श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ज्ञान बतलाया है, उसी तरह शिवगीता, देवीगीता और गणेशगीतामेंभी वर्णन है। शिवगीता, ईश्वरगीता आदिमें तो भगवद्गीताके अनेक श्लोक अक्षरशः पाये जाते हैं। यदि ज्ञानकी दृष्टिसे देखा जाय तो इन सब गीताओंमें भगवद्गीताकी अपेक्षा कुछ अधिक विशेषता नहीं है; और भगवद्गीतामें अध्यात्मज्ञान और कर्मका मेल कर देनेकी जो अपूर्व शैली है वह इनमेंसे किसीभी गीतामें नहीं है। भगवद्गीतामें पातंजलयोग अथवा हठयोग और कर्मत्यागरूप संन्यासका यथोचित वर्णन न देखकर, उसकी पूर्तिके लिये कृष्णार्जुन-संवादके रूपमें, किसीने उत्तरगीता बादमें लिख डाली है। अवधूत और अष्टावक्र आदि गीताएँ बिलकुल एकदेशीय हैं। क्योंकि इनमें केवल संन्यासमार्गकाही प्रतिपादन किया गया है। यमगीता और पांडवगीता तो केवल भक्तिविषयक संक्षिप्त स्तोत्रोंके समान हैं। शिवगीता, गणेशगीता और सूर्यगीता ऐसी नहीं हैं। यद्यपि इनमें ज्ञान और कर्मके समुच्चयका युक्तियुक्त समर्थन अवश्य किया गया है, तथापि इनमें नवीनता कुछभी नहीं है; क्योंकि यह विषय प्रायः भगवद्गीतासेही लिया गया है। इन कारणोंसे भगवद्गीताके प्रगल्भ तथा व्यापक तेजके सामने बादकी बनी हुई कोईभी पौराणिक गीता ठहर नहीं सकी, और इन नकली गीताओंसे उलटे भगवद्गीताकाही महत्त्व अधिक बढ़ गया है। यही कारण है, कि 'भगवद्गीता'का 'गीता'नाम प्रचलित हो गया है। अध्यात्म- रामायण और योगवासिष्ठ यद्यपि विस्तृत ग्रंथ हैं तोभी वे बादमें बने हैं। और यह बात उनकी रचनासेही स्पष्ट मालूम हो जाती है। मद्रासका 'गुरुज्ञानवासिष्ठ तत्त्वसारायण' नामक ग्रंथ कइयोंके मतानुसार बहुत प्राचीन है; परंतु हम ऐसा नहीं मानते; क्यों कि उसमें १०८ उपनिषदोंका उल्लेख है, जिनकी प्राचीनता सिद्ध नहीं हो सकती। सूर्यगीतामें विशिष्टाद्वैत मतका उल्लेख पाया जाता है (३.३०); और कई स्थानोंमें भगवद्गीताहीका युक्तिवाद लिया हुआ-सा जान पड़ता है (१.६८)। इसलिये यह ग्रंथभी बहुत पीछेसे - श्रीशंकराचार्यकेभी बाद - बनाया गया होगा। अनेक गीताओंके होनेपरभी भगवद्गीताकी श्रेष्ठता निर्विवाद सिद्ध है। इसी कारण उत्तरकालीन वैदिकधर्मीय पंडितोंने, अन्य गीताओंपर अधिक ध्यान नहीं दिया, और भगवद्गीताहीकी परीक्षा करने और उसीका तात्पर्य अपने बंधुओंको समझा देनेमें, अपनी कृतकृत्यता मानने लगे। ग्रंथकी दो प्रकारसे परीक्षा की जाती है। एक अंतरंग-परीक्षा और दूसरी बहिरंग-परीक्षा कहलाती है। पूरे ग्रंथको देखकर उसके मर्म, रहस्य, मथितार्थ और प्रमेय ढूँढ़ निकालना 'अंतरंग-परीक्षा' है। ग्रंथको किसने और कब बनाया, उसकी भाषा सरस है या नीरस, काव्य-दृष्टिसे उसमें माधुर्य और प्रसाद गुण हैं या नही, शब्दोंकी रचनामें व्याकरणपर ध्यान दिया गया है या उस ग्रंथमें अनेक आर्ष प्रयोग हैं, उसमें किनकिन मतों-स्थलों और व्यक्तियोंका उल्लेख है; इन बातोंसे ग्रंथके कालनिर्णय और तत्कालीन समाज-