भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विषयप्रवेश १३ गृहा-प्रवेश किया (संवत् ८४५ से ८७७) ।* श्रीशंकराचार्य बड़े भारी अलौकिक विद्वान् तथा ज्ञानी थे । उन्होंने अपनी दिव्य अलौकिक शक्तिसे उस समय चारों ओर फैले हुए जैन और बौद्धमतोंका खंडन करके अपना अद्वैत मत स्थापित किया; श्रुतिस्मृति-विहित वैदिक धर्मकी रक्षाके लिये, भरतखंडकी चारों दिशाओंमें चार मठ बनवाकर, वैदिक संन्यास-धर्म या संप्रदायको कलियुगमें पुनर्जन्म दिया, यह कथा किसीसे छिपी नहीं है । आप किसीभी धार्मिक संप्रदाय- को लीजिये, उसके दो स्वाभाविक विभाग अवश्य होंगे । पहला तत्त्वज्ञानका और दूसरा आचरणका । पहलेमें पिंड-ब्रह्मांडके विचारोंसे परमेश्वरके स्वरूपका निर्णय करके मोक्षकाभी शास्त्रीत्यानुसार निर्णय किया जाता है । दूसरेमें इस बातका विवेचन किया जाता है, कि मोक्षकी प्राप्तिके साधन या उपायकी दृष्टिसे इस संसारमें मनुष्यको किस तरह बर्ताव करना चाहिए । इनमेंसे पहली अर्थात् तात्त्विक दृष्टिसे देखनेपर शंकराचार्यका कथन यह है कि :- (१) मैं, तू अथवा मनुष्यकी आँखसे दिखनेवाला सारा जगत् अर्थात् सृष्टिके पदार्थोंकी अनेकता सत्य नहीं है। इन सबमें एकही शुद्ध और नित्य परब्रह्म भरा हुआ है और उसीकी मायासे मनुष्यकी इंद्रियोंको भिन्नताका भास हुआ करता हैं; (२) मनुष्यकी आत्माभी मूलतः परब्रह्मरूपही है; और (३) आत्मा और परब्रह्मकी एकताका पूर्ण ज्ञान अर्थात् अनुभवसिद्ध पहचान हुए बिना कोईभी मोक्ष नहीं पा सकता । इसीको 'अद्वैतवाद' कहते हैं। क्योंकि एक शुद्ध, बुद्ध, नित्य और मुक्त परब्रह्मके सिवा दूसरी कोईभी स्वतंत्र और सत्य वस्तु नहीं है; दृष्टिगोचर भिन्नता मानवी दृष्टिका भ्रम, या मायाकी उपाधिसे होनेवाला आभास है; माया कुछ सत्य या स्वतंत्र वस्तु नहीं है - वह मिथ्या है। यही उक्त सिद्धान्त का तात्पर्य है । केवल तत्त्वज्ञान- काही यदि विचार करना हो तो शांकर मतकी इससे अधिक चर्चा करनेकी आव- श्यकता नहीं है । परंतु शांकर-संप्रदाय इतनेसेही पूरा नहीं हो जाता । अद्वैत तत्त्व- ज्ञानके साथही शांकर-संप्रदायका औरभी एक सिद्धान्त है जो आचार-दृष्टिसे पहलेके समान महत्त्व का है । उसका तात्पर्य यह है, कि यद्यपि चित्तशुद्धिके द्वारा ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान प्राप्त करनेकी योग्यता पानेके लिये स्मृति ग्रंथोंमें कहे गये गृहस्था- श्रमके कर्म अत्यंत आवश्यक हैं, तथापि इन कर्मोंका आचरण सदैव नहीं करते रहना चाहिये; क्योंकि उन सब कर्मोंका त्याग करके अंतमें संन्यास लिये बिना मोक्ष नहीं मिल सकता । इसका कारण यह है कि कर्म और ज्ञान, अंधकार और प्रकाशके समान परस्परविरोधी हैं। इसलिये सब वासनाओं और कर्मोंके छूटे बिना ब्रह्म- ज्ञानकी पूर्णताही नहीं हो सकती । इसी दूसरे सिद्धान्तको 'निवृत्तिमार्ग' कहते * यह बात आजकल निश्चित हो चुकी है; परंतु हमारे मतसे श्रीमदाद्य- शंकराचार्यका समय इसके औरभी सौ वर्षपूर्व समझना चाहिये । इस आधारके लिये परिशिष्ट प्रकरण देखो ।