भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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विषयोंकी अनुक्रमणिका २९ है – अध्यात्मपक्षके आक्षेप – मनुष्यदेहरूपी बड़ा कारखाना – कर्मेन्द्रियों और ज्ञाने- न्द्रियोंके व्यापार – मन और बुद्धिके पृथक् पृथक् काम – व्यवसायात्मका और वासनात्मक बुद्धिका भेद एवं संबंध – व्यवसायात्मका बुद्धि एकही है, परंतु, सात्त्विक आदि भेदोंसे तीन प्रकारकी है – सद्सद्विवेकबुद्धि इसीमें है, पृथक् नहीं है – क्षेत्र- क्षेत्रज्ञविचारका और क्षर-अक्षर-विचारका स्वरूप एवं कर्मयोगसे संबंध – क्षेत्र शब्दका अर्थ – क्षेत्रज्ञका अर्थात् आत्माका अस्तित्व – क्षर-अक्षर -विचारकी प्रस्तावना । . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . पृ. १२४–१४९ सातवाँ प्रकरण – कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार क्षर और अक्षरका विचार करनेवाले शास्त्र – काणादोंका परमाणुवाद – कापिलसांख्य – सांख्य शब्दका अर्थ – कापिलसांख्यविषयक ग्रंथ – सत्कार्यवाद – जगतका मूल द्रव्य अथवा प्रकृति एकही है – सत्त्व, रज और तम, उसके तीन गुण – त्रिगुणकी साम्यावस्था और पारस्परिक रगड़े-झगड़ेसे नाना पदार्थोंकी उत्पत्ति – प्रकृति अव्यक्त, अखंडित, एकरूप और अचेतन – अव्यक्तसे व्यक्त – प्रकृतिसेही मन और बुद्धिकी उत्पत्ति – सांख्यशास्त्रको हेकेलका जडाद्वैत और प्रकृतिसे आत्माकी उत्पत्ति स्वीकृत नहीं – प्रकृति और पुरुष दो स्वतंत्र तत्त्व – उनमेंसे पुरुष अकर्ता, निर्गुण और उदासीन, सारा कर्तृत्व प्रकृतिका – दोनोंके संयोगसे सृष्टिका विस्तार – प्रकृति और पुरुषके भेदको पहचान लेनेसे कैवल्यकी अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति – मोक्ष किसका, प्रकृतिका या पुरुषका ? – सांख्योंके असंख्य पुरुष और वेदान्तियोंका एक पुरुष – त्रिगुणातीत अवस्था – सांख्योंके और गीताके तत्सदृश सिद्धान्तोंके भेद । . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . पृ. १५०–१६९ आठवाँ प्रकरण – विश्वकी रचना और संहार प्रकृतिका विस्तार – ज्ञान-विज्ञानका लक्षण – भिन्न भिन्न सृष्ट्युत्पत्तिक्रम और उनकी अंतिम एकवाक्यता – आधुनिक उत्क्रांतिवादका स्वरूप और सांख्योंके गुणोत्कर्ष तत्त्वसे उसकी ममता – गुणोत्कर्षका अथवा गुणपरिणामवादका निरूपण – प्रकृतिसे प्रथम व्यवसायात्मका बुद्धिकी और फिर अहंकारकी उत्पत्ति – उसके त्रिघात अनंत भेद – अहंकारसे फिर सेंद्रिय-सृष्टिके मनसहित ग्यारह तत्त्वोंकी, और निरिंद्रिय-सृष्टिके तन्मात्ररूपी पांच तत्त्वोंकी उत्पत्ति – इस बातका निरूपण, कि तन्मात्राएँ पाँचही क्यों और सूक्ष्मइन्द्रियाँ ग्यारहही क्यों ? – सूक्ष्म सृष्टिमें स्थूल विशेष – पच्चीस तत्त्वोंका ब्रह्मांडवृक्ष – अनुगीताका ब्रह्मवृक्ष और गीताका अश्वत्थवृक्ष – पच्चीस तत्त्वोंका वर्गीकरण करनेकी सांख्योंकी तथा वेदान्तियोंकी भिन्न-भिन्न रीति – उनका नकशा – वेदान्तग्रंथोंमें वर्णित स्थूल पंचमहाभूतोंकी उत्पत्तिका क्रम–और फिर पंचीकरणसे सारे स्थूल पदार्थ – उपनिषदोंके त्रिवृत्करणमे