श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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श्रीगणेशाय नमः । ॐ तत्सत् । श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ▭ ▭ पहला प्रकरण विषयप्रवेश नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ *
- महाभारत, आदिम श्लोक । श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथोंका एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है । पिंड-ब्रह्मांड-ज्ञानसहित आत्मविद्याके गूढ़ और पवित्र तत्त्वोंको थोड़ेमें और स्पष्ट रीतिसे समझा देनेवाला, उन्हीं तत्त्वोंके आधारपर मनुष्यमात्रके पुरुषार्थ- की - अर्थात् आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी - पहचान करा देनेवाला, भक्ति, और ज्ञानका मेल कराके इन दोनोंका शास्त्रोक्त व्यवहारके साथ संयोग करा देनेवाला और इसके द्वारा संसारसे त्रस्त मनुष्यको शांति देकर उसे निष्काम कर्तव्यके आचरणमें लगानेवाला गीताके समान बालबोध ग्रंथ, संस्कृतकी कौन कहे, समस्त संसारके साहित्यमेंभी नहीं मिल सकता । केवल काव्यकीही दृष्टिसे यदि इसकी परीक्षा की जाय तोभी यह ग्रंथ उत्तम काव्योंमें गिना जा सकता है; क्योंकि इसमें आत्मज्ञानके अनेक गूढ़ सिद्धान्त ऐसी प्रासादिक भाषामें लिखे गये हैं, कि वे बूढ़ों और बच्चोंको एकसमान सुगम हैं; और इसमें ज्ञानयुक्त भक्तिरसभी भरा पड़ा है । जिस ग्रंथमें समस्त वैदिक धर्मका सार स्वयं श्रीकृष्ण भगवानकी वाणीसे संगृहित
- नारायणको, मनुष्योंमें जो श्रेष्ठ नर है उसको, सरस्वती देवीको और व्यासजीको नमस्कार करके फिर 'जय' अर्थात् महाभारतको पढ़ना चाहिये - यह