भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र साथ उनमें न्याय-बुद्धि, दया, समानपन, दूरदृष्टि, तर्क, शूरता, धृति, क्षमा, इंद्रिय- निग्रह इत्यादि अनेक अन्य सात्त्विक सद्गुणोंकीभी वृद्धि हुई है ? जब इसपर विचार किया जाता है, तब कहना पड़ता है, कि अन्य सब सजीव प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्योंमें सभी सद्गुणोंका उत्कर्ष हुआ है। इन सब सात्त्विक गुणोंके समूहको 'मनुष्यत्व' नाम दीजिये। अब यह बात सिद्ध हो चुकी है, कि परोपकारकी अपेक्षा मनुष्यत्वको हम श्रेष्ठ मानते हैं। ऐसी अवस्थामें किसीभी कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचार या नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये उस कर्मकी परीक्षा केवल परोपकारहीकी दृष्टिसे नहीं की जा सकती - अब उस कर्मकी परीक्षा मनुष्यत्वकी दृष्टिसे - अर्थात् मनुष्यजातिमें अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा जिन जिन गुणोंका उत्कर्ष हुआ है, उन सबको ध्यान रखकरही - की जानी चाहिये। अकेले परोपकारको ध्यानमें रखकर कुछ-न-कुछ निर्णय कर लेनेके बदले अब तो यही मानना पड़ेगा, कि जो कर्म सब मनुष्योंके 'मनुष्यत्व' या 'मनुष्यपन'को शोभा दें, या जिस कर्मसे 'मनुष्यत्व'की वृद्धि हो, वही सत्कर्म और वही नीति-धर्म है। यदि एक बार इस व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर लिया जाय, तो "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" उक्त दृष्टिका एक अत्यंत छोटा भाग हो जायगा और इस मतका कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं रह जायगा, कि सब कर्मोंके धर्म-अधर्म या नीतिमत्ताका विचार केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" तत्त्वके अनुसार किया जाना चाहिये - और तब तो धर्म- अधर्मका निर्णय करनेके लिये मनुष्यत्वकाभी विचार करना आवश्यक होगा। और जब हम इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगेंगे, कि 'मनुष्यपन' या मनुष्य- त्वका यथार्थ स्वरूप क्या है, तब हमारे मनमें याज्ञवल्क्यके अनुसार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" यह विषय आप-ही-आप उपस्थित हो जायगा। नीतिशास्त्रका विवेचन करनेवाले एक अमेरिकन ग्रंथकारने इस समुच्चयात्मक मनुष्यत्वके धर्मकोही 'आत्मा' कहा है। उपर्युक्त विवेचनसे यह मालूम हो जायगा, कि केवल स्वार्थ या अपनेही विषय-सुखकी कनिष्ठ श्रेणीसे बढ़ते बढ़ते आधिभौतिक सुखवादियोंकोभी परोप- कारकी श्रेणी तक और अंतमें मनुष्यत्वकी श्रेणीतक कैसे आना पड़ता है। परंतु मनुष्यत्वके विषयमेंभी और आधिभौतिकवादियोंके मनमें प्रायः सब लोगोंके बाह्य विषय-सुखहीकी कल्पना प्रधान होती है, अतएव आधिभौतिकवादियोंकी यह अंतिम श्रेणीभी जिसमें - अंतःशुद्धि, और अंतःसुखका कुछ विचार नहीं किया जाता - हमारे अध्यात्मवादी शास्त्रकारोंके मतानुसार निर्दोष नहीं है। यद्यपि इस बातको साधारण- तया मानभी लें, कि मनुष्यके सब प्रयत्न सुख-प्राप्तिके तथा दुःख-निवारणकेही लिये हुआ करते हैं; तथापि जबतक पहलें इस बातका निर्णय न हो जाय, कि सच्चा सुख किसमें है - आधिभौतिक अर्थात् सांसारिक विषयभोगोंमें है, अथवा और किसीमें बात है - तबतक कोईभी आधिभौतिक पक्ष ग्राह्य नहीं समझा जा सकता।