकही है, तथापि सम्मानके लिये ‘श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु’ ऐसा सप्तमीके बहुवचनका प्रयोग किया गया है। शंकराचार्यके भाष्यमेंभी इस ग्रंथको लक्ष्य करके ‘इति गीतासु’ यह बहुवचनांत प्रयोग पाया जाता है। परंतु नामको संक्षिप्त करनेके समय आदरसूचक प्रत्यय, पद तथा अंतिम सामान्य जाति- वाचक ‘उपनिषत्’ शब्दभी उड़ा दिया गया; जिससे ‘श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद्’ इन प्रथमाके एकवचनान्त शब्दोंके बदले पहले ‘भगवद्गीता’ और फिर केवल ‘गीता’- ही संक्षिप्त नाम प्रचलित हो गया। ऐसे बहुत-से संक्षिप्त नाम प्रचलित हैं। जैसे— कठ, छांदोग्य, केन इत्यादि। यदि ‘उपनिषद्’ शब्द मूल नाममे न होता तो ‘भागवतम्’, ‘भारतम्’, ‘गोपीगीतम्’ इत्यादि शब्दोंके समान इस ग्रंथका नामभी ‘भगवद्गीतम्’ या केवल ‘गीतम्’ बन जाता; जैसा कि नपुंसकलिंगके शब्दोंका स्वरूप होता है। परंतु जब कि ऐसा हुआ नहीं है और ‘भगवद्गीता’ या ‘गीता’ यही स्त्रीलिंग शब्द अबतक बना रहा है, तब उसके सामने ‘उपनिषत्’ शब्दको नित्य अध्याहृत समझना- ही चाहिये। अनुगीताकी अर्जुनमिश्रकृत टीकामे ‘अनुगीता’ शब्दका अर्थभी इसी रीतिसे किया गया है। परंतु सात सौ श्लोकोंकी भगवद्गीताकोही गीता नहीं कहते। अनेक ज्ञान- विषयक ग्रंथभी गीता कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत मोक्ष- पर्वके कुछ फुटकर प्रकरणोंको पिंगलगीता, शंपाकगीता, मंकिगीता, बोध्यगीता, विचख्युगीता, हारितगीता, वृत्रगीता, पराशरगीता और हंसगीता कहते हैं। अश्वमेध पर्वकी अनुगीताके एक भागका विशेषनाम ‘ब्राह्मणगीता’ है। इनके सिवा अवधूत- गीता, अष्टावक्रगीता, ईश्वरगीता, उत्तरगीता, कपिलगीता, गणेशगीता, देवीगीता, पाण्डवगीता, ब्रह्मगीता, भिक्षुगीता, यमगीता, रामगीता, व्यासगीता, शिवगीता,
४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूतगीता, सूर्यगीता इत्यादि अनेक गीताएँ प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे कुछ तो, स्वतंत्र रीतिसे निर्माण की गयी हैं और शेष भिन्न भिन्न पुराणोंमें हैं। जैसे, गणेशपुराणके अंतिम क्रीडाखंडके १३८ से १४८ अध्यायोंमें गणेशगीता कही गयी हैं। इसे यदि थोड़े हेर- फेरके साथ भगवद्गीताकी नक़ल कहें तो कोई हानि नहीं। कूर्मपुराणके उत्तरभागके पहले ग्यारह अध्यायोंमें ईश्वरगीता है। इसके बाद व्यासगीताका आरंभ हुआ है। स्कंदपुराणांतर्गत सूतसंहिताके चौथे अर्थात् यज्ञवैभवखंड के उपरिभागके आरंभ (१ से १२ अध्यायतक) में ब्रह्मगीता है और इसके बादके अध्यायोंमें सूतगीता, हैं। यह तो हुई आठ स्कंदपुराणकी ब्रह्मगीता; दूसरी एक और ब्रह्मगीता है, जो योगवासिष्ठके निर्वाण प्रकरणके उत्तरार्ध (सर्ग १७३ से १८१ तक) में आ गयी है। यमगीताएँ तीन