भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

विषयप्रवेश ९ में दी हुई है। महाभारतके, शांतिपर्वके अंतमें नारायणीय अथवा भागवत धर्मका विस्तृत निरूपण है, जिसमें ब्रह्मदेवके अनेक जन्मोंमें अर्थात् कल्पांतरोंमें भागवत- धर्मकी परंपराका वर्णन किया गया है। और अंतमें यह कहा गया है :- त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् मनवे ददौ । मनुश्च लोकभृत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ । इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः ॥ अर्थात् ब्रह्मदेवके वर्तमान जन्मके त्रेतायुगमें इस भागवत-धर्मने विवस्वान्-मनु- इक्ष्वाकुकी परंपरासे विस्तार पाया है (मभा. शां. ३४८. ५१, ५२)। यह परंपरा गीतामें दी हुई उक्त परंपरासे मिलती है (गीता ४. १ पर हमारी टीका देखो)। दो भिन्न धर्मोंकी परंपराका एक होना संभव नहीं है, इसलिये परंपराकी एकताके कारण यह अनुमान सहजही किया जा सकता है कि गीताधर्म और भागवतधर्म ये दोनों एकही हैं। इन धर्मोंकी यह एकता केवल अनुमानही पर अवलंबित नहीं है। क्योंकि नारायणीय या भागवत-धर्मके निरूपणमें वैशंपायन जनमेजयसे कहते हैं :- एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ अर्थात् हे नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! यही उत्तम भागवत-धर्म, विधियुक्त और संक्षिप्त रीतिसे हरिगीता अर्थात् भगवद्गीतामें, तुझे पहलेही बतलाया गया है (मभा. शां. ३४६.१०)। इसके बाद एक अध्याय छोड़ कर दूसरे अध्याय (मभा. शां. ३४८. ८) में नारायणीय धर्मके संबंधमें फिरभी स्पष्ट रीतिसे कहा गया है कि :- समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे । अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥ अर्थात् कौरव-पांडव-युद्धके समय जब अर्जुन उद्विग्न हो गया था तब स्वयं भगवानने उसे यह उपदेश किया था। इसमें यह स्पष्ट है, कि ‘हरिगीता' से भगवद्गीताहीका मतलब है। गुरुपरंपराकी एकताके अतिरिक्त यहभी ध्यानमें रखने योग्य है, कि जिस भागवत-धर्म या नारायणीय धर्मके विषयमें दो-बार कहा गया है, कि वही गीताका प्रतिपाद्य विषय है; उसीको 'सात्वत' या 'एकांतिक' धर्मभी कहा है। इसका विवेचन करते समय (शां. ३४७. ८०, ८१) दो लक्षण कहे गये हैं :- नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः । प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः ॥ अर्थात् यह नारायणीय धर्म प्रवृत्तिमार्गका होकरभी पुनर्जन्मको टालनेवाला अर्थात् पूर्ण मोक्षका दाता है। फिर इस बातका वर्णन किया गया है, कि यह धर्म प्रवृत्तिमार्ग- का कैसे है। प्रवृत्तिका यह अर्थ प्रसिद्धही है, कि संन्यास न लेकर मरणपर्यंत चातुर्वर्ण्य

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