श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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विषयोंकी अनुक्रमणिका ३१ मूल अगम्य, इसलिये यद्यपि माया परतंत्र हो, तथापि अनादि - मायात्मक प्रकृतिका विस्तार अथवा सृष्टिही कर्म - अतएव कर्मभी अनादि - कर्मके अखंडित प्रयत्न - परमेश्वर उसमें हस्तक्षेप नहीं करता, और कर्मानुसारही फल देता है (पृ. २६९)
- कर्मबंधकी सुदृढ़ता और प्रवृत्तिस्वातंत्र्यवादकी प्रस्तावना - कर्म-विभाग; संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण - 'प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः' - वेदान्तको मीमांसकोंका नैष्कर्म्य-सिद्धिवाद अग्राह्य है - ज्ञान बिना कर्मबंधसे छुटकारा नहीं - ज्ञान शब्दका अर्थ - ज्ञानप्राप्ति कर लेनेके लिये शारीर आत्मा स्वतंत्र है (पृ. २८४) - परंतु उसके पास कर्म करनेके निजी साधन नहीं हैं, इस कारण उतनेहीके लिये परावलंबी
- मोक्षप्राप्त्यर्थ आचरित स्वल्प कर्मभी व्यर्थ नहीं जाता - अतः कभी-न-कभी दीर्घ उद्योग करते रहनेसे सिद्धि अवश्य मिलती है - कर्मक्षयका स्वरूप - कर्म नहीं छूटते, फलाशाको छोड़ो - कर्मका बंधकत्व मनमें है, न कि कर्ममें - इसलिये ज्ञान कभी हो, मोक्षही उसका फल - तथापि उसमेंभी अंतकालका महत्त्व (पृ. २८९) - कर्मकांड और ज्ञानकांड - श्रौतयज्ञ और स्मार्तयज्ञ - कर्मप्रधान गार्हस्थ्यवृत्ति - उसीके दो भेद, ज्ञानयुक्त और ज्ञानरहित - उसके अनुसार भिन्न भिन्न गतियाँ - देवयान और पितृयाण - कालवाचक या देवतावाचक - तीसरी नरककी गति - जीवन्मुक्तावस्थाका वर्णन। ... ... ... पृ. २६२-३०२ ग्यारहवाँ प्रकरण - संन्यास और कर्मयोग अर्जुनका प्रश्न, कि संन्यास और कर्मयोग, दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा - इस पंथके समानही पश्चिमो पंथ - संन्यास और कर्मयोगके पर्याय शब्द - संन्यास शब्दका अर्थ - कर्मयोग संन्यास मार्गका अंग नहीं है, दोनों स्वतंत्र - इस संबंधमें टीकाकारोंका गोलमाल - गीताका स्पष्ट सिद्धान्त कि इन दोनों मार्गोंमें कर्मयोगही श्रेष्ठ - संन्यासमार्गीय टीकाकारोंका किया हुआ विपर्यास - उसपर उत्तर - अर्जुनको अज्ञानी नहीं मान सकते (पृ. ३१३) - इस बातके गीतामें निर्दिष्ट कारण, कि कर्मयोगही श्रेष्ठ क्यों है - आचार अनादि कालसे द्विविध, अतः श्रेष्ठताका निर्णय करनेमें उपयोगी नहीं - जनककी तीन और गीताकी दो निष्ठाएँ
- कर्मोंको बंधक कहनेसे, यह सिद्ध नहीं होता, कि उन्हें छोड़ देना चाहिये; फलाशा छोड़ देनेसे निर्वाह हो जाता है - कर्म छूट नहीं सकते - कर्म छोड़ देनेपर खानेके लियेभी न मिलेगा - ज्ञान हो जानेपर अपना कर्तव्य न रहे, अथवा वासनाका क्षय हो जाय, तोभी कर्म नहीं छूटते - अतएव ज्ञानप्राप्तिके पश्चातभी निःस्वार्थबुद्धिसे कर्म अवश्य करना चाहिये - भगवानका और जनकका उदाहरण - फलाशात्याग, वैराग्य और कर्मोत्साह (पृ. ३२१) - लोकसंग्रह और उसका लक्षण - ब्रह्मज्ञानका यही सच्चा पर्यवसान - तथापि वह लोकसंग्रहभी चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार और निष्काम (पृ. ३३८) - स्मृतिग्रंथोंमें वर्णित चार आश्रमोंका आयु बितानेका