प्रकारकी हैं। पहली विष्णुपुराणके तीसरे अंशके सातवें अध्यायमें; दूसरी, अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८१ वें अध्यायमें; और तीसरी, नृसिंहपुराणके आठवें अध्यायमें है। यही हाल रामगीताका है। महाराष्ट्रमें जो रामगीता प्रचलित है वह अध्यात्मरामायणके उत्तरकांडके पाँचवें सर्गमें है; और यह अध्यात्मरामायण ब्रह्मांडपुराणका एक भाग माना जाता हैं; परंतु इसके सिवा एक दूसरी रामगीता 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक ग्रंथमें है, जो मद्रासकी ओर प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ वेदान्तविषयपर लिखा गया है। इसमें ज्ञान, उपासना और कर्म-संबंधी तीन कांड हैं। इसके उपासनाकांडके द्वितीय पादके पहले अठारह अध्यायोंमें रामगीता है और कर्मकांडके तृतीय पादके पहले पाँच अध्यायोंमें सूर्यगीता है। कहते हैं कि शिवगीता पद्मपुराणके पातालखंडमें है। पर इस पुराणकी जो प्रति पूणेके आनंदाश्रममें छपी है उसमें शिवगीता नहीं है। पंडित ज्वालाप्रसादने अपने 'अष्टादशपुराणदर्शन' ग्रंथमें लिखा है कि शिवगीता गौड़ीय पद्मोत्तरपुराणमें है। नारदपुराणमें अन्य पुराणोंके साथ साथ, पद्मपुराणकीभी जो विषयानुक्रमणिका दी गयी है, उसमें शिवगीताका उल्लेख पाया जाता है। श्रीमद्- भागवतपुराणके ग्यारहवें स्कंधके तेरहवें अध्यायमें हंसगीता और तेईसवें अध्यायमें भिक्षुगीता कही गयी है। तीसरे स्कंधके कपिलोपाख्यान (अ. २३-३३) को कई लोग 'कपिलगीता' कहते हैं; परंतु 'कपिलगीता' नामक एक छपी हुई स्वतंत्र पुस्तक हमारे देखनेमें आई है, जिनमें हठयोगका प्रधानतः वर्णन किया गया है; और लिखा है, कि यह कपिलगीता पद्मपुराणसे ली गयी है; परंतु यह गीता पद्मपुराणमें हैही नहीं। इसमें एक स्थान (४. ७) पर जैन, जंगम और सूफ़ीका उल्लेख किया गया है, जिससे कहना पडता है, कि यह गीता मुसलमानी शासनकालके बादकी होगी। भागवतपुराणहीके समान देवीभागवतमेंभी, सातवें स्कंधके ३१ से ४० अध्यायतक एक गीता है, और देवीसे कही जानेके कारण उसे देवीगीता कहते हैं। केवल भगवद्गीताहीका सार अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८० वें अध्यायमें, तथा गरुडपुराणके पूर्वखंडके २४२ वें अध्यायमें दिया हुआ है। इसी तरह कहा
विषयप्रवेश ५ जाता है, कि रामावतारमें वसिष्ठजीने जो उपदेश रामचंद्रजीको दिया, उसीको योगवासिष्ठ कहते हैं; परंतु इस ग्रंथके अंतिम (अर्थात् निर्वाण) प्रकरणमें 'अर्जुनोपाख्यान' भी शामिल है; जिसमें उस भगवद्गीताका सारांश दिया गया है, कि जिसे कृष्णावतारमें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा था। इस उपाख्यानमें भगवद्गीताके अनेक श्लोक ज्यों-कि-त्यों पाये जाते हैं (योग. ६ पू. सर्ग ५२-५८)। ऊपर कहा जा चुका है कि