श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रवेश ७ स्थितिका कुछ पता चलता है या नहीं; ग्रंथके विचार स्वतंत्र हैं अथवा चुराये हुए हैं; यदि उसमें दूसरोंके विचार भरे हैं, तो वे कौनसे हैं और कहाँसे लिये गये हैं; इत्यादि बातोंके विवेचनको 'बहिरंग-परीक्षा' कहते हैं। जिन प्राचीन पंडितोंने गीतापर टीका और भाष्य लिखे हैं उन्होंने उक्त बाहरी बातोंपर अधिक ध्यान नहीं दिया। इसका कारण यही है, कि वे लोग भगवद्गीतासरीखे अलौकिक ग्रंथकी परीक्षा करते समय उक्त बाहरी बातोंपर ध्यान देनेको ऐसाही समझते थे, जैसे- कि कोई मनुष्य एक-आध उत्तम सुगंधयुक्त फूलको पाकर उसके रंग, सौंदर्य, सुवास आदिके विषयमें कुछभी विचार न करे, और केवल उसकी पँखुरियाँ गिनता रहे अथवा जैसे कोई मनुष्य मधुमक्खीका मधुयुक्त छत्ता पाकर केवल उसके छिद्रोंको गिननेमेंही समय नष्ट कर दे ! परंतु अब पश्चिमी विद्वानोंके अनुकरणसे हमारे आधुनिक विद्वान् लोग गीताकी बाह्य-परीक्षाभी बहुत कुछ करने लगे हैं। गीताके आर्ष प्रयोगोंको देखकर एकने यह निश्चित किया है कि यह ग्रंथ ईसासे कई शतक पहलेही बन गया होगा। इससे यह शंका बिलकुलही निर्मूल हो जाती है, कि गीताका भक्तिमार्ग उस ईसाई धर्मसे लिया गया होगा, कि जो गीताके बहुत पीछेसे प्रचलित हुआ है। गीताके सोलहवें अध्यायमें जिस नास्तिक मतका उल्लेख है उसे बौद्धमत समझकर दूसरेने गीताका रचना-काल बुद्धके बाद माना है। तीसरे विद्वान्का कथन है कि तेरहवें अध्यायमें 'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव ०' श्लोकमें ब्रह्मसूत्रका उल्लेख होनेके कारण गीता ब्रह्मसूत्रके बाद बनी होगी। इसके विरुद्ध कई लोग कहते हैं, कि ब्रह्मसूत्रमें अनेक स्थानोंपर गीताहीका आधार लिया गया है; जिससे गीताका उसके बाद बनना सिद्ध नहीं होता। कोई कोई ऐसाभी कहते हैं कि भारतीय युद्धमें रणभूमिपर अर्जुनको सात सौ श्लोकोंकी गीता सुनानेका समय मिलना संभव नहीं है। हाँ, यह संभव है कि श्रीकृष्णने अर्जुनको लड़ाईकी जल्दीमें दस- बीस श्लोक या उनका भावार्थ सुना दिया हो, और उन्हीं श्लोकोंके विस्तारकी संजयने धृतराष्ट्रसे, व्यासने शुकसे, वैशंपायनने जनमेजयसे और सूतने शौनकसे कहा हो; अथवा महाभारतकारनेभी उसको विस्तृत रीतिसे लिख दिया हो। गीताकी रचनाके संबंधमें मनकी ऐसी प्रवृत्ति होनेपर गीता-सागरमें डुबकियाँ लगाकर किसीने सात,* किसीने अठाईस, किसीने छत्तीस और किसीने सौ, इस तरह गीताके मूल श्लोक खोज निकाले हैं। कोई कोई तो यहाँतक कहते हैं कि अर्जुनको
- आजकल एक सप्तश्लोकी गीता प्रकाशित हुई है, उसमें केवल येही सात श्लोक हैं:- ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म इ० (गीता ८.१३); (२) स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या इ० (गीता ११. ३६); (३) सर्वतः पाणिपादं तत् इ० (गीता १३. १३); (४) कवि पुराणमनुशासितारं इ० (गीता ८. ९); (५) ऊर्ध्वमूलमधःशाखं इ० (गी. १५.१) (६) सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो इ० (१५. १५); (७) मन्मना भव मद्भक्तो इ० (गीता १८. ६५) इसी तरह औरभी अनेक संक्षिप्त गीताएं बनी हैं।