भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 956 में से

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गीतारहस्यके संक्षिप्त चिन्होंका ब्योरा, और संक्षिप्त चिन्होंसे जिन ग्रंथोंका उल्लेख किया है, उनका परिचय अथर्व. अथर्व वेद । कांड, सूक्त और ऋचाके क्रमसे आगेके अंक हैं । अष्टा. अष्टावक्रगीता । अध्याय और श्लोक । अष्टेकर और मंडलीका गीतासंग्रहका संस्करण । ईश. ईशावास्योपनिषद् । आनंदाश्रमका संस्करण । ऋ. ऋग्वेद । मंडल, सूक्त और ऋचा । ऐ. अथवा ऐ. उ. ऐतरेयोपनिषद् । अध्याय, खंड और श्लोक । आनन्दाश्रमका संस्करण । ऐ. ब्रा., ऐतरेय ब्राह्मण । पंचिका और खंड । डॉ. हौडाका संस्करण । क. अथवा कठ. कठोपनिषद् । वल्ली और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । केन. केनोपनिषद् (= तलवकारोपनिषद्) । खंड और मंत्र । आनंदाश्रमका संस्करण । कै. कैवल्योपनिषद् । खंड और मंत्र । २८ उपनिषद्, निर्णयसागरका संस्करण । कौषी. कौषीतक्युपनिषद् अथवा कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् । अध्याय और खंड । कहीं कहीं इस उपनिषदके पहले अध्यायकोही ब्राह्मणानुक्रमसे तृतीय अध्याय कहते हैं। आनंदाश्रमका संस्करण । गा. तुकाराम महाराजकी गाथा (मराठी) दामोदर सांवळाराम संस्करण, ई. सन १९०० । गी. भगवद्गीता । अध्याय और श्लोक । गी. शां. भा. गीता शांकरभाष्य । गी. रा. भा. गीता रामानुजभाष्य । आनंदाश्रमवाली गीता, और शांकर- भाष्यकी प्रतिके अंतमें शब्दोंकी सूचि है, जो अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई । हमने निम्नलिखित टीकाओंका उपयोग किया - श्रीवेंकटेश्वर प्रेसका रामा- नुजभाष्य; कुंभकोणके कृष्णाचार्यद्वारा प्रकाशित मध्वभाष्य; जगद्धितेच्छु छापाखानेमें (पूना) छपी हुई आनंदगिरीकी टीका और परमार्थप्रपा टीका; नेटिव ओपिनियन छापाखाने (बम्बई) में छपी हुई मधुसूदनी टीका; निर्णय- सागरमें छपी हुई श्रीधरी और वामनी (मराठी) टीका; आनंदाश्रममें छपा हुआ पैशाचभाष्य; गुजराती प्रिंटिंग प्रेसकी वल्लभसंप्रदायी तत्त्व- दीपिका; बम्बईमें छपे हुए महाभारतकी नीलकण्ठी; और मद्रासम छपी हुई ब्रह्मानंदी । परंतु इनमेंसे पैशाचभाष्य और ब्रह्मानंदीको छोड़कर शेष टीकाएँ और निम्बार्क संप्रदायकी एवं दूसरी कुछ और टीकाएँ - कुल पंद्रह संस्कृत टीकाएँ - गुजराती प्रिंटिंग प्रेसने अभी अभी छाप कर प्रकाशित की हैं, अतः अब इस एकही ग्रंथसे सारा काम हो जाता है ।

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