श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हैं। इन्हीं वेदान्तसूत्रोंके दूसरे नाम 'ब्रह्मसूत्र' अथवा 'शारीरकसूत्र' हैं। तथापि वैदिकधर्मके तत्त्वज्ञानका पूर्ण विचार इतनेसेही नहीं हो सकता। क्योंकि उपनिषदोंका ज्ञान प्रायः वैराग्यविषयक अर्थात् निवृत्तिविषयक है; और वेदान्तसूत्र तो सिर्फ उपनिषदोंका मतैक्य करनेहीके उद्देश्यसे बनाए गये हैं। इसलिये उनमेंभी वैदिक प्रवृत्तिमार्गका विस्तृत तात्त्विक विवेचन कहींभी नहीं किया है। इसीलिये उपर्युक्त कथनानुसार जब प्रवृत्तिमार्ग-प्रतिपादक भगवद्गीताने वैदिक धर्मकी तत्त्वज्ञान- संबंधी इस न्यूनताकी पूर्ति पहले पहल की, तब उपनिषदों और वेदान्तसूत्रोंके मार्मिक तत्त्वज्ञानकी पूर्णता करनेवाला यह भगवद्गीता ग्रंथभी, उन्हीके समान सर्वमान्य और प्रमाणभूत हो गया। और, अंतमें उपनिषदों, वेदान्तसूत्रों और भगवद्गीताका 'प्रस्थानत्रयी' नाम पड़ा। 'प्रस्थानत्रयी'का यह अर्थ है कि उसमें वैदिकधर्मके आधारभूत तीन मुख्य ग्रंथ हैं, जिनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गोंका नियमानुसार तथा तात्त्विक विवेचन किया है। इस तरह प्रस्थानत्रयीमें गीताके गिने जानेपर और प्रस्थानत्रयीका दिनोंदिन अधिकाधिक प्रचार होनेपर वैदिक धर्मके लोग उन मतों और संप्रदायोंको गौण अथवा अग्राह्य मानने लगे, जिनका समावेश उक्त तीन ग्रंथोंमें नहीं किया जा सकता था। परिणाम यह हुआ कि बौद्धधर्मके पतनके बाद वैदिकधर्मके जो जो संप्रदाय (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत आदि) हिंदुस्थानमें प्रचलित हुये, उनमेंसे प्रत्येक संप्रदायके प्रवर्तक आचार्यको, प्रस्थानत्रयीके तीनों भागोंपर (अर्थात् भगवद्गीतापरभी) भाष्य लिखकर, यह सिद्धकर दिखानेकी आवश्यकता हुई, कि इन सब संप्रदायोंके जारी होनेके पहलेही जो तीन 'धर्मग्रंथ' प्रमाण समझे जाते थे, उन्हींके आधारपर हमारा संप्रदाय स्थापित हुआ है और अन्य संप्रदाय इन धर्मग्रंथोंके अनुसार नहीं हैं। ऐसा करनेका कारण यही है, कि यदि कोई आचार्य यह स्वीकार कर लेते कि अन्य संप्र- दायभी प्रमाणभूत धर्मग्रंथोंके आधारपर स्थापित हुये हैं, तो उनके संप्रदायका महत्त्व घट जाता - और, ऐसा करना किसीभी संप्रदायको इष्ट नहीं था। सांप्रदायिक दृष्टिसे प्रस्थानत्रयीपर भाष्य लिखनेकी यह रीति जब चल पड़ी, तब भिन्न भिन्न पंडित अनेक संप्रदायोंके भाष्योंके आधारपर टीकाएँ लिखने लगे। और गीतार्थ प्रतिपादन करने लगे। यह टीका उसी संप्रदायके लोगोंको अधिक मान्य हुआ करती थी जिसके भाष्यके अनुसार वह लिखी जाती थी। इस समय गीतापर जितने भाष्य और जितनी टीकाएं उपलब्ध हैं, उनमेंसे प्रायः सब इसी सांप्रदायिक रीतिसे लिखी गयी हैं। उसका परिणाम यह हुआ, कि यद्यपि मूल गीतामें एकही अर्थ सुबोध रीतिसे प्रतिपादित हुआ है तथापि गीता भिन्न भिन्न संप्रदायोंकी समर्थक समझी जाने लगी। इन सब संप्रदायोंमें शंकराचार्यका संप्रदाय अतिप्राचीन है और तत्त्व- ज्ञानकी दृष्टिसे वही हिंदुस्थानमें सबसे अधिक मान्यभी हुआ है। श्रीमदाद्य- शंकराचार्यका जन्म संवत् ८८५ (शक ७१०) में हुआ था। बत्तीसवें वर्षमें उन्होंने