श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हैं; और सब कर्मोंका संन्यास करके ज्ञानहीमें निमग्न रहते हैं, इसलिये 'संन्यास- निष्ठा' या 'ज्ञाननिष्ठा' भी कहते हैं। गीतापर श्रीशंकराचार्यका जो भाष्य है उसमें यह प्रतिपादन किया है कि उपनिषद् और ब्रह्मसूत्रमें केवल अद्वैत ज्ञानही नहीं है, किंतु उनमें संन्यासमार्गका, अर्थात् शांकर-संप्रदायके उपर्युक्त दोनों भागोंका- भी उपदेश है (गीता शांभा. उपोद्घात और ब्रह्म. सू. शांभा. २. १. १४ ) इसके प्रमाण-स्वरूप गीताके कुछ वाक्यभी दिये गये हैं; जैसे "ज्ञानाग्निः सर्व- कर्माणि भस्मसात्कुरुते" अर्थात् ज्ञानरूपी अग्निमेंही सब कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं (गीता ४. ३७) और "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते" - अर्थात् सब कर्मोंका अंत ज्ञानहीमें होता है (गीता ४. ३३)। सारांश यह है, कि बौद्ध धर्मकी हार होनेपर प्राचीन वैदिक धर्मके जिस विशिष्ट मार्गको श्रेष्ठ ठहराकर श्रीशंकराचार्यने स्थापित किया, उसीके अनुकूल गीताकाभी अर्थ है। गीतामे ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन नहीं किया गया है, जैसे कि पहलेके टीकाकारोंने कहा है; किंतु उसमें शांकर-संप्रदायके उसी सिद्धान्तका उपदेश भगवानने अर्जुनको दिया गया है, कि कर्म ज्ञान-प्राप्तिका गौण साधन है और सर्व- कर्म-संन्यासपूर्वक ज्ञानहीसे मोक्षकी प्राप्ति होती है - येही बातें बतलानेके लिये शांकरभाष्य लिखा गया है। श्रीशंकराचार्यके पूर्व यदि एक-आध और भी संन्यास- विषयक टीका लिखी गयी हो तो वह इस समय उपलब्ध नहीं है। इसलिये यही कहना पड़ता है कि गीताके प्रवृत्ति-विषयक स्वरूपको बदल करके उसे निवृत्ति- मार्गका सांप्रदायिक रूप शांकरभाष्यके द्वाराही मिला है। श्रीशंकराचार्यके बाद उनके संप्रदायके अनुयायी मधुसूदन आदि जो अनेक टीकाकारहो गये हैं, उन्होंने इस विषयमे मुख्यतः शंकराचार्यहीका अनुकरण किया है। इसके बाद एक और अद्भुत विचार उत्पन्न हुआ, कि अद्वैत मतके मूलभूत महावाक्योंमें से 'तत्त्वमसि' नामक जो महावाक्य छांदोग्योपनिषद्में है, उसीका विवरण गीताके अठारह अध्यायोंमें किया गया है। परंतु इस महावाक्यके क्रमको बदलकर, पहले 'त्वं' फिर 'तत्' और फिर 'असि' इन पदोंको लेकर, इस नये क्रमानुसार प्रत्येक पदके लिये गीताके आरंभमें छः छः अध्याय श्रीभगवानने निष्पक्षपात बुद्धिसे बाँट दिये हैं। कयी लोग समझते हैं, कि गीतापर जो पैशाच भाष्य है वह किसीभी संप्रदाय- का नहीं है - बिल्कुल स्वतंत्र है, और हनुमानजी (पवनसुत) कृत है। परंतु यथार्थ बात ऐसी नहीं है। भागवतके टीकाकार हनुमान पंडितनेही इस भाष्यको बनाया है और यह संन्यासमार्गका है। इसमें कुछ स्थानोंपर शांकरभाष्यकाही अर्थ शब्दशः दिया गया है। मराठीमें पहले और आजतक गीताके जो अनुवाद या निरूपण हुए हैं, वेभी प्रायः शांकरभाष्यके अनुसार हुए हैं। प्रोफेसर मेक्समूलर- की प्रकाशित 'प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला'में स्वर्गवासी काशीनाथपंत तेलंगकृत भगवद्गीताका अंग्रेजी अनुवादभी है। इसकी प्रस्तावनामें लिखा है कि इस