भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 35

३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसकी तुलना - सजीव सृष्टि और लिंगशरीर - वेदान्तमें वर्णित लिंगशरीरका और सांख्यशास्त्रमे वर्णित लिंगशरीरका भेद - बुद्धिके भाव और वेदान्तका कर्म - प्रलय - उत्पत्तिकी प्रलयकाल - कल्पयुगमान - ब्रह्मा - दिन-रात और उसकी सारी आयु - सृष्टिकी उत्पत्तिके अन्य क्रमसे विरोध और एकता । पृ. १७०-१९६ नवाँ प्रकरण - अध्यात्म प्रकृति और पुरुष द्वैतपर आक्षेप - दोनोंसे परे रहनेवालेका विचार करनेकी पद्धति - दोनोंसेभी परेका एकही परमात्मा अथवा पर पुरुष - प्रकृति (जगत्), पुरुष (जीव) और परमेश्वर, यह त्रयी - गीतामें वर्णित परमेश्वरका स्वरूप - व्यक्त अथवा सगुण रूप और उसकी गौणता - अव्यक्त किंतु मायासे व्यक्त होनेवाला - अव्यक्तकेही तीन भेद, सगुण, निर्गुण और सगुण-निर्गुण - उपनिषदोंके तत्सदृश वर्णन - उपनिषदोंमें उपासनाके लिये बतलाई हुई विद्याएँ और प्रतीक - विविध अव्यक्त रूपोंमें निर्गुणही श्रेष्ठ (पृ. २०९) - उक्त सिद्धान्तोंकी शास्त्रीय उपपत्ति - निर्गुण और सगुणके गहन अर्थ - अमृतत्वकी स्वभावसिद्ध कल्पना - सृष्टिज्ञान कैसे और किसका होता है ? - ज्ञानक्रियाका वर्णन और नामरूपोंकी व्याख्या - नामरूपोंका दृश्य और वस्तुतत्त्व - सत्यकी व्याख्या - विनाशी होनेसे नामरूप असत्य हैं- और नित्य होनेसे वस्तुतत्त्व सत्य है - वस्तुतत्त्वही अक्षरब्रह्म है और नामरूप माया - सत्य और मिथ्या शब्दोंके वेदान्तशास्त्रानुसार अर्थ - आधि- भौतिक शास्त्रोंकी नामरूपात्मकता (पृ. २३३) - विज्ञानवाद वेदान्तको ग्राह्य नहीं - मायावादकी प्राचीनता - नामरूपसे आच्छादित नित्य ब्रह्मका और शारीर आत्माका स्वरूप एकही - दोनोंकोभी चिद्रूप क्यों कहते हैं ? - ब्रह्मात्मैक्य याने - 'जो पिंडमें वही ब्रह्मांड में' - ब्रह्मानन्द मैं-पनकी मृत्यु - तुरीयावस्था अथवा निर्विकल्प समाधि - अमृतत्वसीमा और मरणका मरण (पृ. २३४) - द्वैतवादकी उत्पत्ति - गीता और उपनिषद्, दोनों अद्वैत वेदांतकाही प्रतिपादन करते हैं

  • निर्गुणसे सगुण मायाकी उत्पत्ति कैसे होती है ? - विवर्तवाद और - गुण- परिणामवाद - जगत्, जीव और परमेश्वरविषयक अध्यात्मवादके संक्षिप्त सिद्धान्त (पृ. २४४) - ब्रह्मका सत्यानृतत्व - ॐ तत्सत् और अन्य ब्रह्मनिर्देश - जीव परमेश्वरका 'अंश' कैसे ? - दिक्कालसे परमेश्वर अमर्यादित (पृ. २४७-२४८)
  • अध्यात्मशास्त्रका अंतिम सिद्धान्त - देहेंद्रियोंमें भरी हुई साम्यबुद्धि - मोक्षस्वरूप और सिद्धावस्थाका वर्णन (पृ. २५१) - ऋग्वेदके नासदीय सूक्तका सार्थ विवरण - पूर्वापर प्रकरणकी संगति । ... ... पृ. १९७-२६१ दसवाँ प्रकरण - कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य मायासृष्टि और ब्रह्मसृष्टि - देहके कोश और कर्माश्रयीभूत लिंगशरीर - कर्म, नामरूप और मायाका पारस्परिक संबंध - कर्मकी और मायाकी व्याख्या - मायाका