पूणेमें छपे हुए पद्मपुराणमें शिवगीता नहीं मिलती; परंतु उसके न मिलनेपरभी इस प्रतिके उत्तरखंडके १३१ से १४८ अध्यायतक भगवद्गीताके महात्म्यका वर्णन है, और भगवद्गीताके प्रत्येक अध्यायके लिये महात्म्यवर्णनका एक एक अध्याय है; और इसके संबंधमें कथाभी कही गयी है। इसके सिवा वराहपुराणमें एक गीतामाहात्म्य है और शिवपुराणमें तथा वायुपुराणमेभी गीता- महात्म्यका होना बतलाया जाता है; परंतु कलकत्तेके छपे हुए वायुपुराणमें वह हमें नहीं मिला। भगवद्गीताकी छपी हुई पुस्तकोंके आरंभमें 'गीता-ध्यान' नामक नौ श्लोकोंका एक प्रकरण पाया जाता है। नहीं जान पड़ता, कि यह कहांसे लिया गया है; परंतु इसका “भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला०” श्लोक, थोड़े हेरफेरके साथ, हालहीमें प्रकाशित 'ऊरुभंग' नामक भास कविकृत नाटकके आरंभमें दिया हुआ है। इससे ज्ञात होता है, कि उक्त 'ध्यान' भास कविके समयके अनंतर प्रचार- में आया होगा। क्योंकि यह माननेकी अपेक्षा कि भाससरीखे प्रसिद्ध कविने इस श्लोकको गीता-ध्यानसे लिया है; यही कहना अधिक युक्तिसंगत होगा, कि गीता-ध्यानकी रचना भिन्न भिन्न स्थानोंमे लिये हुए, और कुछ नये बनाये हुए श्लोकों- मे की गयी है। भास कवि कालिदाससे पहिले हो गया है। इसलिये उसका समय कम-से-कम संवत् ४३५ (शक तीन सौ) से अधिक अर्वाचीन नहीं हो सकता। * ऊपर कही गयी बातोंसे यह बात अच्छी तरह ध्यानमें आ सकती है, कि भगवद्- गीताके कौन-से और कितने अनुवाद तथा कुछ हेरफेरके साथ कितनी नकलें, तात्पर्य और महात्म्य-पुराणोंमें मिलतें हैं। इस बातका पता नहीं चलता, कि अवधूत और अष्टावक्र आदि दो-चार गीताओँको कब और किसने स्वतंत्र रीतिसे रचा; अथवा वे किस पुराणसे ली गयी हैं। तथापि इन सब गीताओकी रचना तथा विषय-विवेचन- को देखनेसे यही मालूम होता है, कि ये सब ग्रंथ, भगवद्गीताके जगप्रसिद्ध होनेके बादही, बनाये गये हैं। इन गीताओके संबंधमें यह कहनेसेभी कोई हानि नहीं कि वे इसी लिये रची गयी हैं, कि किसी विशिष्ट पंथ या विशिष्ट पुराणमें भगवद्गीताके समान एक-आध गीताके रहे बिना उस पंथ या पुराणकी पूर्णता नहीं हो सकती थी। जिस तरह श्रीभगवानने भगवद्गीतामें अर्जुनको विश्वरूप दिखाकर
- उपर्युक्त अनेक गीताओँ तथा भगवद्गीताको श्री. हरि रघुनाथ भागवतने पुणेसे प्रकाशित किया।
६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ज्ञान बतलाया है, उसी तरह शिवगीता, देवीगीता और गणेशगीतामेंभी वर्णन है। शिवगीता, ईश्वरगीता आदिमें तो भगवद्गीताके अनेक श्लोक अक्षरशः पाये जाते हैं। यदि ज्ञानकी दृष्टिसे देखा जाय तो इन सब गीताओंमें भगवद्गीताकी अपेक्षा कुछ अधिक विशेषता नहीं है; और भगवद्गीतामें अध्यात्मज्ञान और कर्मका मेल कर देनेकी जो अपूर्व शैली है वह