श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
- जगतका धारण करता है, इसलिये धर्म - चोदनालक्षण धर्म - धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये साधारण नियम - 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' और उसके दोष - 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' और उसकी अपूर्णता - अविरोधसे धर्मनिर्णय - कर्मयोगशास्त्रका कार्य। . . . . . . . . . . . . पृ. ५२-७४ चौथा प्रकरण - आधिभौतिक सुखवाद स्वरूप-प्रस्ताव - धर्म-अधर्म-निर्णायक तत्त्व - चार्वाकका केवल स्वार्थ - हॉब्सका दूरदर्शी स्वार्थ - स्वार्थबुद्धिके समानही परोपकारबुद्धिभी नैसर्गिक - याज्ञवल्क्यका आत्मार्थ - स्वार्थ-परार्थ-उभयवाद अथवा उदात्त या उच्च स्वार्थ - उसपर आक्षेप - परार्थप्रधान पक्ष - अधिकांश लोगोंका अधिक सुख - उसपर आक्षेप - अधिकांश लोगोंका अधिक हित कौन और कैसे निश्चित करेगा - कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिका महत्त्व - परोपकार क्यों करना चाहिये - मनुष्यजातिकी पूर्ण अवस्था - श्रेय और प्रेय - सुखदुःखकी अनित्यता और नीतिधर्मकी नित्यता। पृ. ७५-९४ पाँचवा प्रकरण - सुखदुःखविवेक प्रत्येककी सुखके लिये प्रवृत्ति - सुखदुःखके लक्षण और भेद - सुख स्वतंत्र है या दुःखाभावरूप ? - संन्यासमार्गका मत - उसका खंडन - गीताका सिद्धान्त
- सुख और दुःख, दो स्वतंत्र भाव - इस लोकमें प्राप्त होनेवाले सुखदुःख विपर्यय - संसारमें सुख अधिक, या दुःख अधिक ? - पश्चिमी सुखाधिक्यवाद - मनुष्यके आत्महत्या न करनेसे संसारका सुखमयत्व सिद्ध नहीं होता - सुखकी इच्छाकी अपार वृद्धि - सुखकी इच्छा सुखोपभोगसे तृप्त नहीं होती - अतएव संसारमें दुःखकी अधिकता - हमारे शास्त्रकारोंका तदनुकूल सिद्धान्त - शोपेनहरका मत - असंतोषका उपयोग - उसके दुष्परिणामोंको हटानेका उपाय - सुखदुःखके अनुभवकी आत्मवशता, और फलाशाका लक्षण - फलाशाको त्यागनेसेही दुःखनिवारण होता है, अतः कर्मत्यागका निषेध - इंद्रियनिग्रहकी मर्यादा - कर्मयोगकी चतुःसूत्री - शारीरिक अर्थात् आधिभौतिक सुखका पशुधर्मत्व - आत्मप्रसादज अर्थात् आध्यात्म- त्मिक सुखकी श्रेष्ठता और नित्यता - इन दोनों सुखोंकी प्राप्तिही कर्मयोगकी दृष्टिसे परम साध्य है - विषयोपभोग सुख अनित्य है और परम साध्य होनेके लिये अयोग्य है - आधिभौतिक सुखवादकी अपूर्णता। . . . . . . . . . पृ. ९५-१२३ छठा प्रकरण - आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार पश्चिमी सदसद्विवेकदेवतापक्ष - उसके समान मनोदेवताके संबंध में हमारे ग्रंथोंके वचन - आधिदैवतपक्षपर आधिभौतिकपक्षके आक्षेप - आदत और अभ्याससे कार्य-अकार्यका निर्णय शीघ्र हो जाता है - सदसद्विवेक कुछ निराली शक्ति नहीं