श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रवेश ५ जाता है, कि रामावतारमें वसिष्ठजीने जो उपदेश रामचंद्रजीको दिया, उसीको योगवासिष्ठ कहते हैं; परंतु इस ग्रंथके अंतिम (अर्थात् निर्वाण) प्रकरणमें 'अर्जुनोपाख्यान' भी शामिल है; जिसमें उस भगवद्गीताका सारांश दिया गया है, कि जिसे कृष्णावतारमें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा था। इस उपाख्यानमें भगवद्गीताके अनेक श्लोक ज्यों-कि-त्यों पाये जाते हैं (योग. ६ पू. सर्ग ५२-५८)। ऊपर कहा जा चुका है कि पूणेमें छपे हुए पद्मपुराणमें शिवगीता नहीं मिलती; परंतु उसके न मिलनेपरभी इस प्रतिके उत्तरखंडके १३१ से १४८ अध्यायतक भगवद्गीताके महात्म्यका वर्णन है, और भगवद्गीताके प्रत्येक अध्यायके लिये महात्म्यवर्णनका एक एक अध्याय है; और इसके संबंधमें कथाभी कही गयी है। इसके सिवा वराहपुराणमें एक गीतामाहात्म्य है और शिवपुराणमें तथा वायुपुराणमेभी गीता- महात्म्यका होना बतलाया जाता है; परंतु कलकत्तेके छपे हुए वायुपुराणमें वह हमें नहीं मिला। भगवद्गीताकी छपी हुई पुस्तकोंके आरंभमें 'गीता-ध्यान' नामक नौ श्लोकोंका एक प्रकरण पाया जाता है। नहीं जान पड़ता, कि यह कहांसे लिया गया है; परंतु इसका “भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला०” श्लोक, थोड़े हेरफेरके साथ, हालहीमें प्रकाशित 'ऊरुभंग' नामक भास कविकृत नाटकके आरंभमें दिया हुआ है। इससे ज्ञात होता है, कि उक्त 'ध्यान' भास कविके समयके अनंतर प्रचार- में आया होगा। क्योंकि यह माननेकी अपेक्षा कि भाससरीखे प्रसिद्ध कविने इस श्लोकको गीता-ध्यानसे लिया है; यही कहना अधिक युक्तिसंगत होगा, कि गीता-ध्यानकी रचना भिन्न भिन्न स्थानोंमे लिये हुए, और कुछ नये बनाये हुए श्लोकों- मे की गयी है। भास कवि कालिदाससे पहिले हो गया है। इसलिये उसका समय कम-से-कम संवत् ४३५ (शक तीन सौ) से अधिक अर्वाचीन नहीं हो सकता। * ऊपर कही गयी बातोंसे यह बात अच्छी तरह ध्यानमें आ सकती है, कि भगवद्- गीताके कौन-से और कितने अनुवाद तथा कुछ हेरफेरके साथ कितनी नकलें, तात्पर्य और महात्म्य-पुराणोंमें मिलतें हैं। इस बातका पता नहीं चलता, कि अवधूत और अष्टावक्र आदि दो-चार गीताओँको कब और किसने स्वतंत्र रीतिसे रचा; अथवा वे किस पुराणसे ली गयी हैं। तथापि इन सब गीताओकी रचना तथा विषय-विवेचन- को देखनेसे यही मालूम होता है, कि ये सब ग्रंथ, भगवद्गीताके जगप्रसिद्ध होनेके बादही, बनाये गये हैं। इन गीताओके संबंधमें यह कहनेसेभी कोई हानि नहीं कि वे इसी लिये रची गयी हैं, कि किसी विशिष्ट पंथ या विशिष्ट पुराणमें भगवद्गीताके समान एक-आध गीताके रहे बिना उस पंथ या पुराणकी पूर्णता नहीं हो सकती थी। जिस तरह श्रीभगवानने भगवद्गीतामें अर्जुनको विश्वरूप दिखाकर
- उपर्युक्त अनेक गीताओँ तथा भगवद्गीताको श्री. हरि रघुनाथ भागवतने पुणेसे प्रकाशित किया।