भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विहित निष्काम कर्मही करता रहे। इसलिये यह स्पष्ट है, कि गीतामें जो उपदेश अर्जुनको किया गया है, वह भागवतधर्मका है; और उसको महाभारतकार प्रवृत्ति- विषयकही मानते हैं, क्योंकि उपर्युक्त धर्मभी प्रवृत्ति-विषयक है। साथ साथ यदि ऐसा कहा जाय, कि गीतामें केवल प्रवृत्तिमार्गकाही भागवतधर्म, है, तो यहभी ठीक नहीं। क्योंकि वैशंपायनने जनमेजयसे फिर कहा है (महा. शां. ३४८. ५३) । यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्व नृपोत्तम । कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ अर्थात् हे राजा ! यतियों - अर्थात् संन्यासियों - के निवृत्तिमार्गका धर्मभी तुझे पहले भगवद्गीतामें संक्षिप्त रीतिसे भागवतधर्मके साथ बतला दिया गया है; परंतु यद्यपि गीतामें प्रवृत्तिधर्मके साथही यतियोंका निवृत्तिधर्मभी बतलाया गया है, तथापि मनु-इक्ष्वाकु इत्यादि गीताधर्मकी जो परंपरा गीतामें दी गयी है, वह यतिधर्मको लागू नहीं हो सकती। वह केवल भागवत-धर्महीकी परंपरासे मिलती है। सारांश यह है, कि उपर्युक्त वचनोंसे महाभारतकारका यही अभिप्राय जान पड़ता है, कि गीतामें अर्जुनको जो उपदेश किया गया है, वह विशेषकरके मनु- इक्ष्वाकु इत्यादि परंपरासे चले आये प्रवृत्ति-विषयक भागवतधर्महीका है; और उसमें निवृत्ति-विषयक यतिधर्मका जो निरूपण पाया जाता है वह केवल आनुषंगिक है। पृथु, प्रियव्रत और प्रल्हाद आदि भक्तोंकी कथाओंसे, तथा भागवतमें दिये गये निष्काम कर्मके वर्णनोंसे (भागवत ४. २२. ५१, ५२; ७. १०. २३ और ११. ४. ६) यह भली भाँति मालूम हो जाता है, कि महाभारतका प्रवृत्ति-विषयक नारायणीय धर्म और भागवत-पुराणका भागवतधर्म, ये दोनों मूलतः एक ही हैं। परंतु भागवतपुराणका मुख्य उद्देश्य यह नहीं है, कि वह भागवतधर्मके कर्मयुक्त- प्रवृत्तितत्त्वका समर्थन करे। यह समर्थन, महाभारतमें और विशेषकरके गीतामें किया गया है, परंतु इस समर्थनके समय भागवतधर्मीय भक्तिका यथोचित रहस्य दिखलाना व्यासजी भूल गये थे। इसलिये भागवतके आरंभके अध्यायोंमें लिखा है, कि (भागवत १. ५. १२) बिना भक्तिके केवल निष्काम कर्म व्यर्थ है यह सोच- कर, और महाभारतकी उक्त न्यूनताको पूर्ण करनेके लियेही, भागवत-पुराणकी रचना बादमें की गयी। इससे भागवतपुराणका मुख्य उद्देश्य स्पष्ट रीतिसे मालूम हो सकता है। यही कारण है कि भागवतमें अनेक प्रकारकी हरिकथाएँ कहकर भागवतधर्मकी भगवद्भक्तिके महात्म्यका जैसा विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, वैसा भागवतधर्मके कर्मविषयक अंगोंका विवेचन उसमें नहीं किया है। अधिक क्या कहें, भागवतकारका यहाँतक कहना है, कि बिना भक्तिके सब कर्मयोग वृथा हैं (भाग: १. ५. ३४) । अतएव गीताके तात्पर्यका निश्चय करनेमें जिस महाभारतमें गीता कही गयी है, उसी नारायणीयोपाख्यानका जैसा उपयोग हो सकता है, वैसा भागवतधर्मीय होनेपरभी, भागवत-पुराणका उपयोग नहीं हो सकता; क्योंकि वह