इनमेंसे किसीभी गीतामें नहीं है। भगवद्गीतामें पातंजलयोग अथवा हठयोग और कर्मत्यागरूप संन्यासका यथोचित वर्णन न देखकर, उसकी पूर्तिके लिये कृष्णार्जुन-संवादके रूपमें, किसीने उत्तरगीता बादमें लिख डाली है। अवधूत और अष्टावक्र आदि गीताएँ बिलकुल एकदेशीय हैं। क्योंकि इनमें केवल संन्यासमार्गकाही प्रतिपादन किया गया है। यमगीता और पांडवगीता तो केवल भक्तिविषयक संक्षिप्त स्तोत्रोंके समान हैं। शिवगीता, गणेशगीता और सूर्यगीता ऐसी नहीं हैं। यद्यपि इनमें ज्ञान और कर्मके समुच्चयका युक्तियुक्त समर्थन अवश्य किया गया है, तथापि इनमें नवीनता कुछभी नहीं है; क्योंकि यह विषय प्रायः भगवद्गीतासेही लिया गया है। इन कारणोंसे भगवद्गीताके प्रगल्भ तथा व्यापक तेजके सामने बादकी बनी हुई कोईभी पौराणिक गीता ठहर नहीं सकी, और इन नकली गीताओंसे उलटे भगवद्गीताकाही महत्त्व अधिक बढ़ गया है। यही कारण है, कि 'भगवद्गीता'का 'गीता'नाम प्रचलित हो गया है। अध्यात्म- रामायण और योगवासिष्ठ यद्यपि विस्तृत ग्रंथ हैं तोभी वे बादमें बने हैं। और यह बात उनकी रचनासेही स्पष्ट मालूम हो जाती है। मद्रासका 'गुरुज्ञानवासिष्ठ तत्त्वसारायण' नामक ग्रंथ कइयोंके मतानुसार बहुत प्राचीन है; परंतु हम ऐसा नहीं मानते; क्यों कि उसमें १०८ उपनिषदोंका उल्लेख है, जिनकी प्राचीनता सिद्ध नहीं हो सकती। सूर्यगीतामें विशिष्टाद्वैत मतका उल्लेख पाया जाता है (३.३०); और कई स्थानोंमें भगवद्गीताहीका युक्तिवाद लिया हुआ-सा जान पड़ता है (१.६८)। इसलिये यह ग्रंथभी बहुत पीछेसे - श्रीशंकराचार्यकेभी बाद - बनाया गया होगा। अनेक गीताओंके होनेपरभी भगवद्गीताकी श्रेष्ठता निर्विवाद सिद्ध है। इसी कारण उत्तरकालीन वैदिकधर्मीय पंडितोंने, अन्य गीताओंपर अधिक ध्यान नहीं दिया, और भगवद्गीताहीकी परीक्षा करने और उसीका तात्पर्य अपने बंधुओंको समझा देनेमें, अपनी कृतकृत्यता मानने लगे। ग्रंथकी दो प्रकारसे परीक्षा की जाती है। एक अंतरंग-परीक्षा और दूसरी बहिरंग-परीक्षा कहलाती है। पूरे ग्रंथको देखकर उसके मर्म, रहस्य, मथितार्थ और प्रमेय ढूँढ़ निकालना 'अंतरंग-परीक्षा' है। ग्रंथको किसने और कब बनाया, उसकी भाषा सरस है या नीरस, काव्य-दृष्टिसे उसमें माधुर्य और प्रसाद गुण हैं या नही, शब्दोंकी रचनामें व्याकरणपर ध्यान दिया गया है या उस ग्रंथमें अनेक आर्ष प्रयोग हैं, उसमें किनकिन मतों-स्थलों और व्यक्तियोंका उल्लेख है; इन बातोंसे ग्रंथके कालनिर्णय और तत्कालीन समाज-
