श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतारहस्यके प्रत्येक प्रकरणके विषयोंकी अनुक्रमणिका पहला प्रकरण – विषयप्रवेश श्रीमद्भगवद्गीताकी योग्यता – गीताके अध्याय-परिसमाप्तिसूचक संकल्प – गीता शब्दका अर्थ – अन्यान्य गीताओँका वर्णन, और उनकी एवं योगवाशिष्ठ आदिकी गौणता – ग्रंथपरीक्षाके भेद – भगवद्गीताके आधुनिक बहिरंगपरीक्षक – महाभारतप्रणेताका बतलाया हुआ गीता-तात्पर्य – प्रस्थानत्रयी और उसपर सांप्रदायिक भाष्य – उनके अनुसार गीताके तात्पर्य – श्रीशंकराचार्य – मधुसूदन – तत्त्वमसि – पैशाचभाष्य – रामानुजाचार्य – मध्वाचार्य – वल्लभाचार्य – निंबार्क – श्रीधरस्वामी – ज्ञानेश्वर – सबकी दृष्टि सांप्रदायिक – सांप्रदायिक दृष्टि छोड़कर ग्रंथका तात्पर्य निकालनेकी रीति – सांप्रदायिक दृष्टिसे उसकी उपेक्षा – गीताका उपक्रम और उपसंहार – परस्परविरुद्ध नीति-धर्मोंका झगड़ा और उसमें होनेवाला कर्तव्यधर्म-मोह – उसके निवारणार्थ गीताका उपदेश। . . . . . .पृ. १-२८ दूसरा प्रकरण – कर्मजिज्ञासा कर्तव्यमूढ़ताके दो अंग्रेजी उदाहरण – इस दृष्टिसे महाभारतका महत्त्व – अहिंसाधर्म और उसके अपवाद – क्षमा और उसके अपवाद – हमारे शास्त्रोंका सत्यानृतविवेक – अंग्रेजी नीतिशास्त्रके विवेकके साथ उसकी तुलना – हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टिकी श्रेष्ठता और महत्ता – प्रतिज्ञापालन और उसकी मर्यादा – अस्तेय और उसका अपवाद – ‘मरनेसे जिंदा रहना श्रेयस्कर है’ इसके अपवाद – आत्मरक्षा – माता, पिता, गुरु प्रभृति पूज्य पुरुषोंके संबंधमें कर्तव्य और उनके अपवाद – काम, क्रोध और लोभके निग्रहका तारतम्य – धैर्य आदि गुणोंके अवसर और देशकाल आदि मर्यादा – आचारका तारतम्य – धर्म-अधर्मकी सूक्ष्मता और गीताकी अपूर्वता। . . . . . . . . . . . .पृ. २९-५१ तीसरा प्रकरण – कर्मयोगशास्त्र कर्मजिज्ञासाका महत्त्व, गीताका प्रथम अध्याय और कर्मयोगशास्त्रकी आवश्यकता – कर्म शब्दके अर्थका निर्णय – मीमांसकोंका कर्मविभाग – योग शब्दके अर्थका निर्णय – गीतामें योग = कर्मयोग, और वही प्रतिपाद्य – कर्म-अकर्मके पर्याय शब्द – शास्त्रीय प्रतिपादनके तीन पंथ आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक – इन पंथभेदोंका कारण – कॉंटका मत – गीताके अनुसार अध्यात्मदृष्टिकी श्रेष्ठता – धर्म शब्दके दो अर्थ, पारलौकिक और व्यावहारिक – चातुर्वर्ण्यादि धर्म