श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रवेश ३ इस ग्रंथमे सब उपनिषदोंका सार आ गया है; इसीसे इसका पूरा नाम ‘श्रीमद्भगवद्गीता-उपनिषत्’ है। गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमे जो अध्याय- समाप्ति-दर्शक संकल्प है, उसमें “इति श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे” इत्यादि शब्द है। यह संकल्प यद्यपि मूलग्रंथ (महा- भारत) में नहीं है, तथापि यह गीताकी सभी प्रतियोंमे पाया जाता है। इससे अनुमान होता है, कि गीताकी किसीभी प्रकारकी टीका हो जानेके पहलेही, जब महाभारतसे गीता नित्यपाठके लिये अलग निकाल ली गयी तभीसे उक्त संकल्पका प्रचार हुआ होगा। इस दृष्टिसे, गीताके तात्पर्यका निर्णय करनेके कार्यमें उसका महत्त्व कितना है, यह आगे चलकर बताया जायगा। यहाँ इस संकल्पके केवल दो पद (भगवद्गीतासु उपनिषत्सु) विचारणीय है। ‘उपनिषत्’ शब्द हिंदीमें पुल्लिंग माना जाता है; परंतु वह संस्कृतमें स्त्रीलिंग है। इसलिये “श्रीभगवान्ने गाया गया अर्थात् कहा गया उपनिषद्” यह अर्थ प्रकट करनेके लिये संस्कृतमे “श्रीमद्- भगवद्गीता उपनिषत्” ये दो विशेषण-विशेष्यरूप स्त्रीलिंग शब्द प्रयुक्त हुए हैं, और यद्यपि ग्रंथ एकही है, तथापि सम्मानके लिये ‘श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु’ ऐसा सप्तमीके बहुवचनका प्रयोग किया गया है। शंकराचार्यके भाष्यमेंभी इस ग्रंथको लक्ष्य करके ‘इति गीतासु’ यह बहुवचनांत प्रयोग पाया जाता है। परंतु नामको संक्षिप्त करनेके समय आदरसूचक प्रत्यय, पद तथा अंतिम सामान्य जाति- वाचक ‘उपनिषत्’ शब्दभी उड़ा दिया गया; जिससे ‘श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद्’ इन प्रथमाके एकवचनान्त शब्दोंके बदले पहले ‘भगवद्गीता’ और फिर केवल ‘गीता’- ही संक्षिप्त नाम प्रचलित हो गया। ऐसे बहुत-से संक्षिप्त नाम प्रचलित हैं। जैसे— कठ, छांदोग्य, केन इत्यादि। यदि ‘उपनिषद्’ शब्द मूल नाममे न होता तो ‘भागवतम्’, ‘भारतम्’, ‘गोपीगीतम्’ इत्यादि शब्दोंके समान इस ग्रंथका नामभी ‘भगवद्गीतम्’ या केवल ‘गीतम्’ बन जाता; जैसा कि नपुंसकलिंगके शब्दोंका स्वरूप होता है। परंतु जब कि ऐसा हुआ नहीं है और ‘भगवद्गीता’ या ‘गीता’ यही स्त्रीलिंग शब्द अबतक बना रहा है, तब उसके सामने ‘उपनिषत्’ शब्दको नित्य अध्याहृत समझना- ही चाहिये। अनुगीताकी अर्जुनमिश्रकृत टीकामे ‘अनुगीता’ शब्दका अर्थभी इसी रीतिसे किया गया है। परंतु सात सौ श्लोकोंकी भगवद्गीताकोही गीता नहीं कहते। अनेक ज्ञान- विषयक ग्रंथभी गीता कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत मोक्ष- पर्वके कुछ फुटकर प्रकरणोंको पिंगलगीता, शंपाकगीता, मंकिगीता, बोध्यगीता, विचख्युगीता, हारितगीता, वृत्रगीता, पराशरगीता और हंसगीता कहते हैं। अश्वमेध पर्वकी अनुगीताके एक भागका विशेषनाम ‘ब्राह्मणगीता’ है। इनके सिवा अवधूत- गीता, अष्टावक्रगीता, ईश्वरगीता, उत्तरगीता, कपिलगीता, गणेशगीता, देवीगीता, पाण्डवगीता, ब्रह्मगीता, भिक्षुगीता, यमगीता, रामगीता, व्यासगीता, शिवगीता,