श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूतगीता, सूर्यगीता इत्यादि अनेक गीताएँ प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे कुछ तो, स्वतंत्र रीतिसे निर्माण की गयी हैं और शेष भिन्न भिन्न पुराणोंमें हैं। जैसे, गणेशपुराणके अंतिम क्रीडाखंडके १३८ से १४८ अध्यायोंमें गणेशगीता कही गयी हैं। इसे यदि थोड़े हेर- फेरके साथ भगवद्गीताकी नक़ल कहें तो कोई हानि नहीं। कूर्मपुराणके उत्तरभागके पहले ग्यारह अध्यायोंमें ईश्वरगीता है। इसके बाद व्यासगीताका आरंभ हुआ है। स्कंदपुराणांतर्गत सूतसंहिताके चौथे अर्थात् यज्ञवैभवखंड के उपरिभागके आरंभ (१ से १२ अध्यायतक) में ब्रह्मगीता है और इसके बादके अध्यायोंमें सूतगीता, हैं। यह तो हुई आठ स्कंदपुराणकी ब्रह्मगीता; दूसरी एक और ब्रह्मगीता है, जो योगवासिष्ठके निर्वाण प्रकरणके उत्तरार्ध (सर्ग १७३ से १८१ तक) में आ गयी है। यमगीताएँ तीन प्रकारकी हैं। पहली विष्णुपुराणके तीसरे अंशके सातवें अध्यायमें; दूसरी, अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८१ वें अध्यायमें; और तीसरी, नृसिंहपुराणके आठवें अध्यायमें है। यही हाल रामगीताका है। महाराष्ट्रमें जो रामगीता प्रचलित है वह अध्यात्मरामायणके उत्तरकांडके पाँचवें सर्गमें है; और यह अध्यात्मरामायण ब्रह्मांडपुराणका एक भाग माना जाता हैं; परंतु इसके सिवा एक दूसरी रामगीता 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक ग्रंथमें है, जो मद्रासकी ओर प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ वेदान्तविषयपर लिखा गया है। इसमें ज्ञान, उपासना और कर्म-संबंधी तीन कांड हैं। इसके उपासनाकांडके द्वितीय पादके पहले अठारह अध्यायोंमें रामगीता है और कर्मकांडके तृतीय पादके पहले पाँच अध्यायोंमें सूर्यगीता है। कहते हैं कि शिवगीता पद्मपुराणके पातालखंडमें है। पर इस पुराणकी जो प्रति पूणेके आनंदाश्रममें छपी है उसमें शिवगीता नहीं है। पंडित ज्वालाप्रसादने अपने 'अष्टादशपुराणदर्शन' ग्रंथमें लिखा है कि शिवगीता गौड़ीय पद्मोत्तरपुराणमें है। नारदपुराणमें अन्य पुराणोंके साथ साथ, पद्मपुराणकीभी जो विषयानुक्रमणिका दी गयी है, उसमें शिवगीताका उल्लेख पाया जाता है। श्रीमद्- भागवतपुराणके ग्यारहवें स्कंधके तेरहवें अध्यायमें हंसगीता और तेईसवें अध्यायमें भिक्षुगीता कही गयी है। तीसरे स्कंधके कपिलोपाख्यान (अ. २३-३३) को कई लोग 'कपिलगीता' कहते हैं; परंतु 'कपिलगीता' नामक एक छपी हुई स्वतंत्र पुस्तक हमारे देखनेमें आई है, जिनमें हठयोगका प्रधानतः वर्णन किया गया है; और लिखा है, कि यह कपिलगीता पद्मपुराणसे ली गयी है; परंतु यह गीता पद्मपुराणमें हैही नहीं। इसमें एक स्थान (४. ७) पर जैन, जंगम और सूफ़ीका उल्लेख किया गया है, जिससे कहना पडता है, कि यह गीता मुसलमानी शासनकालके बादकी होगी। भागवतपुराणहीके समान देवीभागवतमेंभी, सातवें स्कंधके ३१ से ४० अध्यायतक एक गीता है, और देवीसे कही जानेके कारण उसे देवीगीता कहते हैं। केवल भगवद्गीताहीका सार अग्निपुराणके तीसरे खंडके ३८० वें अध्यायमें, तथा गरुडपुराणके पूर्वखंडके २४२ वें अध्यायमें दिया हुआ है। इसी तरह कहा