भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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[Page Header] ८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

रणभूमिपर गीताका ब्रह्मज्ञान बतलानेकी कोई आवश्यकताही नहीं थी और वेदान्त विषयका यह उत्तम ग्रंथ पीछेसे महाभारतमें जोड दिया गया है। यह नहीं कि बहिरंग-परीक्षाकी ये सब बातें सर्वथा निरर्थक हों। उदाहरणार्थ, ऊपर कही गयी फूलकी पँखुरियों तथा मधुके छत्तेके छिद्रोंकी बातकोही लीजिये। वनस्पतियोंके वर्गीकरणके समय फूलोंकी पँखुरियोंकाभी विचार अवश्य करना पडता है। इसी तरह गणितकी सहायतासे यह सिद्ध किया गया है, कि मधुमक्खियोंके छत्तेमें जो छेद होते हैं उनका आकार ऐसा होता है, कि मधुरसका घनफल तो कम होने नहीं पाता; और बाहरके आवरणका पृष्ठफल बहुत कम हो जाता है; जिससे मोमकी पैदाइश घट जाती है। इससे मधुमक्खियोंका जन्मजात चातुर्य व्यक्त होता है। इसी प्रकारके उपयोगोंपर दृष्टि देते हुए हमनेभी गीताकी बहिरंग-परीक्षा की है, और उसके कुछ महत्त्वके सिद्धान्तोंका विचार इस ग्रंथके अंतमें, परिशिष्टमें किया है; परंतु जिनको ग्रंथका रहस्यही जानना है, उनके लिये बहिरंग-परीक्षाके झगडेमें पडना अनावश्यक है। वाग्देवीके रहस्यको जाननेवालों तथा उसकी ऊपरी और बाहरी बातोंके जिज्ञासुओंमें जो भेद हैं उसे मुरारि कविने बड़ीही सरसताके साथ दरशाया है :- अब्धिर्लङ्घित एव वानरभटैः किं त्वस्य गम्भीरताम् । आपातालनिमग्नपीवरतनुर्जानाति मन्थाचलः ॥ अर्थात्, समुद्रकी अगाध गहराई जाननेकी यदि इच्छा हो तो किससे पूछा जाय ? इसमें संदेह नहीं, कि राम-रावण-युद्धके समय सैंकड़ों वानरवीर घड़ाघड़ समुद्रके ऊपरसे कूदते हुए लंकामें चले गये थे; परंतु उनमेंसे कितनोंको समुद्रकी गहराईका ज्ञान था ? समुद्र-मंथनके समय देवताओंने मंथनदंड बनाकर जिस बड़े भारी पर्वतको नीचे छोड़ दिया था और जो सचमुच समुद्रके नीचे पातालतक पहुँच गया था, वही मंदराचल पर्वत समुद्रकी गहराईको जान सकता है। मुरारि कविके इस न्यायानुसार, गीताके रहस्यको जाननेके लिये, अब हमें उन पंडितों और आचार्योंके ग्रंथोंकी ओर ध्यान देना चाहिये, जिन्होंने गीता-सागरका मंथन किया है। इन पंडितोंमें महा- भारतके कर्ताही अग्रगण्य हैं। अधिक क्या कहे, आजकल जो गीता प्रसिद्ध है, उसके येही एक प्रकारसे कर्ताभी कहे जा सकते हैं। इसलिये प्रथम उन्हींके मतानुसार संक्षेपमें गीताका तात्पर्य दिया जाएगा। 'भगवद्गीता' अर्थात् 'भगवानसे गाया गया उपनिषत् ' इस नामहीसे बोध होता है, कि गीतामें अर्जुनको उपदेश किया गया है वह प्रधान रूपसे भागवतधर्म- भगवान्‌के चलाये हुए धर्म-के विषयमें होगा। क्योंकि श्रीकृष्णको 'श्रीभगवान्‌'का नाम प्रायः भागवतधर्ममेंही दिया जाता है। यह उपदेश कुछ नया नहीं है। पूर्व कालमें यही उपदेश भगवानने विवस्वानको, विवस्वानने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको किया था। यह बात गीताके चौथे अध्यायके आरंभ (गीता ४.१)