श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रवेश ११
केवल भक्तिप्रधान है । यदि उसका कुछ उपयोग कियाभी जाय, तो इस बातपरभी ध्यान देना पड़ेगा, कि महाभारत और भागवतपुराणके उद्देश्य और रचना-काल भिन्न भिन्न हैं। निवृत्ति-विषयक यतिधर्म और प्रवृत्तिविषयक भागवतधर्मका मूल स्वरूप क्या है ? इन दोनोंमें भेद क्यों हैं ? मूल भागवतधर्म इस समय किस रूपांतरसे प्रचलित है ? इत्यादि प्रश्नोंका विचार आगे चलकर किया जायगा। यह मालूम हो गया, कि स्वयं महाभारतकारके मतानुसार गीताका क्या तात्पर्य है। अब देखना चाहिये कि गीताके भाष्यकारों और टीकाकारोंने गीताका क्या तात्पर्य निश्चित किया है। इन भाष्यों तथा टीकाओंमें आजकल श्रीशंकराचार्य- कृत गीता-भाष्य अतिप्राचीन ग्रंथ माना जाता है। यद्यपि इसकेभी पूर्व गीतापर अनेक भाष्य और टीकाएँ लिखीं जा चुकीं थीं, तथापि वे अब उपलब्ध नहीं हैं; और इसी लिये जान नहीं सकते, कि महाभारतके रचना-कालसे शंकराचार्यके समय- तक गीताका अर्थ किस प्रकार किया जाता था । तथापि शांकरभाष्यहीमें इन प्राचीन टीकाकारोंके मतोंका जो उल्लेख है ( गीता शांभा. अ. २ और ३ का उपोद्घात ) उससे साफ़ साफ़ मालूम होता है, कि शंकराचार्यके पूर्वकालीन टीकाकार, गीताका अर्थ, महाभारत-कर्ताके अनुसारही ज्ञानकर्म समुच्चयात्मक किया करते थे । अर्थात् उसका यह प्रवृत्ति-विषयक अर्थ लगाया जाता था, कि ज्ञानी मनुष्यको ज्ञानके साथ साथ मृत्युपर्यंत स्वधर्मविहित कर्म करना चाहिये। परंतु वैदिक कर्मयोगका यह सिद्धान्त शंकराचार्यको मान्य नहीं था । इसलिये उसका खंडन करने और अपने मतके अनुसार गीताका तात्पर्य बनानेहीके लिये उन्होंने गीता-भाष्यकी रचना की है। यह बात उक्त भाष्यके आरंभके उपोद्घात- में स्पष्ट रीतिसे कही गई है। 'भाष्य' शब्दका अर्थभी यही है। 'भाष्य' और 'टीका' - का बहुतकरके समानार्थी उपयोग होता है; परंतु सामान्यतः 'टीका' मूलग्रंथके सरल अन्वय और उसके सुगम अर्थ करनेहीको कहते हैं। भाष्यकार इतनीही बातोंसे संतुष्ट नहीं रहता, वह उस ग्रंथकी न्याययुक्त समालोचना करता है; अपने मतानुसार उसका तात्पर्य बतलाता है; और उसीके अनुसार वह यहभी बतलाता है, कि ग्रंथका अर्थ कैसे लगाना चाहिये । गीताके शांकरभाष्यका यही स्वरूप है । परंतु गीताके तात्पर्यके विवेचनमें शंकराचार्यने जो भेद किया है उसका कारण जाननेके पहले थोड़ासा पूर्वकालीन इतिहासभी यहीपर जान लेना चाहिये । वैदिक धर्म केवल तांत्रिक धर्म नहीं है। उसमे जो गूढ़ तत्त्व हैं, उनका सूक्ष्म विवेचन प्राचीन समयहीमें उपनिषदोंमें हो चुका है; परंतु ये उपनिषद् भिन्न भिन्न ऋषियों- के द्वारा भिन्न भिन्न समयमें बनाए गये हैं। इसलिये उनमें कहीं कहीं विचार- विभिन्नता और परस्परविरुद्धताभी आगयी है। इस विचार-विरोधको मिटानेके लियेही बादरायणाचार्यने अपने वेदान्तसूत्रोंमें सब उपनिषदोंकी विचारैक्यता कर दी है; और इसी कारणसे वेदान्तसूत्रभी उपनिषदोंके समानही प्रमाण माने जाते