भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, उसकी योग्यताका वर्णन कैसे किया जाय ? महाभारतकी लड़ाई समाप्त होनेपर एक दिन श्रीकृष्ण और अर्जुन प्रेमपूर्वक बातचीत कर रहे थे । उस समय अर्जुनके मन इच्छा हुई कि श्रीकृष्णसे एक बार फिर गीता सुने । तुरंत अर्जुनने विनती की, " महाराज ! आपने जो उपदेश मुझे युद्धके आरंभमें दिया था उसे मैं भूल गया हूँ । कृपा करके फिर एक बार उसे बतलाइये ।" तब श्रीकृष्ण भगवानने उत्तर दिया कि — उसे " उस समय मैंने अत्यंत योगयुक्त अंतःकरणसे उपदेश किया था । अब संभव नही कि मैं वैसेही उपदेश फिर कर सकूँ ।" यह बात अनुगीताके प्रारंभ (महाभारत अश्वमेध अध्याय १६, श्लोक १० से १३) में दी हुई है । सच पूछें तो भगवान् श्रीकृष्णचंद्रके लिये कुछभी असंभव नहीं है; परंतु उनके उक्त कथनसे यह बात अच्छी तरह मालूम हो सकती है, कि गीताका महत्त्व कितना अधिक है । यह ग्रंथ, वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न संप्रदायोंमें, वेदके समान, आज क़रीब ढाई हजार वर्षोंसे सर्वमान्य तथा प्रमाणस्वरूप हो गया है; इसका कारणभी उक्त ग्रंथका महत्त्वही है । इसी लिये गीता-ध्यानमें इस स्मृतिकालीन ग्रंथका अलंकार- युक्त, परंतु यथार्थ वर्णन इस प्रकार किया गया है :- सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ अर्थात् जितने उपनिषद् हैं वे मानों गौएँ हैं, श्रीकृष्ण स्वयं दूध दुहनेवाले (ग्वाला) हैं, बुद्धिमान् अर्जुन (उन गौओंको पन्हानेवाला) भोक्ता बछड़ा (वत्स) हैं, और जो दूध दुहा गया वही मधुर गीतामृत है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, कि हिंदु- स्थानकी सब भाषाओंमें इसके अनेक अनुवाद, टीकाएँ और विवेचन हो चुके हैं; परंतु जबसे पश्चिमी विद्वानोंको संस्कृत भाषाका ज्ञान होने लगा है, तबसे ग्रीक, लेटिन, जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि यूरोपकी भाषाओंमेंभी इसके अनेक अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । तात्पर्य यह है, कि इस समय यह अद्वितीय ग्रंथ समस्त संसारमें प्रसिद्ध है । श्लोकका अर्थ है । महाभारत (उ. ४८. ७-९ और २०-२२; तथा वन. १२. ४४- ४६) में लिखा है, कि नर और नारायण ये दोनों ऋषि दो स्वरूपोंमें विभक्त - साक्षात् परमात्मा - ही हैं, और इन्हीं दोनोंने आगे चलकर अर्जुन तथा श्रीकृष्णका अवतार लिया । सब भागवतधर्मीय ग्रंथोंके आरंभमे इन्हींको प्रथम इसलिये नमस्कार करते हैं, कि निष्काम कर्म-युक्त नारायणीय तथा भागवत-धर्मको इन्होंने- ही पहलेपहल जारी किया था । इस श्लोकमे कहीं कहीं 'व्यास' के बदले 'चैव' पाठभी है; परंतु हमें यह युक्तिसंगत नहीं मालूम होता; क्योंकि, जैसे भागवत-धर्मके प्रचारक नर-नारायणको प्रणाम करना सर्वथा उचित है, वैसेही इस धर्मके दो मुख्य ग्रंथों (महाभारत और गीता) के कर्ता व्यासजीकोभी नमस्कार करना उचित है । महाभारतका प्राचीन नाम 'जय' है (महा. आ. ६२. २०) ।