विषयप्रवेश ७ स्थितिका कुछ पता चलता है या नहीं; ग्रंथके विचार स्वतंत्र हैं अथवा चुराये हुए हैं; यदि उसमें दूसरोंके विचार भरे हैं, तो वे कौनसे हैं और कहाँसे लिये गये हैं; इत्यादि बातोंके विवेचनको 'बहिरंग-परीक्षा' कहते हैं। जिन प्राचीन पंडितोंने गीतापर टीका और भाष्य लिखे हैं उन्होंने उक्त बाहरी बातोंपर अधिक ध्यान नहीं दिया। इसका कारण यही है, कि वे लोग भगवद्गीतासरीखे अलौकिक ग्रंथकी परीक्षा करते समय उक्त बाहरी बातोंपर ध्यान देनेको ऐसाही समझते थे, जैसे- कि कोई मनुष्य एक-आध उत्तम सुगंधयुक्त फूलको पाकर उसके रंग, सौंदर्य, सुवास आदिके विषयमें कुछभी विचार न करे, और केवल उसकी पँखुरियाँ गिनता रहे अथवा जैसे कोई मनुष्य मधुमक्खीका मधुयुक्त छत्ता पाकर केवल उसके छिद्रोंको गिननेमेंही समय नष्ट कर दे ! परंतु अब पश्चिमी विद्वानोंके अनुकरणसे हमारे आधुनिक विद्वान् लोग गीताकी बाह्य-परीक्षाभी बहुत कुछ करने लगे हैं। गीताके आर्ष प्रयोगोंको देखकर एकने यह निश्चित किया है कि यह ग्रंथ ईसासे कई शतक पहलेही बन गया होगा। इससे यह शंका बिलकुलही निर्मूल हो जाती है, कि गीताका भक्तिमार्ग उस ईसाई धर्मसे लिया गया होगा, कि जो गीताके बहुत पीछेसे प्रचलित हुआ है। गीताके सोलहवें अध्यायमें जिस नास्तिक मतका उल्लेख है उसे बौद्धमत समझकर दूसरेने गीताका रचना-काल बुद्धके बाद माना है। तीसरे विद्वान्का कथन है कि तेरहवें अध्यायमें 'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव ०' श्लोकमें ब्रह्मसूत्रका उल्लेख होनेके कारण गीता ब्रह्मसूत्रके बाद बनी होगी। इसके विरुद्ध कई लोग कहते हैं, कि ब्रह्मसूत्रमें अनेक स्थानोंपर गीताहीका आधार लिया गया है; जिससे गीताका उसके बाद बनना सिद्ध नहीं होता। कोई कोई ऐसाभी कहते हैं कि भारतीय युद्धमें रणभूमिपर अर्जुनको सात सौ श्लोकोंकी गीता सुनानेका समय मिलना संभव नहीं है। हाँ, यह संभव है कि श्रीकृष्णने अर्जुनको लड़ाईकी जल्दीमें दस- बीस श्लोक या उनका भावार्थ सुना दिया हो, और उन्हीं श्लोकोंके विस्तारकी संजयने धृतराष्ट्रसे, व्यासने शुकसे, वैशंपायनने जनमेजयसे और सूतने शौनकसे कहा हो; अथवा महाभारतकारनेभी उसको विस्तृत रीतिसे लिख दिया हो। गीताकी रचनाके संबंधमें मनकी ऐसी प्रवृत्ति होनेपर गीता-सागरमें डुबकियाँ लगाकर किसीने सात,* किसीने अठाईस, किसीने छत्तीस और किसीने सौ, इस तरह गीताके मूल श्लोक खोज निकाले हैं। कोई कोई तो यहाँतक कहते हैं कि अर्जुनको
- आजकल एक सप्तश्लोकी गीता प्रकाशित हुई है, उसमें केवल येही सात श्लोक हैं:- ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म इ० (गीता ८.१३); (२) स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या इ० (गीता ११. ३६); (३) सर्वतः पाणिपादं तत् इ० (गीता १३. १३); (४) कवि पुराणमनुशासितारं इ० (गीता ८. ९); (५) ऊर्ध्वमूलमधःशाखं इ० (गी. १५.१) (६) सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो इ० (१५. १५); (७) मन्मना भव मद्भक्तो इ० (गीता १८. ६५) इसी तरह औरभी अनेक संक्षिप्त गीताएं बनी हैं।
[Page Header] ८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
रणभूमिपर गीताका ब्रह्मज्ञान बतलानेकी कोई आवश्यकताही नहीं थी और वेदान्त विषयका यह उत्तम ग्रंथ पीछेसे महाभारतमें जोड दिया गया है। यह नहीं कि बहिरंग-परीक्षाकी ये सब बातें सर्वथा निरर्थक हों। उदाहरणार्थ, ऊपर कही गयी फूलकी पँखुरियों तथा मधुके छत्तेके छिद्रोंकी बातकोही लीजिये। वनस्पतियोंके वर्गीकरणके समय फूलोंकी पँखुरियोंकाभी विचार अवश्य करना पडता है। इसी तरह गणितकी सहायतासे यह सिद्ध किया गया है, कि मधुमक्खियोंके छत्तेमें जो छेद होते हैं उनका आकार ऐसा होता है, कि मधुरसका घनफल तो कम होने नहीं पाता; और बाहरके आवरणका पृष्ठफल बहुत कम हो जाता है; जिससे मोमकी पैदाइश घट जाती है। इससे मधुमक्खियोंका जन्मजात चातुर्य व्यक्त होता है। इसी प्रकारके उपयोगोंपर दृष्टि देते हुए हमनेभी गीताकी बहिरंग-परीक्षा की है, और उसके कुछ महत्त्वके सिद्धान्तोंका विचार इस ग्रंथके अंतमें, परिशिष्टमें किया है; परंतु जिनको ग्रंथका रहस्यही जानना है, उनके लिये बहिरंग-परीक्षाके झगडेमें पडना अनावश्यक है। वाग्देवीके रहस्यको जाननेवालों तथा उसकी ऊपरी और बाहरी बातोंके जिज्ञासुओंमें जो भेद हैं उसे मुरारि कविने बड़ीही सरसताके साथ दरशाया है :- अब्धिर्लङ्घित एव वानरभटैः किं त्वस्य गम्भीरताम् । आपातालनिमग्नपीवरतनुर्जानाति मन्थाचलः ॥ अर्थात्, समुद्रकी अगाध गहराई जाननेकी यदि इच्छा हो तो किससे पूछा जाय ? इसमें संदेह नहीं, कि राम-रावण-युद्धके समय सैंकड़ों वानरवीर घड़ाघड़ समुद्रके ऊपरसे कूदते हुए लंकामें चले गये थे; परंतु उनमेंसे कितनोंको समुद्रकी गहराईका ज्ञान था ? समुद्र-मंथनके समय देवताओंने मंथनदंड बनाकर जिस बड़े भारी पर्वतको नीचे छोड़ दिया था और जो सचमुच समुद्रके नीचे पातालतक पहुँच गया था, वही मंदराचल पर्वत समुद्रकी गहराईको जान सकता है। मुरारि कविके इस न्यायानुसार, गीताके रहस्यको जाननेके लिये, अब हमें उन पंडितों और आचार्योंके ग्रंथोंकी ओर ध्यान देना चाहिये, जिन्होंने गीता-सागरका मंथन किया है। इन पंडितोंमें महा- भारतके कर्ताही अग्रगण्य हैं। अधिक क्या कहे, आजकल जो गीता प्रसिद्ध है, उसके येही एक प्रकारसे कर्ताभी कहे जा सकते हैं। इसलिये प्रथम उन्हींके मतानुसार संक्षेपमें गीताका तात्पर्य दिया जाएगा। 'भगवद्गीता' अर्थात् 'भगवानसे गाया गया उपनिषत् ' इस नामहीसे बोध होता है, कि गीतामें अर्जुनको उपदेश किया गया है वह प्रधान रूपसे भागवतधर्म- भगवान्के चलाये हुए धर्म-के विषयमें होगा। क्योंकि श्रीकृष्णको 'श्रीभगवान्'का नाम प्रायः भागवतधर्ममेंही दिया जाता है। यह उपदेश कुछ नया नहीं है। पूर्व कालमें यही उपदेश भगवानने विवस्वानको, विवस्वानने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको किया था। यह बात गीताके चौथे अध्यायके आरंभ (गीता ४.१)
विषयप्रवेश ९ में दी हुई है। महाभारतके, शांतिपर्वके अंतमें नारायणीय अथवा भागवत धर्मका विस्तृत निरूपण है, जिसमें ब्रह्मदेवके अनेक जन्मोंमें अर्थात् कल्पांतरोंमें भागवत- धर्मकी परंपराका वर्णन किया गया है। और अंतमें यह कहा गया है :- त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् मनवे ददौ । मनुश्च लोकभृत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ । इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः ॥ अर्थात् ब्रह्मदेवके वर्तमान जन्मके त्रेतायुगमें इस भागवत-धर्मने विवस्वान्-मनु- इक्ष्वाकुकी परंपरासे विस्तार पाया है (मभा. शां. ३४८. ५१, ५२)। यह परंपरा गीतामें दी हुई उक्त परंपरासे मिलती है (गीता ४. १ पर हमारी टीका देखो)। दो भिन्न धर्मोंकी परंपराका एक होना संभव नहीं है, इसलिये परंपराकी एकताके कारण यह अनुमान सहजही किया जा सकता है कि गीताधर्म और भागवतधर्म ये दोनों एकही हैं। इन धर्मोंकी यह एकता केवल अनुमानही पर अवलंबित नहीं है। क्योंकि नारायणीय या भागवत-धर्मके निरूपणमें वैशंपायन जनमेजयसे कहते हैं :- एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ अर्थात् हे नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! यही उत्तम भागवत-धर्म, विधियुक्त और संक्षिप्त रीतिसे हरिगीता अर्थात् भगवद्गीतामें, तुझे पहलेही बतलाया गया है (मभा. शां. ३४६.१०)। इसके बाद एक अध्याय छोड़ कर दूसरे अध्याय (मभा. शां. ३४८. ८) में नारायणीय धर्मके संबंधमें फिरभी स्पष्ट रीतिसे कहा गया है कि :- समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे । अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥ अर्थात् कौरव-पांडव-युद्धके समय जब अर्जुन उद्विग्न हो गया था तब स्वयं भगवानने उसे यह उपदेश किया था। इसमें यह स्पष्ट है, कि ‘हरिगीता' से भगवद्गीताहीका मतलब है। गुरुपरंपराकी एकताके अतिरिक्त यहभी ध्यानमें रखने योग्य है, कि जिस भागवत-धर्म या नारायणीय धर्मके विषयमें दो-बार कहा गया है, कि वही गीताका प्रतिपाद्य विषय है; उसीको 'सात्वत' या 'एकांतिक' धर्मभी कहा है। इसका विवेचन करते समय (शां. ३४७. ८०, ८१) दो लक्षण कहे गये हैं :- नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः । प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः ॥ अर्थात् यह नारायणीय धर्म प्रवृत्तिमार्गका होकरभी पुनर्जन्मको टालनेवाला अर्थात् पूर्ण मोक्षका दाता है। फिर इस बातका वर्णन किया गया है, कि यह धर्म प्रवृत्तिमार्ग- का कैसे है। प्रवृत्तिका यह अर्थ प्रसिद्धही है, कि संन्यास न लेकर मरणपर्यंत चातुर्वर्ण्य